त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
DevanagariHindipublished404 पृष्ठ
पृष्ठ 124, कुल 404 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 124
११० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे स्वप्ने वापि कुतोऽन्यत्र कुत एवमभूद्वद । कथं रात्रिस्त्वया नीता चैकापि युगसम्मिता ॥ १३ ॥ विना मां च क्षणोऽप्येको युगकल्पः सुदुःसहः । इत्युक्त्वा सा समाश्लिष्य खिन्नेवाभूत् क्षणं ततः ॥ १४ ॥ सोऽपि प्रियासमाश्लिष्टो नैषद्विकृतिमाययौ । प्राह प्रिये न मामेवं विमोहयितुमर्हसि ॥ १५ ॥ ज्ञाता मयाऽसि सुदृढं नास्ति ते शोककारणम् । परावरज्ञा त्वं धीरा मोहस्त्वां वै कथं स्पृशेत् ॥ १६ ॥ तत्त्वां प्रष्टुं समायातो यत्तद्वक्ष्यामि संशृणु । यत् प्राक् स्ववृत्तं कथितं तत् स्फुटं मे समीरय ॥ १७ ॥ का सा ते जननी प्रोक्ता सखी वा तत्पतिश्च कः ।
- मैं समझती हूँ जिसमें मेरी अनुमति न हो उस मार्गमें तो, जाग्रत्- की तो बात ही क्या, आप स्वप्नमें भी नहीं जाते थे। मेरे बिना तो आपको एक क्षण भी युग और कल्पके समान अत्यन्त दुःसह हो जाता था। फिर बतलाइये ऐसा कैसे हुए ? आपने मेरे बिना युगके समान एक रात्रि भी कैसे बिता दी। "ऐसा कहकर वह हेमचूड़से लिपट गयी और फिर क्षणभरके लिये खिन्न-सी हो गयी ॥ १३-१४ ॥ किन्तु इसप्रकार अपनी प्रियासे आलिंगित होनेपर भी हेमचूड़को कुछ भी विकार न हुआ। वह बोला, "प्रिये ! तुम्हें मुझे इस तरह मोहमें नहीं डालना चाहिये ॥ १५ ॥ मैंने तुम्हें अच्छी तरह पहचान लिया है। तुम्हारे लिये शोकका तो कोई भी कारण नहीं है, क्योंकि तुम कार्य-कारणस्वरूप पर ब्रह्मको जाननेवाली और धैर्यशालिनी हो; मोह किस प्रकार तुम्हें स्पर्श कर सकता है ॥ १६ ॥ इस समय मैं तुमसे जो पूछनेके लिये आया हूँ वह बताता हूँ, सुनो। तुमने पहले जो मुझे आत्म-कथा सुनायी थी उसे स्पष्ट करके मुझे समझाओ ॥ १७ ॥ तुमने अपनी वह माता कौन बतलायी थी ? तुम्हारी सखी और