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त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

६८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे कार्यस्याचिन्त्यरूपत्वादचिन्त्यानन्तशक्तिकः । अपरिच्छिन्नसामर्थ्यः कार्यस्यानुगुणत्वतः ॥ ४२ ॥ स प्रपन्नान् समुद्धर्तुं प्रभवत्येव सर्वथा । अतस्तं सर्वभावेन शरणीकुरु सर्वदा ॥ ४३ ॥ निदर्शनं तेऽभिधास्ये शृणु प्रत्ययकारणम् । मितेश्वरोऽप्यत्र लोके चाकापट्यात् प्रसादितः ॥ ४४ ॥ सर्वात्मना योजयति स्वेष्टार्थैः श्रेयसे नरम् । एष लोकेश्वरो देवः सम्यग् येन प्रसादितः ॥ ४५ ॥ तस्मै किं न दिशेद् ब्रूहि भक्तलोकैकवत्सलः । पुरुषा हीश्वरा लोके चानवस्था अवत्सलाः ॥ ४६ ॥ निर्दयाश्च कृतघ्नाश्च तस्मात् तत् फलमस्थिरम् । परमेशो दयासिन्धुः कृतज्ञः सुव्यवस्थितः ॥ ४७ ॥ यह जगत्-रूप कार्य अचिन्त्य है [ इसका वास्तविक स्वरूप किसीकी समझमें नहीं आता ]। इसलिये इसका कर्ता भी अचिन्त्य और अनन्त शक्तिवाला होना चाहिये। तथा अपने इस कार्यके अनुसार उसका सामर्थ्य असीम होना चाहिये ॥ ४२ ॥ वह अपने शरणागतोंका उद्धार करनेमें सर्वथा समर्थ है ही। अतः आप सर्वदा सम्पूर्ण भावसे उनकी शरण लें ॥ ४३ ॥ आपके विश्वासके लिये मैं आपको एक दृष्टान्त देती हूँ। संसारमें जो सीमित ऐश्वर्यवाले स्वामी हैं वे भी अपने सेवकके निष्कपट-भावसे प्रसन्न होनेपर अपनी पूरी शक्तिसे उसे अभीष्ट पदार्थ प्राप्त करानेका प्रयत्न करते हैं ॥ ४४-४५ पू० ॥ ये भगवान् तो सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी हैं और अपने भक्तोंपर इनका पूर्ण वात्सल्य है। फिर जो इन्हें प्रसन्न करले, बताइये, उसे ये क्या नहीं दे सकते ? ॥ ४५ उ०-४६ पू० ॥ संसारमें जो ऐश्वर्यवान् पुरुष हैं वे तो अस्थिर, स्नेहशून्य, निर्दय और कृतघ्न हैं। इसलिये उनसे जो फल मिलता है वह ठहरनेवाला नहीं होता। किन्तु भगवान् तो दयाके समुद्र, किये हुएको बहुत मानने- वाले और सुव्यवस्थित हैं। [ अतः उनसे जो फल प्राप्त होता है उसका कभी नाश या क्षय नहीं होता ] ॥ ४६ उ०-४७ ॥

सप्तमोऽध्यायः । ६६ अन्यथानादिसंसारे कुतोऽनिन्द्यत्वमाप्नुयात् । न्यवस्थिता जगद्धात्रा चापि वा स्यात् कथं वद ॥ ४८ ॥ अनवस्थस्य राज्यन्तु नष्टमालोक्यते यतः । तस्मादेव दयासिन्धुः सुव्यवस्थश्च कीर्त्तितः ॥ ४९ ॥ तमेव सर्वभावेन भक्त्याशु शरणीकुरु । श्रेयसि त्वां योजयेत् स त्वं न तत्परतां व्रज ॥ ५० ॥ उपासने बहुविधमार्त्यार्थित्वतोऽपि च । निर्हेतुकन्तु काचित्कं तत् सत्योपासनं भवेत् ॥ ५१ ॥ दृष्टमेतत् सर्वतो वै चार्त्तेनोपासितः प्रभुः । कदाचिद् दयाविष्ट आर्त्तिं तस्य विमोचयेत् ॥ ५२ ॥ उपेक्षेत कदाचिद्धोपास्तेर्वै तारतम्यतः । एवमेवार्थार्थिनोऽपि मितञ्चानियतं फलम् ॥ ५३ ॥ यदि ऐसा न होता तो बताइये इस अनादि संसार में वह कैसे अनिन्दित रहते, तथा उन जगत्कर्ताकी की हुई यह लोकव्यवस्था किस प्रकार नियमित रहती ॥ ४८ ॥ क्योंकि यह देखा जाता है कि जिसकी व्यवस्था ठीक नहीं होती उसका राज्य नष्ट हो जाता है। इसलिये भगवान् दयाके सागर और सुव्यवस्थित कहे जाते हैं ॥ ४९ ॥ अतः सम्पूर्ण भक्तिभावसे आप उनकी शरण ग्रहण करें। वे ही आपको श्रेयः-साधनमें लगा देंगे। आपको साधन ढूँढ़नेके पछड़ेमें पड़नेकी आवश्यकता नहीं है ॥ ५० ॥ उपासनामें आर्त्ति और अर्थिताके निमित्तसे भी अनेकों भेद हैं। निष्काम उपासना तो विरलोंकी ही होती है। किन्तु है वही सच्ची उपासना ॥ ५१ ॥ सब ओर प्रायः यही देखा जाता है कि आर्त्त (संकटग्रस्त) पुरुष प्रभुकी उपासना करता है। अतः भगवान् कभी तो दयाके वशीभूत होकर उसका कष्ट दूर कर देते हैं ॥ ५२ ॥ और कभी उपासनामें त्रुटि रह जानेपर उपेक्षा भी कर देते हैं। इसी प्रकार अर्थार्थी उपासकोंको मिलनेवाला फल भी सीमित और अनि- श्चित ही होता है ॥ ५३ ॥

१०० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे निर्हेतुकोपासनस्य ज्ञात्वा निर्हेतुतां चिरात् । मितेश्वरोऽप्यन्यव्यवस्थस्तदधीनो भवेत्यलम् ॥ ५४ ॥ निर्हेतुकत्वज्ञानाय चिरं स्यादज्ञभावतः । एष सर्वेश्वरो देवो हृदयेषोऽखिलस्य तु ॥ ५५ ॥ सर्वं जानाति तत्काले फलं दद्याच्च सत्वरम् । आर्तमर्थार्थिनं देवस्तदर्येनाभियोजितुम् ॥ ५६ ॥ स्वनियत्या कर्मपाकं प्रतीक्ष्य फलमादिशेत् । निर्हेतुकोपासकं स्वमनन्यशरणं विभुः ॥ ५७ ॥ ज्ञात्वा सर्वात्मना तस्य योगक्षेमवहो भवेत् । अप्रतीक्ष्यं कर्मपाकं नियतिं स्वां विधूय च ॥ ५८ ॥ तत्साधनं सम्प्रसाध्य द्रुतं संयोजयेत् फले । एतदेव महेशत्वं स्वातन्त्र्यमहतन्तु यत् ॥ ५९ ॥ किन्तु जिसकी उपासना निष्काम होती है, कुछ काल बीतनेपर जब उसकी निष्कामताका पता लगता है तो संसारका सीमित ऐश्वर्यवाला अन्यवस्थित-चित्त स्वामी भी सर्वथा उसके अधीन हो जाता है ॥ ५४ ॥ वह अज्ञानी होता है, इसलिये उपासककी निष्कामताको पहचाननेमें उसे तो बहुत समय लग जाता है। किन्तु भगवान् सर्वेश्वर तो सभीके हृदयोंके स्वामी हैं ॥ ५५ ॥ वे तो तत्काल सब कुछ जान जाते हैं और तुरन्त ही उसका फल भी दे डालते हैं। वे आर्त और अर्थार्थीको तो अपनी नियतिके अनुसार कर्मके परिपाककी प्रतीक्षा करके फल देते हैं ॥ ५६-५७ पू० ॥ किन्तु जिसे अपना अनन्य-शरण निष्काम उपासक देखते हैं उसके योग-क्षेमका तो सभी प्रकार निर्वाह करते हैं ॥ ५७ उ०-५८ पू० ॥ वे कर्मविपाकको प्रतीक्षा न करके तथा अपनी नियतिकी उपेक्षा करके उसके साधनकी पूर्ति करके तुरन्त ही उसे फलकी प्राप्ति करा देते हैं। यही उनकी महेश्वरता और परम स्वतन्त्रता है ॥ ५८ उ०-५६ ॥ १. योग-क्षेमका अर्थ भक्तके निर्वाहका सुभीता नहीं समझना चाहिये, प्रत्युत 'योग' का अर्थ है साधनके अनुकूल परिस्थितिकी प्राप्ति और 'क्षेम' का अर्थ है साधनके विघ्नोंसे रक्षा।

सप्तमोऽध्यायः । १०१

प्रारब्धं नियतिर्वापि महेशविमुखं भवेत् । एतन्मृकण्डुतनयेऽत्यन्तमीश्वरतत्परे ॥ ६० ॥ सर्वैर्ज्ञातं महेशस्य नियत्यारब्धलङ्घनम् । अत्रोपपत्तिन्ते वक्ष्ये शृणु प्राणप्रियेरितम् ॥ ६१ ॥ यद्यप्यनुल्लङ्घनीये प्रारब्धनियती खलु । तथाप्यपौरुषाणां तत् प्रारब्धमनपोहनम् ॥ ६२ ॥ अतएव प्राणायामैः प्रारब्धं परिजीयते । न तान् दृष्टेषु दुःखेषु प्रारब्धं योजयत्यलम् ॥ ६३ ॥ प्रारब्धाहिनिगीर्णास्ते ये पौरुषपराङ्मुखाः । एतन्नियति-संकॢप्तं तथैवानुभवान्न्नु ॥ ६४ ॥ नियतिः स्यादीशशक्तिः सङ्कल्पैकस्वरूपिणी । सत्यसङ्कल्प एवेशोऽनुल्लङ्घ्या ह्यत एव सा ॥ ६५ ॥

प्रारब्ध या नियति तो महेश्वरसे विमुखोंके लिये ही है। अत्यन्त भगवत्परायण मार्कण्डेय जी के प्रसंगमें भगवान् महेश्वरने नियति और प्रारब्धका उल्लङ्घन किया—यह बात सभीको मालूम है। प्राणप्रिय ! सुनिये, इस विषयमें मैं आपको उपपत्ति भी बतलाती हूँ ॥ ६०-६१ ॥ यद्यपि प्रारब्ध और नियतिका उल्लङ्घन होना निश्चय ही सम्भव नहीं है, तथापि यह प्रारब्धकी अतिवृत्ति पुरुषार्थहीनोंके लिये ही है ॥ ६२ ॥ इसीसे प्राणायामके द्वारा भी प्रारब्धपर विजय प्राप्त हो जाता है। प्राणायाम-परायण योगियोंको प्रारब्ध दृष्ट-दुःखोंमें बिलकुल नहीं फँसा सकता ॥ ६३ ॥ जो लोग पुरुषार्थसे विमुख हैं वे ही प्रारब्धरूप सर्पके मुँहमें पड़ते हैं। यह नियतिका ही संकल्प है और अनुभवसे भी ऐसा ही सिद्ध होता है ॥ ६४ ॥ नियति परमात्माकी शक्ति है और उसका स्वरूप केवल संकल्प है। भगवान् सत्यसंकल्प ही हैं, इसीसे नियतिका उल्लङ्घन नहीं हो सकता ॥ ६५ ॥

१०२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे कुण्ठिता सापि भवति परमेशपरायणे । अकुण्ठितापि भवति यतः सा तादृशी भवेत् ॥ ६६ ॥ तस्मात् कुतर्कं सन्त्यज्य महेशं शरणीकुरु । अहेतुकतया स त्वां नियोजयति श्रेयसि ॥ ६७ ॥ एतावदेव सोपानं प्रथमं क्षेमसौधकम् । एतद्विहाय चान्यत्र नास्तीपत्फलसम्भवः ॥ ६८ ॥ श्रुत्वेत्थं वचनं राम हेमचूडः प्रियोदितम् । पप्रच्छ भूयस्तां कान्तामतिहृष्टमनास्तदा ॥ ६९ ॥ प्रिये महेश्वरं ब्रूहि यः शरण्यो भवेन्मम । सर्वकर्ता स्वतन्त्रात्मा यच्छक्त्या नियतं जगत् ॥ ७० ॥ तं विष्णुमाहुः केचिद्वै केचिच् शिवगणेश्वरम् । तथा सूर्यं नृसिंहादीन् बुद्धं सुगतमेव च ॥ ७१ ॥ किन्तु भगवत्परायण पुरुषोंके लिये वह कुण्ठित हो जाती है । तथापि वह है अकुण्ठिता ही, क्योंकि वह है ऐसी ही [ अर्थात् भक्तोंके लिये कुण्ठित हो जाना उसका स्वभाव ही है, इसलिये इससे उसकी अकुण्ठिततामें कोई अन्तर नहीं आता ] ॥ ६६ ॥ “इसलिये आप कुतर्क छोड़कर निष्काम भावसे भगवान् महेश्वरकी शरण लीजिये । वे आपको परम निःश्रेयसकी प्राप्ति करा देंगे” ॥ ६७॥ “निःश्रेयसकी अट्टालिका पर चढ़नेके लिये यही पहली सीढ़ी है । इसे छोड़कर किसी अन्य साधनसे थोड़ा-सा भी फल प्राप्त नहीं हो सकता” ॥ ६८ ॥ परशुराम ! अपनी प्रियाके कहे हुए ये वचन सुनकर हेमचूडने अत्यन्त प्रसन्नचित्त हो फिर उससे पूछा ॥ ६९ ॥ “प्रिये ! मेरे शरण्य जो महेश्वर हैं उनके स्वरूपका वर्णन करो; जो सब कुछ करनेवाले और परमस्वतन्त्र हैं तथा जिनकी शक्तिसे संसारका नियमन होता है ॥ ७० ॥ उन्हें कोई विष्णु कहते हैं, कोई शिव या गणपति बतलाते हैं

सप्तमोऽध्यायः । १०३ अर्हन्तं वासुदेवञ्च प्राणं सोमञ्च पावकम् । कर्म प्रधानमणव इत्यादि बहुधा जगुः ॥ ७२ ॥ जगत्कारणरूपं वै विचित्रमतभेदितम् । तत्र क्वेश्वरबुद्धिस्तु कर्त्तव्या तत् समीरय ॥ ७३ ॥ न ते ह्यविदितं किञ्चिद् भवेदिति हि निश्चयः । यतः स भगवान् व्याघ्रपादो दृष्टपरावरः ॥ ७४ ॥ अतस्ते योषितोऽप्येवं ज्ञानमेतद्विराजते । ब्रूहि मे श्रद्दधानाय प्रियामृतप्रभाषिणी ॥ ७५ ॥ पृष्टैवं सा हेमलेखा प्रियेण प्राह हर्षिता । नाथ ते सम्प्रवक्ष्यामि शृण्वीश्वरविनिर्णयम् ॥ ७६ ॥ ईश्वरो हि जगज्जालप्रलयोत्पादकृद् भवेत् । स विष्णुः स शिवो धाता स सूर्य्यः सोम एव च ॥ ७७ ॥ तथा कोई सूर्य, नृसिंह, बुद्ध, सुगत, अर्हत्, वासुदेव, प्राण, सोम, अग्नि, कर्म, प्रधान या अणु आदि अनेकों प्रकारोंसे उनका प्रतिपादन करते हैं ॥ ७१-७२ ॥ इस प्रकार जगत्‌के कारणका स्वरूप तरह-तरहके मतभेदोंसे विभिन्न-सा हो गया है। ऐसी स्थितिमें कहाँ ईश्वरबुद्धि करनी चाहिये- यह बताओ ॥ ७३ ॥ यह तो मुझे निश्चय है कि कोई बात नहीं है जो तुम्हें मालूम न हो, क्योंकि भगवान् व्याघ्रपाद परावरदर्शी थे [ उन्हें लोक, परलोक और परमात्मा सभीका पूर्ण ज्ञान था ] ॥ ७४ ॥ इसीसे स्त्री होनेपर भी तुममें ऐसा ज्ञान है। प्रिये ! तुम अमृतके समान मधुर और हितकर भाषण करनेवाली हो, मुझ श्रद्धालुसे यह रहस्य कहो” ॥ ७५ ॥ प्रियतमके इस प्रकार पूछनेपर हेमलेखाने प्रसन्न होकर कहा, “नाथ ! सुनिये मैं ईश्वरके विषयमें अपना निर्णय सुनाती हूँ ॥ ७६ ॥ इस जगत्‌के ताने-बानेकी जो प्रलय और उत्पत्ति करनेवाला है, वह ईश्वर है। वही शिव, वही ब्रह्मा, सूर्य और चन्द्रमा भी है ॥ ७७ ॥

१०४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे स एव सर्वथा सर्वः सर्वैरपि निरूपितः । न शिवो नापि विष्णुर्वा न धाता नान्य एव च ॥ ७८ ॥ एतत्ते सम्प्रवक्ष्यामि शृण्वत्यन्तसमाहितः । कर्त्तारं शिवमाहुस्ते पञ्चवक्त्रं त्रिलोचनम् ॥ ७९ ॥ स कर्त्ता घटकत्र्तेव चेतनः सशरीरकः । लोकेऽपि चेतनः कर्त्ता सशरीरो हि दृश्यते ॥ ८० ॥ अशरीरोऽचेतनो वा न कर्त्ता क्वचिदीक्षितः । तत्र मुख्यं हि कर्त्तृत्वं चेतनस्यैव सम्भवेत् ॥ ८१ ॥ यतः स्वप्नेष्वयं जीवो हित्वा स्थूलं शरीरकम् । चैतन्यमयदेहेन सर्वानभिमतान् सृजेत् ॥ ८२ ॥ अतः शरीरं करणं कार्ये कर्तुश्चिदात्मनः । जीवानां करणापेक्षा यतोऽपूर्णा स्वतन्त्रता ॥ ८३ ॥


सबके द्वारा सब रूपोंमें सब प्रकार उसीका निरूपण किया गया है। परन्तु वास्तवमें वह न शिव है, न विष्णु है, न ब्रह्मा है और न कोई अन्य ही है ॥ ७८ ॥ इस रहस्यको मैं स्पष्ट करके समझाती हूँ, आप अत्यन्त सावधान होकर सुनिये । शैव लोग पञ्चमुखी त्रिनयन भगवान् शिवको ही जगत्की रचना करनेवाला मानते हैं ॥ ७९ ॥ घट बनानेवाले कुम्हारकी तरह वह जगत्कर्ता भी चेतन और शरीरधारी हैं । लोकमें भी कर्ता चेतन और सशरीर ही देखा जाता है ॥ ८० ॥ कहीं भी अशरीर और अचेतन कर्ता नहीं देखा गया । इनमें भी कर्त्तृत्व शक्तिका मुख्यतया चेतनमें ही रहना अधिक सम्भव है ॥ ८१ ॥ क्योंकि स्वप्नावस्थामें यह जीव स्थूल शरीरको छोड़कर अपने चैतन्यमय स्वरूपसे ही सारे अभीष्ट पदार्थोंकी रचना कर लेता है ॥८२॥ इसलिये किसी कार्यको करनेमें शरीर चेतन आत्माका केवल करण है। किन्तु करणकी आवश्यकता जीवोंको ही होती है, क्योंकि उनमें पूर्ण स्वातन्त्र्य नहीं है ॥ ८३ ॥

सप्तमोऽध्यायः । १०५ भगवांस्तु जगत्कर्त्ता पूर्णस्वातन्त्र्ययोगतः । अनपेक्ष्यैव यत्किञ्चित् सृजत्यविकलं जगत् ॥ ८४ ॥ अतः शरीरं नास्त्येव ह्येष मुख्यविनिश्चयः । अन्यथा लोकवत्कर्त्तु रुपादानाश्रयो भवेत् ॥ ८५ ॥ तथा च देशकालादिकारणप्रचयैर्युतः । जगत् सृजन्महेशानो जीव एव भवेत्तथा ॥ ८६ ॥ पूर्णैश्वर्यं विहन्येत जगत्सृष्टेः पुरापि च । सिद्धयेत्तत्सर्वकर्तृत्वं विहतं स्यान्न संशयः ॥ ८७ ॥ भगवान् तो अपने पूर्ण स्वातन्त्र्यके कारण जगत्के कर्ता हैं। वे तो किसी अन्यकी अपेक्षा न रखकर यह जो कुछ जगत् है सबको रच डालते हैं ॥ ८४ ॥ अतः मुख्य निश्चय यह हुआ कि परमात्मा शरीर नहीं है। नहीं तो लौकिक कर्ताओंकी तरह उसे भी [ लोकरचनाके लिये ] सामग्रीका आश्रय लेना पड़ता ॥ ८५ ॥ और इस प्रकार देश-कालादि करणसमूहयुक्त होकर जगत्की रचना करनेपर तो वह महेश्वर भी एक जीव ही हो जाता ॥ ८६ ॥ यदि सृष्टिसे पहले किसी अन्य सामग्रीकी सत्ता स्वीकार की जाय तो भगवान्की पूर्ण ईश्वरता बाधित हो जायगी और इसमें सन्देह नहीं कि उनका सर्वकर्त्तृत्व भी सिद्ध नहीं हो सकेगा ☸ ॥ ८७ ॥ ☸ यदि सृष्टिसे पूर्व परमाणु या प्रकृति आदि किसी अन्य सामग्री की सत्ता स्वीकार करेंगे तो भगवान्का जगत्कर्त्तृत्व उसके अधीन होनेके कारण उनका पूर्ण ऐश्वर्य नहीं रहेगा और अन्य सामग्रीकी नित्य सत्ता सिद्ध होनेके कारण उनकी अद्वितीयता और विभुता भी बाधित हो जायगी । वैशेषिक मतावलम्बी परमाणुओंकी नित्य सत्ता स्वीकार करते हैं और ऐसा मानते हैं कि ईश्वरकी इच्छा से वे नित्य परमाणु ही मिलकर जगत्की रचना कर देते हैं । परन्तु किसीकी इच्छासे कार्य करनेके लिये प्रवृत्त होना जड परमाणुओंके लिये सम्भव नहीं है। यदि भगवान्के असीम सामर्थ्यका इसे प्रभाव मानें तो उनके अपने अलौकिक साम- र्थ्यसे तो वे परमाणुओंके बिना भी जगत्की रचना कर ही सकते हैं, फिर परमा- णुओंकी नित्य सत्ता मानकर उनकी अद्वितीयता और विभुताको बाधित क्यों किया जाय । इसी प्रकार सांख्योक्त प्रकृति और मीमांसासम्मत कर्म भी माननीय

१०६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अतो हि दृश्यदेहाद्यमनपेक्ष्य जगत् सृजेत् । नास्ति तस्मात् स्थूलदेहो वस्तुतः प्राणवल्लभ ॥ ८८ ॥ पररूपे ह्यदेहेऽस्मिन् मुह्यन्ति स्थूलबुद्धयः । भक्तियुक्ताश्च तैर्ध्यातो यत्र यत्र यथा यथा ॥ ८९ ॥ तथा धत्तेऽनेकरूपं भक्तचिन्तामणिः स्वयम् । अतश्चेतन एतेन तद्देहः स्याच्चितिः परा ॥ ९० ॥ चितिरेव महासत्ता सम्राज्ञी परमेश्वरी । त्रिपुरा भासते यस्यामविभिन्ना विभिन्नवत् ॥ ९१ ॥ आदर्शनगरप्रख्यं जगदेतच्चराचरम् । तद्रूपैकत्वतस्तत्र नोत्तमाधमभावना ॥ ९२ ॥ इसलिये प्राणप्रिय ! भगवान् दृश्यस्वरूप देहादिकी अपेक्षा न रखकर ही जगत्‌की रचना करते हैं । अतः वास्तवमें उनका कोई स्थूल शरीर नहीं है ॥ ८८ ॥ किन्तु स्थूलबुद्धि पुरुषोंकी भगवान्‌के देहातीत परमस्वरूपमें गति नहीं होती । इसलिये भक्तियुक्त होकर उनमेंसे जिस-जिसके द्वारा उनका जैसे-जैसे ध्यान किया जाता है वैसे-वैसे ही वे अनेक प्रकारके रूप धारण कर लेते हैं, क्योंकि वे स्वयं भक्तोंके लिये चिन्तामणिके समान हैं और परम चैतन्य ही उनका शरीर है ॥ ८९-९० ॥ वह चितिरूपा महासत्ता ही सर्वेश्वरी भगवती त्रिपुरा है, जिसमें यह संसार उससे अभिन्न होकर भी विभिन्नकी तरह भासता है ॥ ९१ ॥ यह चराचर जगत् दर्पणमें भासनेवाले नगरके समान है । वह दर्पणस्थानीय चेतन एकरूप ही है । [और वही विष्णु-शिव आदि रूपोंमें उपलब्ध होता है ] इसलिये उनमें उत्तम-अधम आदि भाव नहीं करना चाहिये ॥ ९२ ॥ नहीं हैं। यदि कहें कि सृष्टिको कर्म निरपेक्ष माननेपर तो जीवोंके विभिन्न भोगोंके कारण ईश्वरमें विषमता और निर्दयताका दोष आवेगा, तो इस विषयमें यह समझना चाहिये कि दर्पणमें प्रतीत होनेवाले प्रतिबिम्बके समान जिस प्रकार सारा जगत् आभासमात्र है उसी प्रकार ये कर्मादि भी केवल आभासमात्र हैं। इनकी पारमा- र्थिक सत्ता नहीं है। वस्तुतः तो ये भी चिदेकरसस्वरूप होनेके कारण भगवान्‌से अभिन्न ही हैं।

सप्तमोऽध्यायः । १०७ अपरे तु स्वरूपे हि कल्पितं मुख्यतादि हि । तस्मात् प्राज्ञ उपासीत परं रूपं हि निष्कलम् ॥ ९३ ॥ असमर्थः स्थूलरूपं यद्बुद्धौ सङ्गतं दृढम् । तदुपास्या हेतुतस्तु श्रेयः प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ ९४ ॥ नान्यथास्य गतिः क्वापि भवेद्वै कोटिजन्मभिः ॥ ९५ ॥ इति श्रीमज्ज्ञानखण्डे हेमचूड़ोपाख्याने ईश्वरस्वरूप- निरूपणं सप्तमोऽध्यायः । [ यदि कहो कि शास्त्रोंमें इनकी मुख्यता-गौणता क्यों बतायी गयी है, तो उसका उत्तर यह है, कि ] ये मुख्यता आदि [ भक्तों की भावना- के अनुसार ] भगवान्‌के इस अपररूपमें ही कल्पित हैं। इसलिये विवेकी पुरुषको तो उनके कलातीत परस्वरूप की ही उपासना करनी चाहिये ॥ ६३ ॥ जो इस प्रकार उपासना करनेमें समर्थ न हो वह उस स्थूल रूपकी निष्काम उपासना करे जो उसकी बुद्धिमें दृढ़तासे जमता हो । इससे भी वह परम निःश्रेयसको प्राप्त कर सकता है। इसके सिवा तो करोड़ों जन्मोंमें भी इसके लिये कोई अन्य मार्ग नहीं हो सकता ॥ ६४-६५ ॥ सप्तम अध्याय समाप्त ।

अष्टमोऽध्यायः एवं प्रियावचः श्रुत्वा ज्ञात्वा तत्त्वं महेशितुः । त्रैपुरं चिन्मयं हेमलेखावाक्येन निश्चितम् ॥ १ ॥ आश्वस्तचित्तस्त्रिपुरां गुणरूपां महेश्वरीम् । ज्ञात्वा गुरुभ्यः परमां माहैश्वर्यविभावितः ॥ २ ॥ तामेकभावानुगतो हेमचूड़ोऽभवद् दृढम् । एवं परोपासनेन व्यतीयुः केऽपि मासकाः ॥ ३ ॥ त्रिपुरा परमेशानी प्रसादमकरोद्-हृदि । विषयाद्विमुखं चित्तं विचारपरमं बभौ ॥ ४ ॥ एतावद् दुर्लभं लोके परानुग्रहमन्तरा । विचारप्रवणं चित्तं यन्मुख्यं मोक्षकारणम् ॥ ५ ॥ अष्टम अध्याय ॥ ८ ॥ आख्यायिकाका स्पष्टीकरण इस प्रकार अपनी पत्नीका भाषण सुनकर और हेमलेखाके वाक्यसे ही निश्चित किये हुए परमेश्वरके चिन्मय त्रिपुरारूपको जानकर हेमचूड़का चित्त शान्त हो गया । फिर गुरुओंके द्वारा उसने परम महेश्वरी भगवती त्रिपुराके सगुणरूपको जाना और परमेश्वरकी अनुग्रह शक्तिसे सम्पन्न हो वह एकमात्र उसीके ध्यानमें दृढतासे तत्पर हो गया ॥ १-३ पू० ॥ इस तरह परमेश्वरीकी उपासनामें उसके कुछ महीने व्यतीत हो गये । तब भगवती त्रिपुराने उसके हृदयमें अपनी कृपा प्रकट की । इससे उसका विषयाभिमुख चित्त विचारपरायण हो गया ॥ ३ उ०-४ ॥ परमेश्वरकी कृपाके बिना संसारमें यह बात दुर्लभ ही है, क्योंकि विचारोन्मुख चित्त ही मुक्तिका मुख्य कारण है ॥ ५ ॥

अष्टमोऽध्यायः । १०६ राम यावन्न जायेत विचारपरमं मनः । न तावच्छ्रेयसा योग उपायानां शतैः क्वचित् ॥ ६ ॥ अथ भूयः स कस्मिंश्चिद्दिने रहसि वै तया । सङ्गतः प्रिययाऽत्यन्तविचारपरमानसः ॥ ७ ॥ आयान्तं स्वनिकेतं तं दूरात् कान्तं ददर्श सा । उत्थाय तं समानीय स्वासने विनिवेश्य च ॥ ८ ॥ पादप्रक्षालनाद्यैस्तं पूजयित्वा यथाविधि । प्रोवाचामृतनिष्यन्दसुन्दरं परमं वचः ॥ ९ ॥ प्रेष्ठ ! त्वामद्य पश्यामि चिराय ननु ते वपुः । नीरुजं कच्चिदासीद्वै यतो रोगास्पदं वपुः ॥ १० ॥ तन्मामाचक्ष्व वृत्तान्तं यतो नाहं स्मृता त्वया । ननु मामसमालोक्य चाप्रभाष्य कदापि ते ॥ ११ ॥ नात्यगाद्दिनभागोऽपि तदेवं कुत आस्थितम् । मन्येऽहं मेऽनभिमते वर्त्तनं नहि वर्त्मनि ॥ १२ ॥ परशुराम ! जबतक मन विचारोन्मुख नहीं होता तबतक साधन होनेपर भी कभी निःश्रेयसकी प्राप्ति नहीं हो सकती ॥ ६ ॥ तदनन्तर 'किसी दिन एकान्तमें वह फिर अपनी उस प्रियासे मिला । उस समय उसका चित्त अत्यन्त विचारोन्मुख था ॥ ७ ॥ हेमलेखाने दूरसे ही अपने प्रियतमको अपने ही घरकी ओर आते देखा तो वह खड़ी हो गयी। फिर लेजाकर उसे सुन्दर आसनपर बिठाया और पाद-प्रक्षालनादिके द्वारा उसकी विधिवत् पूजाकर मानो अमृत-सा उड़ेलते हुए सुन्दर और तात्त्विक वचनोंमें कहा ॥ ८-६ ॥ "प्रियतम ! आज मैं बहुत काल पश्चात् आपको देख रही हूँ । आप- का शरीर तो स्वस्थ रहा ? क्योंकि शरीर रोगोंका स्थान ही है ॥ १० ॥ आप मुझे अपना वृत्तान्त सुनाइये क्योंकि इतने दिनोंतक आपने मेरा स्मरण भी नहीं किया। मुझे बिना देखे और मुझसे बिना बोले तो कभी दिनके एक अंशमात्र भी आप नहीं रह सकते थे । तब इस प्रकार आप कैसे रह गये ॥ ११-१२ पू० ॥

११० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे स्वप्ने वापि कुतोऽन्यत्र कुत एवमभूद्वद । कथं रात्रिस्त्वया नीता चैकापि युगसम्मिता ॥ १३ ॥ विना मां च क्षणोऽप्येको युगकल्पः सुदुःसहः । इत्युक्त्वा सा समाश्लिष्य खिन्नेवाभूत् क्षणं ततः ॥ १४ ॥ सोऽपि प्रियासमाश्लिष्टो नैषद्विकृतिमाययौ । प्राह प्रिये न मामेवं विमोहयितुमर्हसि ॥ १५ ॥ ज्ञाता मयाऽसि सुदृढं नास्ति ते शोककारणम् । परावरज्ञा त्वं धीरा मोहस्त्वां वै कथं स्पृशेत् ॥ १६ ॥ तत्त्वां प्रष्टुं समायातो यत्तद्वक्ष्यामि संशृणु । यत् प्राक् स्ववृत्तं कथितं तत् स्फुटं मे समीरय ॥ १७ ॥ का सा ते जननी प्रोक्ता सखी वा तत्पतिश्च कः ।

  • मैं समझती हूँ जिसमें मेरी अनुमति न हो उस मार्गमें तो, जाग्रत्- की तो बात ही क्या, आप स्वप्नमें भी नहीं जाते थे। मेरे बिना तो आपको एक क्षण भी युग और कल्पके समान अत्यन्त दुःसह हो जाता था। फिर बतलाइये ऐसा कैसे हुए ? आपने मेरे बिना युगके समान एक रात्रि भी कैसे बिता दी। "ऐसा कहकर वह हेमचूड़से लिपट गयी और फिर क्षणभरके लिये खिन्न-सी हो गयी ॥ १३-१४ ॥ किन्तु इसप्रकार अपनी प्रियासे आलिंगित होनेपर भी हेमचूड़को कुछ भी विकार न हुआ। वह बोला, "प्रिये ! तुम्हें मुझे इस तरह मोहमें नहीं डालना चाहिये ॥ १५ ॥ मैंने तुम्हें अच्छी तरह पहचान लिया है। तुम्हारे लिये शोकका तो कोई भी कारण नहीं है, क्योंकि तुम कार्य-कारणस्वरूप पर ब्रह्मको जाननेवाली और धैर्यशालिनी हो; मोह किस प्रकार तुम्हें स्पर्श कर सकता है ॥ १६ ॥ इस समय मैं तुमसे जो पूछनेके लिये आया हूँ वह बताता हूँ, सुनो। तुमने पहले जो मुझे आत्म-कथा सुनायी थी उसे स्पष्ट करके मुझे समझाओ ॥ १७ ॥ तुमने अपनी वह माता कौन बतलायी थी ? तुम्हारी सखी और

अष्टमोऽध्यायः । १११ तत् पुत्राद्या अपि च के मम वा ते क्व संवद ॥ १८ ॥ न तन्मया सुविदितं न तन्मन्ये मृषोदितम् । किन्तु त्वया निगदितं व्यपदेशेन सर्वथा ॥ १९ ॥ तद्विविच्य प्रकथय यथा ज्ञास्ये त्वहं स्फुटम् । अहं त्वां सुप्रसन्नोऽस्मि छिन्धि मे हृदि संशयम् ॥ २० ॥ एवमुक्ता हेमलेखा प्रसन्नवदनेक्षणा । मत्वा सुनिर्मलधियं परानुग्रहसंयुतम् ॥ २१ ॥ नूनमेषोऽतिविमुखो विषयेभ्योऽतिधैर्यतः । विष्णुशक्त्या महेशान्या फलितः पुण्यसञ्चयः ॥ २२ ॥ कालः प्रबोधने चायं बोधयामि ततस्त्विमम् । नाथ तेऽद्य महाभाग्यं प्राप्तमीशकृपावशात् ॥ २३ ॥ अन्यथा नैव विषयवैरस्यं पश्यति क्वचित् । उसका पति कौन थे ? उसके पुत्रादि कौन थे ? और बताओ, मुझसे उनका कब सम्पर्क हुआ ॥ १८ ॥ मैं उस प्रसंगको ठीक-ठीक नहीं समझ सका । मैं ऐसा भी नहीं मानता कि तुमने झूठ कहा होगा । किन्तु तुमने वह बात सर्वथा सांकेतिक भाषामें कही है ॥ १९ ॥ तुम उसे स्पष्ट करके कहो, जिससे मैं साफ-साफ समझ जाऊँ । मैं तुमपर अत्यन्त प्रसन्न हूँ, मेरे हृदयमें जो सन्देह है उसे दूर कर दो" ॥ २० ॥ हेमचूड़के ऐसा कहनेपर हेमलेखाके मुख और नेत्र खिल गये । उसने समझ लिया कि परमात्मा की कृपासे सम्पन्न होकर इनकी बुद्धि अत्यन्त शुद्ध हो गयी है ॥ २१ ॥ निश्चय ही अत्यन्त धैर्यपूर्वक ये विषयोंसे सर्वथा विमुख हैं । भगवती विष्णुशक्ति की कृपासे इनके पुण्यपुञ्ज फलोन्मुख हो गये हैं ॥ २२ ॥ अब इनके तत्त्व-बोधका समय आ गया है, अतः मैं इन्हें ज्ञानोपदेश करूँगी । [फिर बोली—] “नाथ ! भगवान्की कृपासे आपका परम सौभाग्य उदय हुआ है ॥ २३ ॥ नहीं तो कहीं कोई विषयोंमें नीरसताका अनुभव नहीं कर सकता ।

११२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे एतल्लक्षणमीशस्यानुग्रहे ज्ञेयमादितः ॥ २४ ॥ भोगवैरस्यमपरं विचारप्रवणं मनः । हन्त ते सम्प्रवक्ष्यामि वृत्तिं प्रोक्तां सदात्मनः ॥ २५ ॥ परा चितिर्मे जननी सखी बुद्धिर्मता मम । अविद्या त्वसती सोक्ता यया बुद्धिः सुसङ्गता ॥ २६ ॥ अविद्यायास्तु सामर्थ्यं लोके स्पष्टं विचित्रितम् । यद्रज्जौ सर्पमाभास्य महाभीतिं प्रयच्छति ॥ २७ ॥ महामोहस्तु तत्पुत्रो मनस्तस्य सुतोऽभवत् । तस्य पत्नी कल्पना स्यात्तत्सुताः पञ्च येऽभवन् ॥ २८ ॥ ज्ञानेन्द्रियाणि ते पञ्च तत्स्थानं गोलकं भवेत् । विषयाणां प्रमोषस्तु संस्कारो मनसो भवेत् ॥ २९ ॥ तद्भोगः स्वप्नभोगः स्यात् कल्पनायाः स्वसा तु या । महाशना भवेदाशा तस्या यौ तनुजावुभौ ॥ ३० ॥ भगवान्की कृपा होनेमें यह सबसे पहला लक्षण समझना चाहिये ॥२४॥ दूसरा लक्षण है भोगोंमें विरसता भासना और मनका विचारो- न्मुख हो जाना। अब मैंने आपसे जो सत्य आत्माकी स्थितिका वर्णन किया था उसका स्पष्टीकरण करती हूँ ॥ २५ ॥ परा चिति मेरी माता है; बुद्धि सखी मानी गयी है; अविद्या ही असली स्त्री है, जिसके साथ बुद्धिका मेल हो जाता है ॥ २६ ॥ अविद्याका अद्भुत सामर्थ्य तो लोकमें स्पष्ट ही है कि वह रस्सीमें सर्पकी प्रतीति कराकर अत्यन्त भय उत्पन्न कर देती है ॥ २७ ॥ उसका पुत्र है महामोह और उसके मन नामका पुत्र हुआ। उसकी पत्नी है कल्पना और उससे जो पाँच पुत्र हुए वे हैं पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ। उनके स्थान हैं पाँच इन्द्रियगोलक। उन इन्द्रियोंके विषयोंका सेवन ही मनका संस्कार बन जाता है ॥ २८-२९ ॥ उन संस्कारोंका भोग ही स्वप्नका भोग है। कल्पनाकी जो महाशना (बहुत खाने वाली) बहिन है वह आशा है, उसके जो

अष्टमोऽध्यायः ११३ क्रोधो लोभश्च तावुक्तौ तत्पुरन्तु शरीरकम् । मम यस्तु महामन्त्रः स्वरूपस्फुरणं हि तत् ॥ ३१ ॥ प्राणप्रचारः सम्प्रोक्तो मनसस्तु प्रियः सखा । कान्ताराद्यास्तु नरका एवं सर्वं प्रकीर्त्तितम् ॥ ३२ ॥ मया बुद्धेः सङ्गमस्तु समाधिरभिधीयते । मन्मातृलोकसंप्राप्तिर्मोक्षः प्रिय उदाहृतः ॥ ३३ ॥ एवं प्रोक्तः स्ववृत्तान्तस्त्वमप्येवंविधौ ननु । तद्युक्त्यैतत् सुविज्ञाय परं श्रेयः समाप्नुहि ॥ ३४ ॥ इति श्रीमज्ज्ञानखण्डे हेमचूडोपाख्याने संसारा- ख्यायिकाविवरणे अष्टमोऽध्यायः । दो पुत्र हैं वे क्रोध और लोभ कहे गये हैं। उनका नगर है शरीर। मेरा जो महामन्त्र है वह है स्वरूपका स्फुरण ॥ ३०-३१ ॥ प्राणको ही मनका प्रिय सखा प्रचार कहा गया है और वन आदि हैं नरक। इस प्रकार यह सारे प्रसंगका निरूपण हो गया ॥ ३२ ॥ बुद्धिका मेरे साथ समागम होना—यह समाधि कही गयी है और हे प्रिय ! मेरी माता के लोककी प्राप्ति-यह मुक्ति है ॥ ३३ ॥ इस प्रकार मैंने अपना वृत्तान्त कहा। आप भी निश्चय इसी प्रकार हैं। अतः युक्तिपूर्वक इसका रहस्य समझकर परम श्रेयको प्राप्त कर लीजिये ॥ ३४ ॥ अष्टम अध्याय समाप्त।

नवमोऽध्यायः श्रुत्वेत्थं प्रियया प्रोक्तं हेमचूड़ोऽतिविस्मितः । हर्षगद्गदया वाचा पुनर्वक्तुं प्रचक्रमे ॥ १ ॥ धन्या प्रियेऽसि निपुणा अहो ते ज्ञानवैभवम् । किं वर्णयामि यत् प्रोक्तमाख्यारूपतयाऽखिलम् ॥ २ ॥ एवंविधं स्ववृत्तं मे नाभवद्विदितं क्वचित् । त्वदुक्त्याऽहं सम्प्रति तत् करामलकवत् स्फुटम् ॥ ३ ॥ स्मराम्यनुभवाम्यन्तरहो लोकक्रियाऽद्भुता । का सा परा चितिर्माता कथं तस्यास्तु नो जनिः ॥ ४ ॥ नवम अध्याय ॥ ९ ॥ हेमलताके उपदेशसे हेमचूडको आत्मतत्त्वकी उपलब्धि अपनी प्रियाके द्वारा ऐसा तत्त्वविवेचन सुनकर हेमचूडको बड़ा आश्चर्य हुआ और उसने हर्षगद्गद् वाणीसे पुनः कहना आरम्भ किया ॥ १ ॥ “प्रिये ! तुम धन्य हो, बड़ी ही चतुर हो तथा तुम्हारी ज्ञानसम्पत्ति भी धन्य है। तुमने आख्यायिकाके रूपमें जो कुछ कहा है उसका मैं क्या वर्णन करूँ ? ॥ २ ॥ मुझे इस प्रकारका अपना ही वृत्तान्त पहले कभी विदित नहीं हुआ। अब तुम्हारे कथनसे यह स्थिति हथेलीपर रखे हुए आँवलेके समान स्पष्ट हो गयी है ॥ ३ ॥ अब तो मुझे अपने भीतर ही उस स्थितिका स्मरण और अनुभव हो रहा है। अहो ! यह लोकव्यवहार बड़ा ही विचित्र है। [ पर यह तो बताओ कि ] वह हमारी माता पराचिति क्या है और उससे हमारा जन्म कैसे होता है ? ॥ ४ ॥

नवमोऽध्यायः । ११५ के वा वयं स्वरूपं किमस्माकं तद् ब्रवीहि मे । इति पृष्टा हेमलेखा रामोवाच प्रियं प्रति ॥ ५ ॥ नाथ शृणु प्रवक्ष्यामि गूढार्थमिदमादरात् । विचारयात्मनो रूपं बुद्ध्याऽत्यन्तविशुद्धया ॥ ६ ॥ न दृश्यं नापि तद्द्वाच्यमतो वक्ष्यामि तत् कथम् । ज्ञातस्वात्मस्वरूपो वै ततो ज्ञास्यसि मातरम् ॥ ७ ॥ न ह्यादेशस्वरूपेऽस्ति तत आदेष्टृवर्जितम् । स्वं रूपं स्वात्मना पश्य शुद्धबुद्धिसमाश्रयम् ॥ ८ ॥ देवादितिर्यगन्तानां भान्तं भानैरभासितम् । भान्तं सर्वत्र सर्वस्य सर्वदा भानवर्जितम् ॥ ९ ॥ हम कौन हैं और हमारा स्वरूप क्या है—यह भी मुझसे कहो ।” परशुराम ! इस प्रकार पूछे जानेपर हेमलेखानें अपने प्रियतमसे कहा ॥ ५ ॥ “नाथ ! सुनिये, मैं यह गूढ रहस्य सुनाती हूं। आप आदर- पूर्वक विशुद्ध बुद्धिसे अपने स्वरूपका विचार करें ॥ ६ ॥ वह आत्मतत्त्व न तो देखनेमें आता है और न कहा ही जा सकता है। अतः मैं किस प्रकार उसका वर्णन करूँ। आपको जब उस आत्माके स्वरूपका ज्ञान हो जायगा तभी आप अपनी माताको भी जान सकेंगे ॥ ७ ॥ आत्माके स्वरूपके विषयमें कोई उपदेश भी नहीं हो सकता, इसलिये उसका कोई उपदेश करनेवाला भी नहीं है। आप शुद्ध बुद्धिके आश्रयभूत उस आत्मस्वरूपको आत्मभावसे ही देख सकते हैं* ॥ ८ ॥ वह देवताओंसे लेकर कीट-पतंगादि पर्यन्त सभीके आत्मस्वरूपसे भासमान है, किन्तु किसी भी अन्य प्रकाशसे प्रकाशित होनेवाला नहीं है। वही सबको सर्वत्र ज्ञानरूपसे भास रहा है, किन्तु किसी भी प्रमाण का विषय नहीं है ॥ ९ ॥

  • 'शुद्धबुद्धि' अर्थात् विषयविमुक्त बुद्धिके 'आश्रय'-अधिष्ठान भूत उस आत्म- तत्त्वको निखिल दृश्यरूप अनात्माका निषेध कर देनेपर 'आत्मभाव'से अर्थात दृश्य और दृश्याभावके साक्षीरूपसे ही अनुभव कर सकते हैं।

११६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे कथं कुत्र कदा केन निरूप्येतापि लेशतः । मन्नेत्रं दर्शयत्येवमुक्तमेतत् प्रियाधुना ॥ १० ॥ नात्राचार्यस्योपयोगो यथा नयनदर्शने । निपुणोऽपि महाचार्यः कथं नेत्रं प्रदर्शयेत् ॥ ११ ॥ अतो गुरुपायोऽत्र तदुपायप्रदर्शनात् । तत्ते वक्ष्याम्युपायन्तच्छृणु संयतमानसः ॥ १२ ॥ यावत्त्वमात्मनि ममेत्येवन्तु प्रतिपश्यसि । ततः परं निजं रूपं यन्ममेति न भाति ते ॥ १३ ॥ गत्वैकान्ते विविच्यैतद्यद्यद्भाति ममत्वतः । तत्तत् परित्यज्य परं स्वात्मानमभिलक्षय ॥ १४ ॥ यथाऽहं ते ममत्वेन भासनान्नात्मता मयि । सम्बन्धमात्रादात्मीया न स्वरूपगता ह्यहम् ॥ १५ ॥ उसका किसीके द्वारा किसी भी देश या कालमें किस प्रकार लेशमात्र भी निरूपण किया जा सकता है। प्रियतम ! यह बात ऐसी ही है जैसे कोई कहे कि अब मुझे मेरे नेत्र दिखाओ ॥ १० ॥ जिस प्रकार नेत्रोंको दिखानेमें आचार्यका कोई उपयोग नहीं हो सकता, क्योंकि कोई अत्यन्त कुशल आचार्य भी भला नेत्रोंको कैसे दिखा सकता है ॥ ११ ॥ अतः गुरुदेव तो आत्मदर्शनका उपाय दिखानेके कारण ही इसमें उपयोगी हैं। इसलिये मैं उसका उपाय बताती हूं, आप एकाग्रचित्त होकर सुनें ॥ १२ ॥ आप अपनेमें जहाँतक 'मेरा' ऐसा अनुभव करते हैं, आपका अपना स्वरूप उससे भिन्न ही है, जो आपको 'मेरा' इस रूपसे नहीं भासता ॥ १३ ॥ अब आप एकान्तमें जाकर इसका विवेचन करें और आपको जो कुछ 'मेरा' इस रूपमें प्रतीत हो उसे त्यागकर अपने आत्माको पहिचानें ॥ १४ ॥ जिस प्रकार मैं आपको अपनी रूपसे भासती हूं, इसलिये मुझमें आपका आत्मभाव नहीं हो सकता। केवल सम्बन्ध होनेके कारण आत्मीय तो हूं किन्तु आपके स्वरूपके अन्तर्गत नहीं हूँ ॥ १५ ॥

नवमोऽध्यायः । ११७ ममार्थमखिलं त्यक्त्वा यत्त्यक्तुं नैव शक्यते । तथाऽऽत्मानं समालक्ष्य परं श्रेयः समाप्नुहि ॥ १६ ॥ इत्युक्तः प्रियया हेमचूड उत्थाय वै द्रुतम् । ययावश्वं समारुह्य तत्क्षणे नगराद्बहिः ॥ १७ ॥ उद्यानं नन्दनसमं प्रविश्य क्षणमात्रतः । वनान्तसौधमुन्नम्रं स्फाटिकं प्रविवेश ह ॥ १८ ॥ विसृज्यानुचरान् सर्वान् द्वारपालानशासयत् । न कोऽप्यत्र प्रविशतु मय्येकान्तविचारणे ॥ १९ ॥ राजामात्याश्च गुरवो राजा वाऽप्यत्र सङ्गतः । अप्रवेश्या एव यावदहमाज्ञां दिशामि वः ॥ २० ॥ इत्युक्त्वाऽऽरुह्य सौधाग्र्यं नवमीं भूमिमाविशत् । तत्र वातायने चित्रे सर्वलोकावलोकने ॥ २१ ॥ इसी प्रकार 'अपने' कहे जानेवाले सभी पदार्थोंको त्यागने पर फिर जिसका त्याग न किया जा सके उसीको आत्मा जानकर आप परम कल्याणको प्राप्त करें" ॥ १६ ॥ प्रियाके इस प्रकार कहनेपर हेमचूड तत्काल उठा और घोड़ेपर चढ़कर उसी समय नगरसे बाहर चला गया ॥ १७ ॥ एक क्षणमें ही वह नन्दनवनके समान अपने उद्यानमें पहुँचा और उसके भीतर स्फटिकके बने हुए एक ऊँचे मन्दिरमें प्रविष्ट हो गया ॥ १८ ॥ अपने सभी सेवकोंको उसने बाहर छोड़ दिया और द्वारपालोंको आज्ञा दी की यहाँ एकान्त में विचार करते समय कोई भी भीतर न आये ॥ १६ ॥ चाहे राजमन्त्री, गुरुजन अथवा स्वयं महाराज भी यहाँ आवें तो भी जबतक मैं तुम्हें आज्ञा न दूँ तबतक उन्हें भी प्रवेश नहीं करना चाहिये ॥ २० ॥ ऐसा कह वह महलके ऊपर चढ़कर नवीं मंजिलपर पहुँच गया । वहाँके झरोखे में जहाँसे सब ओरका दृश्य दिखायी देता था,