त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमोऽध्यायः । १०७ अपरे तु स्वरूपे हि कल्पितं मुख्यतादि हि । तस्मात् प्राज्ञ उपासीत परं रूपं हि निष्कलम् ॥ ९३ ॥ असमर्थः स्थूलरूपं यद्बुद्धौ सङ्गतं दृढम् । तदुपास्या हेतुतस्तु श्रेयः प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ ९४ ॥ नान्यथास्य गतिः क्वापि भवेद्वै कोटिजन्मभिः ॥ ९५ ॥ इति श्रीमज्ज्ञानखण्डे हेमचूड़ोपाख्याने ईश्वरस्वरूप- निरूपणं सप्तमोऽध्यायः । [ यदि कहो कि शास्त्रोंमें इनकी मुख्यता-गौणता क्यों बतायी गयी है, तो उसका उत्तर यह है, कि ] ये मुख्यता आदि [ भक्तों की भावना- के अनुसार ] भगवान्के इस अपररूपमें ही कल्पित हैं। इसलिये विवेकी पुरुषको तो उनके कलातीत परस्वरूप की ही उपासना करनी चाहिये ॥ ६३ ॥ जो इस प्रकार उपासना करनेमें समर्थ न हो वह उस स्थूल रूपकी निष्काम उपासना करे जो उसकी बुद्धिमें दृढ़तासे जमता हो । इससे भी वह परम निःश्रेयसको प्राप्त कर सकता है। इसके सिवा तो करोड़ों जन्मोंमें भी इसके लिये कोई अन्य मार्ग नहीं हो सकता ॥ ६४-६५ ॥ सप्तम अध्याय समाप्त ।