त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे स एव सर्वथा सर्वः सर्वैरपि निरूपितः । न शिवो नापि विष्णुर्वा न धाता नान्य एव च ॥ ७८ ॥ एतत्ते सम्प्रवक्ष्यामि शृण्वत्यन्तसमाहितः । कर्त्तारं शिवमाहुस्ते पञ्चवक्त्रं त्रिलोचनम् ॥ ७९ ॥ स कर्त्ता घटकत्र्तेव चेतनः सशरीरकः । लोकेऽपि चेतनः कर्त्ता सशरीरो हि दृश्यते ॥ ८० ॥ अशरीरोऽचेतनो वा न कर्त्ता क्वचिदीक्षितः । तत्र मुख्यं हि कर्त्तृत्वं चेतनस्यैव सम्भवेत् ॥ ८१ ॥ यतः स्वप्नेष्वयं जीवो हित्वा स्थूलं शरीरकम् । चैतन्यमयदेहेन सर्वानभिमतान् सृजेत् ॥ ८२ ॥ अतः शरीरं करणं कार्ये कर्तुश्चिदात्मनः । जीवानां करणापेक्षा यतोऽपूर्णा स्वतन्त्रता ॥ ८३ ॥
सबके द्वारा सब रूपोंमें सब प्रकार उसीका निरूपण किया गया है। परन्तु वास्तवमें वह न शिव है, न विष्णु है, न ब्रह्मा है और न कोई अन्य ही है ॥ ७८ ॥ इस रहस्यको मैं स्पष्ट करके समझाती हूँ, आप अत्यन्त सावधान होकर सुनिये । शैव लोग पञ्चमुखी त्रिनयन भगवान् शिवको ही जगत्की रचना करनेवाला मानते हैं ॥ ७९ ॥ घट बनानेवाले कुम्हारकी तरह वह जगत्कर्ता भी चेतन और शरीरधारी हैं । लोकमें भी कर्ता चेतन और सशरीर ही देखा जाता है ॥ ८० ॥ कहीं भी अशरीर और अचेतन कर्ता नहीं देखा गया । इनमें भी कर्त्तृत्व शक्तिका मुख्यतया चेतनमें ही रहना अधिक सम्भव है ॥ ८१ ॥ क्योंकि स्वप्नावस्थामें यह जीव स्थूल शरीरको छोड़कर अपने चैतन्यमय स्वरूपसे ही सारे अभीष्ट पदार्थोंकी रचना कर लेता है ॥८२॥ इसलिये किसी कार्यको करनेमें शरीर चेतन आत्माका केवल करण है। किन्तु करणकी आवश्यकता जीवोंको ही होती है, क्योंकि उनमें पूर्ण स्वातन्त्र्य नहीं है ॥ ८३ ॥