त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टमोऽध्यायः एवं प्रियावचः श्रुत्वा ज्ञात्वा तत्त्वं महेशितुः । त्रैपुरं चिन्मयं हेमलेखावाक्येन निश्चितम् ॥ १ ॥ आश्वस्तचित्तस्त्रिपुरां गुणरूपां महेश्वरीम् । ज्ञात्वा गुरुभ्यः परमां माहैश्वर्यविभावितः ॥ २ ॥ तामेकभावानुगतो हेमचूड़ोऽभवद् दृढम् । एवं परोपासनेन व्यतीयुः केऽपि मासकाः ॥ ३ ॥ त्रिपुरा परमेशानी प्रसादमकरोद्-हृदि । विषयाद्विमुखं चित्तं विचारपरमं बभौ ॥ ४ ॥ एतावद् दुर्लभं लोके परानुग्रहमन्तरा । विचारप्रवणं चित्तं यन्मुख्यं मोक्षकारणम् ॥ ५ ॥ अष्टम अध्याय ॥ ८ ॥ आख्यायिकाका स्पष्टीकरण इस प्रकार अपनी पत्नीका भाषण सुनकर और हेमलेखाके वाक्यसे ही निश्चित किये हुए परमेश्वरके चिन्मय त्रिपुरारूपको जानकर हेमचूड़का चित्त शान्त हो गया । फिर गुरुओंके द्वारा उसने परम महेश्वरी भगवती त्रिपुराके सगुणरूपको जाना और परमेश्वरकी अनुग्रह शक्तिसे सम्पन्न हो वह एकमात्र उसीके ध्यानमें दृढतासे तत्पर हो गया ॥ १-३ पू० ॥ इस तरह परमेश्वरीकी उपासनामें उसके कुछ महीने व्यतीत हो गये । तब भगवती त्रिपुराने उसके हृदयमें अपनी कृपा प्रकट की । इससे उसका विषयाभिमुख चित्त विचारपरायण हो गया ॥ ३ उ०-४ ॥ परमेश्वरकी कृपाके बिना संसारमें यह बात दुर्लभ ही है, क्योंकि विचारोन्मुख चित्त ही मुक्तिका मुख्य कारण है ॥ ५ ॥