त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टमोऽध्यायः । १०६ राम यावन्न जायेत विचारपरमं मनः । न तावच्छ्रेयसा योग उपायानां शतैः क्वचित् ॥ ६ ॥ अथ भूयः स कस्मिंश्चिद्दिने रहसि वै तया । सङ्गतः प्रिययाऽत्यन्तविचारपरमानसः ॥ ७ ॥ आयान्तं स्वनिकेतं तं दूरात् कान्तं ददर्श सा । उत्थाय तं समानीय स्वासने विनिवेश्य च ॥ ८ ॥ पादप्रक्षालनाद्यैस्तं पूजयित्वा यथाविधि । प्रोवाचामृतनिष्यन्दसुन्दरं परमं वचः ॥ ९ ॥ प्रेष्ठ ! त्वामद्य पश्यामि चिराय ननु ते वपुः । नीरुजं कच्चिदासीद्वै यतो रोगास्पदं वपुः ॥ १० ॥ तन्मामाचक्ष्व वृत्तान्तं यतो नाहं स्मृता त्वया । ननु मामसमालोक्य चाप्रभाष्य कदापि ते ॥ ११ ॥ नात्यगाद्दिनभागोऽपि तदेवं कुत आस्थितम् । मन्येऽहं मेऽनभिमते वर्त्तनं नहि वर्त्मनि ॥ १२ ॥ परशुराम ! जबतक मन विचारोन्मुख नहीं होता तबतक साधन होनेपर भी कभी निःश्रेयसकी प्राप्ति नहीं हो सकती ॥ ६ ॥ तदनन्तर 'किसी दिन एकान्तमें वह फिर अपनी उस प्रियासे मिला । उस समय उसका चित्त अत्यन्त विचारोन्मुख था ॥ ७ ॥ हेमलेखाने दूरसे ही अपने प्रियतमको अपने ही घरकी ओर आते देखा तो वह खड़ी हो गयी। फिर लेजाकर उसे सुन्दर आसनपर बिठाया और पाद-प्रक्षालनादिके द्वारा उसकी विधिवत् पूजाकर मानो अमृत-सा उड़ेलते हुए सुन्दर और तात्त्विक वचनोंमें कहा ॥ ८-६ ॥ "प्रियतम ! आज मैं बहुत काल पश्चात् आपको देख रही हूँ । आप- का शरीर तो स्वस्थ रहा ? क्योंकि शरीर रोगोंका स्थान ही है ॥ १० ॥ आप मुझे अपना वृत्तान्त सुनाइये क्योंकि इतने दिनोंतक आपने मेरा स्मरण भी नहीं किया। मुझे बिना देखे और मुझसे बिना बोले तो कभी दिनके एक अंशमात्र भी आप नहीं रह सकते थे । तब इस प्रकार आप कैसे रह गये ॥ ११-१२ पू० ॥