त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अतो हि दृश्यदेहाद्यमनपेक्ष्य जगत् सृजेत् । नास्ति तस्मात् स्थूलदेहो वस्तुतः प्राणवल्लभ ॥ ८८ ॥ पररूपे ह्यदेहेऽस्मिन् मुह्यन्ति स्थूलबुद्धयः । भक्तियुक्ताश्च तैर्ध्यातो यत्र यत्र यथा यथा ॥ ८९ ॥ तथा धत्तेऽनेकरूपं भक्तचिन्तामणिः स्वयम् । अतश्चेतन एतेन तद्देहः स्याच्चितिः परा ॥ ९० ॥ चितिरेव महासत्ता सम्राज्ञी परमेश्वरी । त्रिपुरा भासते यस्यामविभिन्ना विभिन्नवत् ॥ ९१ ॥ आदर्शनगरप्रख्यं जगदेतच्चराचरम् । तद्रूपैकत्वतस्तत्र नोत्तमाधमभावना ॥ ९२ ॥ इसलिये प्राणप्रिय ! भगवान् दृश्यस्वरूप देहादिकी अपेक्षा न रखकर ही जगत्की रचना करते हैं । अतः वास्तवमें उनका कोई स्थूल शरीर नहीं है ॥ ८८ ॥ किन्तु स्थूलबुद्धि पुरुषोंकी भगवान्के देहातीत परमस्वरूपमें गति नहीं होती । इसलिये भक्तियुक्त होकर उनमेंसे जिस-जिसके द्वारा उनका जैसे-जैसे ध्यान किया जाता है वैसे-वैसे ही वे अनेक प्रकारके रूप धारण कर लेते हैं, क्योंकि वे स्वयं भक्तोंके लिये चिन्तामणिके समान हैं और परम चैतन्य ही उनका शरीर है ॥ ८९-९० ॥ वह चितिरूपा महासत्ता ही सर्वेश्वरी भगवती त्रिपुरा है, जिसमें यह संसार उससे अभिन्न होकर भी विभिन्नकी तरह भासता है ॥ ९१ ॥ यह चराचर जगत् दर्पणमें भासनेवाले नगरके समान है । वह दर्पणस्थानीय चेतन एकरूप ही है । [और वही विष्णु-शिव आदि रूपोंमें उपलब्ध होता है ] इसलिये उनमें उत्तम-अधम आदि भाव नहीं करना चाहिये ॥ ९२ ॥ नहीं हैं। यदि कहें कि सृष्टिको कर्म निरपेक्ष माननेपर तो जीवोंके विभिन्न भोगोंके कारण ईश्वरमें विषमता और निर्दयताका दोष आवेगा, तो इस विषयमें यह समझना चाहिये कि दर्पणमें प्रतीत होनेवाले प्रतिबिम्बके समान जिस प्रकार सारा जगत् आभासमात्र है उसी प्रकार ये कर्मादि भी केवल आभासमात्र हैं। इनकी पारमा- र्थिक सत्ता नहीं है। वस्तुतः तो ये भी चिदेकरसस्वरूप होनेके कारण भगवान्से अभिन्न ही हैं।