भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 119, कुल 404 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 119

सप्तमोऽध्यायः । १०५ भगवांस्तु जगत्कर्त्ता पूर्णस्वातन्त्र्ययोगतः । अनपेक्ष्यैव यत्किञ्चित् सृजत्यविकलं जगत् ॥ ८४ ॥ अतः शरीरं नास्त्येव ह्येष मुख्यविनिश्चयः । अन्यथा लोकवत्कर्त्तु रुपादानाश्रयो भवेत् ॥ ८५ ॥ तथा च देशकालादिकारणप्रचयैर्युतः । जगत् सृजन्महेशानो जीव एव भवेत्तथा ॥ ८६ ॥ पूर्णैश्वर्यं विहन्येत जगत्सृष्टेः पुरापि च । सिद्धयेत्तत्सर्वकर्तृत्वं विहतं स्यान्न संशयः ॥ ८७ ॥ भगवान् तो अपने पूर्ण स्वातन्त्र्यके कारण जगत्के कर्ता हैं। वे तो किसी अन्यकी अपेक्षा न रखकर यह जो कुछ जगत् है सबको रच डालते हैं ॥ ८४ ॥ अतः मुख्य निश्चय यह हुआ कि परमात्मा शरीर नहीं है। नहीं तो लौकिक कर्ताओंकी तरह उसे भी [ लोकरचनाके लिये ] सामग्रीका आश्रय लेना पड़ता ॥ ८५ ॥ और इस प्रकार देश-कालादि करणसमूहयुक्त होकर जगत्की रचना करनेपर तो वह महेश्वर भी एक जीव ही हो जाता ॥ ८६ ॥ यदि सृष्टिसे पहले किसी अन्य सामग्रीकी सत्ता स्वीकार की जाय तो भगवान्की पूर्ण ईश्वरता बाधित हो जायगी और इसमें सन्देह नहीं कि उनका सर्वकर्त्तृत्व भी सिद्ध नहीं हो सकेगा ☸ ॥ ८७ ॥ ☸ यदि सृष्टिसे पूर्व परमाणु या प्रकृति आदि किसी अन्य सामग्री की सत्ता स्वीकार करेंगे तो भगवान्का जगत्कर्त्तृत्व उसके अधीन होनेके कारण उनका पूर्ण ऐश्वर्य नहीं रहेगा और अन्य सामग्रीकी नित्य सत्ता सिद्ध होनेके कारण उनकी अद्वितीयता और विभुता भी बाधित हो जायगी । वैशेषिक मतावलम्बी परमाणुओंकी नित्य सत्ता स्वीकार करते हैं और ऐसा मानते हैं कि ईश्वरकी इच्छा से वे नित्य परमाणु ही मिलकर जगत्की रचना कर देते हैं । परन्तु किसीकी इच्छासे कार्य करनेके लिये प्रवृत्त होना जड परमाणुओंके लिये सम्भव नहीं है। यदि भगवान्के असीम सामर्थ्यका इसे प्रभाव मानें तो उनके अपने अलौकिक साम- र्थ्यसे तो वे परमाणुओंके बिना भी जगत्की रचना कर ही सकते हैं, फिर परमा- णुओंकी नित्य सत्ता मानकर उनकी अद्वितीयता और विभुताको बाधित क्यों किया जाय । इसी प्रकार सांख्योक्त प्रकृति और मीमांसासम्मत कर्म भी माननीय