भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 111, कुल 404 में से

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सप्तमोऽध्यायः । ६७ यद्यप्यकर्त्तृकं लोकमाह कश्चिदिहागमः । तदनेकैरागमैस्तु तर्करूढैः सुबाधितम् ॥ ३६ ॥ यत्रात्मनाश एवार्थः प्रत्यक्षैकसमाश्रयात् । तदागमाभासमेव न तद्धि महदाश्रयम् ॥ ३७ ॥ शुष्कतर्कैकसंकॢप्तं शास्त्रं तन्त्याज्यमेव हि । अन्यैरप्युच्यते कैश्चिज्जगदेतत् सनातनम् ॥ ३८ ॥ अबुद्धिमत्कर्त्तृकं चेत्येतच्चाप्यसमञ्जसम् । क्रियाया बुद्धिपूर्वत्वादबुद्धौ तददर्शनात् ॥ ३९ ॥ बह्वागमोपष्टम्भाच्च कर्तात्र स्याद्धि बुद्धिमान् । बुद्धिमत्कर्त्तृकं कार्यं सर्वत्रैव हि दर्शनात् ॥ ४० ॥ एवं सत्तर्कागमाभ्यां जगदेतत् सकर्त्तृकम् । स कर्त्ता लौकिकेभ्यस्तु कर्त्तृभ्यः स्याद्विलक्षणः ॥ ४१ ॥ यद्यपि कोई-कोई शास्त्र इसे बिना किसी कर्ताके स्वयं ही उत्पन्न हुआ बतलाते हैं, किन्तु यह बात अनेकों युक्तिप्रधान शास्त्रवाक्योंसे सर्वथा बाधित हो जाती है ॥ ३६ ॥ जो [ चार्वाक आदि ] दर्शन केवल प्रत्यक्ष प्रमाणके ही बलपर आत्मनाश ( मृत्यु ) को ही पुरुषार्थ ( मोक्ष ) मानते हैं वे तो वास्तवमें [ दर्शन नहीं ] दर्शनाभास ही हैं। महापुरुष उन्हें कभी आश्रय नहीं देते । ऐसे शुष्क तर्क द्वारा कल्पना किये हुए शास्त्र त्यागने योग्य ही हैं ॥ ३७-३८ पू० ॥ कोई दार्शनिक कहते हैं कि यह संसार सदासे ऐसा ही है । यह किसी बुद्धिमान् ( ईश्वरादि चेतन ) की रचना नहीं है। यह बात भी ठीक नहीं है, क्योंकि क्रिया बुद्धिपूर्वक ही होती है, बुद्धिके विना कोई भी क्रिया नहीं देखी जाती ॥ ३८ उ०-३९ ॥ अनेकों शास्त्रोंके आधारसे भी इस लोकरचनामें बुद्धिमान् कर्ता ही सिद्ध होता है । तथा सभी जगह कोई भी कार्य बुद्धिमान् कर्ताके द्वारा ही होता देखा जाता है ॥ ४० ॥ इस प्रकार तर्क और शास्त्रके द्वारा यह जगत् किसी कर्ताका ही कार्य है । और वह कर्ता सारे लौकिक कर्ताओंसे विलक्षण ही है ॥ ४१ ॥ १. चार्वाक आदि नास्तिक दर्शन ।

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