त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
सप्तमोऽध्यायः । १०५ भगवांस्तु जगत्कर्त्ता पूर्णस्वातन्त्र्ययोगतः । अनपेक्ष्यैव यत्किञ्चित् सृजत्यविकलं जगत् ॥ ८४ ॥ अतः शरीरं नास्त्येव ह्येष मुख्यविनिश्चयः । अन्यथा लोकवत्कर्त्तु रुपादानाश्रयो भवेत् ॥ ८५ ॥ तथा च देशकालादिकारणप्रचयैर्युतः । जगत् सृजन्महेशानो जीव एव भवेत्तथा ॥ ८६ ॥ पूर्णैश्वर्यं विहन्येत जगत्सृष्टेः पुरापि च । सिद्धयेत्तत्सर्वकर्तृत्वं विहतं स्यान्न संशयः ॥ ८७ ॥ भगवान् तो अपने पूर्ण स्वातन्त्र्यके कारण जगत्के कर्ता हैं। वे तो किसी अन्यकी अपेक्षा न रखकर यह जो कुछ जगत् है सबको रच डालते हैं ॥ ८४ ॥ अतः मुख्य निश्चय यह हुआ कि परमात्मा शरीर नहीं है। नहीं तो लौकिक कर्ताओंकी तरह उसे भी [ लोकरचनाके लिये ] सामग्रीका आश्रय लेना पड़ता ॥ ८५ ॥ और इस प्रकार देश-कालादि करणसमूहयुक्त होकर जगत्की रचना करनेपर तो वह महेश्वर भी एक जीव ही हो जाता ॥ ८६ ॥ यदि सृष्टिसे पहले किसी अन्य सामग्रीकी सत्ता स्वीकार की जाय तो भगवान्की पूर्ण ईश्वरता बाधित हो जायगी और इसमें सन्देह नहीं कि उनका सर्वकर्त्तृत्व भी सिद्ध नहीं हो सकेगा ☸ ॥ ८७ ॥ ☸ यदि सृष्टिसे पूर्व परमाणु या प्रकृति आदि किसी अन्य सामग्री की सत्ता स्वीकार करेंगे तो भगवान्का जगत्कर्त्तृत्व उसके अधीन होनेके कारण उनका पूर्ण ऐश्वर्य नहीं रहेगा और अन्य सामग्रीकी नित्य सत्ता सिद्ध होनेके कारण उनकी अद्वितीयता और विभुता भी बाधित हो जायगी । वैशेषिक मतावलम्बी परमाणुओंकी नित्य सत्ता स्वीकार करते हैं और ऐसा मानते हैं कि ईश्वरकी इच्छा से वे नित्य परमाणु ही मिलकर जगत्की रचना कर देते हैं । परन्तु किसीकी इच्छासे कार्य करनेके लिये प्रवृत्त होना जड परमाणुओंके लिये सम्भव नहीं है। यदि भगवान्के असीम सामर्थ्यका इसे प्रभाव मानें तो उनके अपने अलौकिक साम- र्थ्यसे तो वे परमाणुओंके बिना भी जगत्की रचना कर ही सकते हैं, फिर परमा- णुओंकी नित्य सत्ता मानकर उनकी अद्वितीयता और विभुताको बाधित क्यों किया जाय । इसी प्रकार सांख्योक्त प्रकृति और मीमांसासम्मत कर्म भी माननीय
१०६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अतो हि दृश्यदेहाद्यमनपेक्ष्य जगत् सृजेत् । नास्ति तस्मात् स्थूलदेहो वस्तुतः प्राणवल्लभ ॥ ८८ ॥ पररूपे ह्यदेहेऽस्मिन् मुह्यन्ति स्थूलबुद्धयः । भक्तियुक्ताश्च तैर्ध्यातो यत्र यत्र यथा यथा ॥ ८९ ॥ तथा धत्तेऽनेकरूपं भक्तचिन्तामणिः स्वयम् । अतश्चेतन एतेन तद्देहः स्याच्चितिः परा ॥ ९० ॥ चितिरेव महासत्ता सम्राज्ञी परमेश्वरी । त्रिपुरा भासते यस्यामविभिन्ना विभिन्नवत् ॥ ९१ ॥ आदर्शनगरप्रख्यं जगदेतच्चराचरम् । तद्रूपैकत्वतस्तत्र नोत्तमाधमभावना ॥ ९२ ॥ इसलिये प्राणप्रिय ! भगवान् दृश्यस्वरूप देहादिकी अपेक्षा न रखकर ही जगत्की रचना करते हैं । अतः वास्तवमें उनका कोई स्थूल शरीर नहीं है ॥ ८८ ॥ किन्तु स्थूलबुद्धि पुरुषोंकी भगवान्के देहातीत परमस्वरूपमें गति नहीं होती । इसलिये भक्तियुक्त होकर उनमेंसे जिस-जिसके द्वारा उनका जैसे-जैसे ध्यान किया जाता है वैसे-वैसे ही वे अनेक प्रकारके रूप धारण कर लेते हैं, क्योंकि वे स्वयं भक्तोंके लिये चिन्तामणिके समान हैं और परम चैतन्य ही उनका शरीर है ॥ ८९-९० ॥ वह चितिरूपा महासत्ता ही सर्वेश्वरी भगवती त्रिपुरा है, जिसमें यह संसार उससे अभिन्न होकर भी विभिन्नकी तरह भासता है ॥ ९१ ॥ यह चराचर जगत् दर्पणमें भासनेवाले नगरके समान है । वह दर्पणस्थानीय चेतन एकरूप ही है । [और वही विष्णु-शिव आदि रूपोंमें उपलब्ध होता है ] इसलिये उनमें उत्तम-अधम आदि भाव नहीं करना चाहिये ॥ ९२ ॥ नहीं हैं। यदि कहें कि सृष्टिको कर्म निरपेक्ष माननेपर तो जीवोंके विभिन्न भोगोंके कारण ईश्वरमें विषमता और निर्दयताका दोष आवेगा, तो इस विषयमें यह समझना चाहिये कि दर्पणमें प्रतीत होनेवाले प्रतिबिम्बके समान जिस प्रकार सारा जगत् आभासमात्र है उसी प्रकार ये कर्मादि भी केवल आभासमात्र हैं। इनकी पारमा- र्थिक सत्ता नहीं है। वस्तुतः तो ये भी चिदेकरसस्वरूप होनेके कारण भगवान्से अभिन्न ही हैं।
सप्तमोऽध्यायः । १०७ अपरे तु स्वरूपे हि कल्पितं मुख्यतादि हि । तस्मात् प्राज्ञ उपासीत परं रूपं हि निष्कलम् ॥ ९३ ॥ असमर्थः स्थूलरूपं यद्बुद्धौ सङ्गतं दृढम् । तदुपास्या हेतुतस्तु श्रेयः प्राप्नोत्यनुत्तमम् ॥ ९४ ॥ नान्यथास्य गतिः क्वापि भवेद्वै कोटिजन्मभिः ॥ ९५ ॥ इति श्रीमज्ज्ञानखण्डे हेमचूड़ोपाख्याने ईश्वरस्वरूप- निरूपणं सप्तमोऽध्यायः । [ यदि कहो कि शास्त्रोंमें इनकी मुख्यता-गौणता क्यों बतायी गयी है, तो उसका उत्तर यह है, कि ] ये मुख्यता आदि [ भक्तों की भावना- के अनुसार ] भगवान्के इस अपररूपमें ही कल्पित हैं। इसलिये विवेकी पुरुषको तो उनके कलातीत परस्वरूप की ही उपासना करनी चाहिये ॥ ६३ ॥ जो इस प्रकार उपासना करनेमें समर्थ न हो वह उस स्थूल रूपकी निष्काम उपासना करे जो उसकी बुद्धिमें दृढ़तासे जमता हो । इससे भी वह परम निःश्रेयसको प्राप्त कर सकता है। इसके सिवा तो करोड़ों जन्मोंमें भी इसके लिये कोई अन्य मार्ग नहीं हो सकता ॥ ६४-६५ ॥ सप्तम अध्याय समाप्त ।
अष्टमोऽध्यायः एवं प्रियावचः श्रुत्वा ज्ञात्वा तत्त्वं महेशितुः । त्रैपुरं चिन्मयं हेमलेखावाक्येन निश्चितम् ॥ १ ॥ आश्वस्तचित्तस्त्रिपुरां गुणरूपां महेश्वरीम् । ज्ञात्वा गुरुभ्यः परमां माहैश्वर्यविभावितः ॥ २ ॥ तामेकभावानुगतो हेमचूड़ोऽभवद् दृढम् । एवं परोपासनेन व्यतीयुः केऽपि मासकाः ॥ ३ ॥ त्रिपुरा परमेशानी प्रसादमकरोद्-हृदि । विषयाद्विमुखं चित्तं विचारपरमं बभौ ॥ ४ ॥ एतावद् दुर्लभं लोके परानुग्रहमन्तरा । विचारप्रवणं चित्तं यन्मुख्यं मोक्षकारणम् ॥ ५ ॥ अष्टम अध्याय ॥ ८ ॥ आख्यायिकाका स्पष्टीकरण इस प्रकार अपनी पत्नीका भाषण सुनकर और हेमलेखाके वाक्यसे ही निश्चित किये हुए परमेश्वरके चिन्मय त्रिपुरारूपको जानकर हेमचूड़का चित्त शान्त हो गया । फिर गुरुओंके द्वारा उसने परम महेश्वरी भगवती त्रिपुराके सगुणरूपको जाना और परमेश्वरकी अनुग्रह शक्तिसे सम्पन्न हो वह एकमात्र उसीके ध्यानमें दृढतासे तत्पर हो गया ॥ १-३ पू० ॥ इस तरह परमेश्वरीकी उपासनामें उसके कुछ महीने व्यतीत हो गये । तब भगवती त्रिपुराने उसके हृदयमें अपनी कृपा प्रकट की । इससे उसका विषयाभिमुख चित्त विचारपरायण हो गया ॥ ३ उ०-४ ॥ परमेश्वरकी कृपाके बिना संसारमें यह बात दुर्लभ ही है, क्योंकि विचारोन्मुख चित्त ही मुक्तिका मुख्य कारण है ॥ ५ ॥
अष्टमोऽध्यायः । १०६ राम यावन्न जायेत विचारपरमं मनः । न तावच्छ्रेयसा योग उपायानां शतैः क्वचित् ॥ ६ ॥ अथ भूयः स कस्मिंश्चिद्दिने रहसि वै तया । सङ्गतः प्रिययाऽत्यन्तविचारपरमानसः ॥ ७ ॥ आयान्तं स्वनिकेतं तं दूरात् कान्तं ददर्श सा । उत्थाय तं समानीय स्वासने विनिवेश्य च ॥ ८ ॥ पादप्रक्षालनाद्यैस्तं पूजयित्वा यथाविधि । प्रोवाचामृतनिष्यन्दसुन्दरं परमं वचः ॥ ९ ॥ प्रेष्ठ ! त्वामद्य पश्यामि चिराय ननु ते वपुः । नीरुजं कच्चिदासीद्वै यतो रोगास्पदं वपुः ॥ १० ॥ तन्मामाचक्ष्व वृत्तान्तं यतो नाहं स्मृता त्वया । ननु मामसमालोक्य चाप्रभाष्य कदापि ते ॥ ११ ॥ नात्यगाद्दिनभागोऽपि तदेवं कुत आस्थितम् । मन्येऽहं मेऽनभिमते वर्त्तनं नहि वर्त्मनि ॥ १२ ॥ परशुराम ! जबतक मन विचारोन्मुख नहीं होता तबतक साधन होनेपर भी कभी निःश्रेयसकी प्राप्ति नहीं हो सकती ॥ ६ ॥ तदनन्तर 'किसी दिन एकान्तमें वह फिर अपनी उस प्रियासे मिला । उस समय उसका चित्त अत्यन्त विचारोन्मुख था ॥ ७ ॥ हेमलेखाने दूरसे ही अपने प्रियतमको अपने ही घरकी ओर आते देखा तो वह खड़ी हो गयी। फिर लेजाकर उसे सुन्दर आसनपर बिठाया और पाद-प्रक्षालनादिके द्वारा उसकी विधिवत् पूजाकर मानो अमृत-सा उड़ेलते हुए सुन्दर और तात्त्विक वचनोंमें कहा ॥ ८-६ ॥ "प्रियतम ! आज मैं बहुत काल पश्चात् आपको देख रही हूँ । आप- का शरीर तो स्वस्थ रहा ? क्योंकि शरीर रोगोंका स्थान ही है ॥ १० ॥ आप मुझे अपना वृत्तान्त सुनाइये क्योंकि इतने दिनोंतक आपने मेरा स्मरण भी नहीं किया। मुझे बिना देखे और मुझसे बिना बोले तो कभी दिनके एक अंशमात्र भी आप नहीं रह सकते थे । तब इस प्रकार आप कैसे रह गये ॥ ११-१२ पू० ॥
११० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे स्वप्ने वापि कुतोऽन्यत्र कुत एवमभूद्वद । कथं रात्रिस्त्वया नीता चैकापि युगसम्मिता ॥ १३ ॥ विना मां च क्षणोऽप्येको युगकल्पः सुदुःसहः । इत्युक्त्वा सा समाश्लिष्य खिन्नेवाभूत् क्षणं ततः ॥ १४ ॥ सोऽपि प्रियासमाश्लिष्टो नैषद्विकृतिमाययौ । प्राह प्रिये न मामेवं विमोहयितुमर्हसि ॥ १५ ॥ ज्ञाता मयाऽसि सुदृढं नास्ति ते शोककारणम् । परावरज्ञा त्वं धीरा मोहस्त्वां वै कथं स्पृशेत् ॥ १६ ॥ तत्त्वां प्रष्टुं समायातो यत्तद्वक्ष्यामि संशृणु । यत् प्राक् स्ववृत्तं कथितं तत् स्फुटं मे समीरय ॥ १७ ॥ का सा ते जननी प्रोक्ता सखी वा तत्पतिश्च कः ।
- मैं समझती हूँ जिसमें मेरी अनुमति न हो उस मार्गमें तो, जाग्रत्- की तो बात ही क्या, आप स्वप्नमें भी नहीं जाते थे। मेरे बिना तो आपको एक क्षण भी युग और कल्पके समान अत्यन्त दुःसह हो जाता था। फिर बतलाइये ऐसा कैसे हुए ? आपने मेरे बिना युगके समान एक रात्रि भी कैसे बिता दी। "ऐसा कहकर वह हेमचूड़से लिपट गयी और फिर क्षणभरके लिये खिन्न-सी हो गयी ॥ १३-१४ ॥ किन्तु इसप्रकार अपनी प्रियासे आलिंगित होनेपर भी हेमचूड़को कुछ भी विकार न हुआ। वह बोला, "प्रिये ! तुम्हें मुझे इस तरह मोहमें नहीं डालना चाहिये ॥ १५ ॥ मैंने तुम्हें अच्छी तरह पहचान लिया है। तुम्हारे लिये शोकका तो कोई भी कारण नहीं है, क्योंकि तुम कार्य-कारणस्वरूप पर ब्रह्मको जाननेवाली और धैर्यशालिनी हो; मोह किस प्रकार तुम्हें स्पर्श कर सकता है ॥ १६ ॥ इस समय मैं तुमसे जो पूछनेके लिये आया हूँ वह बताता हूँ, सुनो। तुमने पहले जो मुझे आत्म-कथा सुनायी थी उसे स्पष्ट करके मुझे समझाओ ॥ १७ ॥ तुमने अपनी वह माता कौन बतलायी थी ? तुम्हारी सखी और
अष्टमोऽध्यायः । १११ तत् पुत्राद्या अपि च के मम वा ते क्व संवद ॥ १८ ॥ न तन्मया सुविदितं न तन्मन्ये मृषोदितम् । किन्तु त्वया निगदितं व्यपदेशेन सर्वथा ॥ १९ ॥ तद्विविच्य प्रकथय यथा ज्ञास्ये त्वहं स्फुटम् । अहं त्वां सुप्रसन्नोऽस्मि छिन्धि मे हृदि संशयम् ॥ २० ॥ एवमुक्ता हेमलेखा प्रसन्नवदनेक्षणा । मत्वा सुनिर्मलधियं परानुग्रहसंयुतम् ॥ २१ ॥ नूनमेषोऽतिविमुखो विषयेभ्योऽतिधैर्यतः । विष्णुशक्त्या महेशान्या फलितः पुण्यसञ्चयः ॥ २२ ॥ कालः प्रबोधने चायं बोधयामि ततस्त्विमम् । नाथ तेऽद्य महाभाग्यं प्राप्तमीशकृपावशात् ॥ २३ ॥ अन्यथा नैव विषयवैरस्यं पश्यति क्वचित् । उसका पति कौन थे ? उसके पुत्रादि कौन थे ? और बताओ, मुझसे उनका कब सम्पर्क हुआ ॥ १८ ॥ मैं उस प्रसंगको ठीक-ठीक नहीं समझ सका । मैं ऐसा भी नहीं मानता कि तुमने झूठ कहा होगा । किन्तु तुमने वह बात सर्वथा सांकेतिक भाषामें कही है ॥ १९ ॥ तुम उसे स्पष्ट करके कहो, जिससे मैं साफ-साफ समझ जाऊँ । मैं तुमपर अत्यन्त प्रसन्न हूँ, मेरे हृदयमें जो सन्देह है उसे दूर कर दो" ॥ २० ॥ हेमचूड़के ऐसा कहनेपर हेमलेखाके मुख और नेत्र खिल गये । उसने समझ लिया कि परमात्मा की कृपासे सम्पन्न होकर इनकी बुद्धि अत्यन्त शुद्ध हो गयी है ॥ २१ ॥ निश्चय ही अत्यन्त धैर्यपूर्वक ये विषयोंसे सर्वथा विमुख हैं । भगवती विष्णुशक्ति की कृपासे इनके पुण्यपुञ्ज फलोन्मुख हो गये हैं ॥ २२ ॥ अब इनके तत्त्व-बोधका समय आ गया है, अतः मैं इन्हें ज्ञानोपदेश करूँगी । [फिर बोली—] “नाथ ! भगवान्की कृपासे आपका परम सौभाग्य उदय हुआ है ॥ २३ ॥ नहीं तो कहीं कोई विषयोंमें नीरसताका अनुभव नहीं कर सकता ।
११२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे एतल्लक्षणमीशस्यानुग्रहे ज्ञेयमादितः ॥ २४ ॥ भोगवैरस्यमपरं विचारप्रवणं मनः । हन्त ते सम्प्रवक्ष्यामि वृत्तिं प्रोक्तां सदात्मनः ॥ २५ ॥ परा चितिर्मे जननी सखी बुद्धिर्मता मम । अविद्या त्वसती सोक्ता यया बुद्धिः सुसङ्गता ॥ २६ ॥ अविद्यायास्तु सामर्थ्यं लोके स्पष्टं विचित्रितम् । यद्रज्जौ सर्पमाभास्य महाभीतिं प्रयच्छति ॥ २७ ॥ महामोहस्तु तत्पुत्रो मनस्तस्य सुतोऽभवत् । तस्य पत्नी कल्पना स्यात्तत्सुताः पञ्च येऽभवन् ॥ २८ ॥ ज्ञानेन्द्रियाणि ते पञ्च तत्स्थानं गोलकं भवेत् । विषयाणां प्रमोषस्तु संस्कारो मनसो भवेत् ॥ २९ ॥ तद्भोगः स्वप्नभोगः स्यात् कल्पनायाः स्वसा तु या । महाशना भवेदाशा तस्या यौ तनुजावुभौ ॥ ३० ॥ भगवान्की कृपा होनेमें यह सबसे पहला लक्षण समझना चाहिये ॥२४॥ दूसरा लक्षण है भोगोंमें विरसता भासना और मनका विचारो- न्मुख हो जाना। अब मैंने आपसे जो सत्य आत्माकी स्थितिका वर्णन किया था उसका स्पष्टीकरण करती हूँ ॥ २५ ॥ परा चिति मेरी माता है; बुद्धि सखी मानी गयी है; अविद्या ही असली स्त्री है, जिसके साथ बुद्धिका मेल हो जाता है ॥ २६ ॥ अविद्याका अद्भुत सामर्थ्य तो लोकमें स्पष्ट ही है कि वह रस्सीमें सर्पकी प्रतीति कराकर अत्यन्त भय उत्पन्न कर देती है ॥ २७ ॥ उसका पुत्र है महामोह और उसके मन नामका पुत्र हुआ। उसकी पत्नी है कल्पना और उससे जो पाँच पुत्र हुए वे हैं पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ। उनके स्थान हैं पाँच इन्द्रियगोलक। उन इन्द्रियोंके विषयोंका सेवन ही मनका संस्कार बन जाता है ॥ २८-२९ ॥ उन संस्कारोंका भोग ही स्वप्नका भोग है। कल्पनाकी जो महाशना (बहुत खाने वाली) बहिन है वह आशा है, उसके जो
अष्टमोऽध्यायः ११३ क्रोधो लोभश्च तावुक्तौ तत्पुरन्तु शरीरकम् । मम यस्तु महामन्त्रः स्वरूपस्फुरणं हि तत् ॥ ३१ ॥ प्राणप्रचारः सम्प्रोक्तो मनसस्तु प्रियः सखा । कान्ताराद्यास्तु नरका एवं सर्वं प्रकीर्त्तितम् ॥ ३२ ॥ मया बुद्धेः सङ्गमस्तु समाधिरभिधीयते । मन्मातृलोकसंप्राप्तिर्मोक्षः प्रिय उदाहृतः ॥ ३३ ॥ एवं प्रोक्तः स्ववृत्तान्तस्त्वमप्येवंविधौ ननु । तद्युक्त्यैतत् सुविज्ञाय परं श्रेयः समाप्नुहि ॥ ३४ ॥ इति श्रीमज्ज्ञानखण्डे हेमचूडोपाख्याने संसारा- ख्यायिकाविवरणे अष्टमोऽध्यायः । दो पुत्र हैं वे क्रोध और लोभ कहे गये हैं। उनका नगर है शरीर। मेरा जो महामन्त्र है वह है स्वरूपका स्फुरण ॥ ३०-३१ ॥ प्राणको ही मनका प्रिय सखा प्रचार कहा गया है और वन आदि हैं नरक। इस प्रकार यह सारे प्रसंगका निरूपण हो गया ॥ ३२ ॥ बुद्धिका मेरे साथ समागम होना—यह समाधि कही गयी है और हे प्रिय ! मेरी माता के लोककी प्राप्ति-यह मुक्ति है ॥ ३३ ॥ इस प्रकार मैंने अपना वृत्तान्त कहा। आप भी निश्चय इसी प्रकार हैं। अतः युक्तिपूर्वक इसका रहस्य समझकर परम श्रेयको प्राप्त कर लीजिये ॥ ३४ ॥ अष्टम अध्याय समाप्त।
नवमोऽध्यायः श्रुत्वेत्थं प्रियया प्रोक्तं हेमचूड़ोऽतिविस्मितः । हर्षगद्गदया वाचा पुनर्वक्तुं प्रचक्रमे ॥ १ ॥ धन्या प्रियेऽसि निपुणा अहो ते ज्ञानवैभवम् । किं वर्णयामि यत् प्रोक्तमाख्यारूपतयाऽखिलम् ॥ २ ॥ एवंविधं स्ववृत्तं मे नाभवद्विदितं क्वचित् । त्वदुक्त्याऽहं सम्प्रति तत् करामलकवत् स्फुटम् ॥ ३ ॥ स्मराम्यनुभवाम्यन्तरहो लोकक्रियाऽद्भुता । का सा परा चितिर्माता कथं तस्यास्तु नो जनिः ॥ ४ ॥ नवम अध्याय ॥ ९ ॥ हेमलताके उपदेशसे हेमचूडको आत्मतत्त्वकी उपलब्धि अपनी प्रियाके द्वारा ऐसा तत्त्वविवेचन सुनकर हेमचूडको बड़ा आश्चर्य हुआ और उसने हर्षगद्गद् वाणीसे पुनः कहना आरम्भ किया ॥ १ ॥ “प्रिये ! तुम धन्य हो, बड़ी ही चतुर हो तथा तुम्हारी ज्ञानसम्पत्ति भी धन्य है। तुमने आख्यायिकाके रूपमें जो कुछ कहा है उसका मैं क्या वर्णन करूँ ? ॥ २ ॥ मुझे इस प्रकारका अपना ही वृत्तान्त पहले कभी विदित नहीं हुआ। अब तुम्हारे कथनसे यह स्थिति हथेलीपर रखे हुए आँवलेके समान स्पष्ट हो गयी है ॥ ३ ॥ अब तो मुझे अपने भीतर ही उस स्थितिका स्मरण और अनुभव हो रहा है। अहो ! यह लोकव्यवहार बड़ा ही विचित्र है। [ पर यह तो बताओ कि ] वह हमारी माता पराचिति क्या है और उससे हमारा जन्म कैसे होता है ? ॥ ४ ॥
नवमोऽध्यायः । ११५ के वा वयं स्वरूपं किमस्माकं तद् ब्रवीहि मे । इति पृष्टा हेमलेखा रामोवाच प्रियं प्रति ॥ ५ ॥ नाथ शृणु प्रवक्ष्यामि गूढार्थमिदमादरात् । विचारयात्मनो रूपं बुद्ध्याऽत्यन्तविशुद्धया ॥ ६ ॥ न दृश्यं नापि तद्द्वाच्यमतो वक्ष्यामि तत् कथम् । ज्ञातस्वात्मस्वरूपो वै ततो ज्ञास्यसि मातरम् ॥ ७ ॥ न ह्यादेशस्वरूपेऽस्ति तत आदेष्टृवर्जितम् । स्वं रूपं स्वात्मना पश्य शुद्धबुद्धिसमाश्रयम् ॥ ८ ॥ देवादितिर्यगन्तानां भान्तं भानैरभासितम् । भान्तं सर्वत्र सर्वस्य सर्वदा भानवर्जितम् ॥ ९ ॥ हम कौन हैं और हमारा स्वरूप क्या है—यह भी मुझसे कहो ।” परशुराम ! इस प्रकार पूछे जानेपर हेमलेखानें अपने प्रियतमसे कहा ॥ ५ ॥ “नाथ ! सुनिये, मैं यह गूढ रहस्य सुनाती हूं। आप आदर- पूर्वक विशुद्ध बुद्धिसे अपने स्वरूपका विचार करें ॥ ६ ॥ वह आत्मतत्त्व न तो देखनेमें आता है और न कहा ही जा सकता है। अतः मैं किस प्रकार उसका वर्णन करूँ। आपको जब उस आत्माके स्वरूपका ज्ञान हो जायगा तभी आप अपनी माताको भी जान सकेंगे ॥ ७ ॥ आत्माके स्वरूपके विषयमें कोई उपदेश भी नहीं हो सकता, इसलिये उसका कोई उपदेश करनेवाला भी नहीं है। आप शुद्ध बुद्धिके आश्रयभूत उस आत्मस्वरूपको आत्मभावसे ही देख सकते हैं* ॥ ८ ॥ वह देवताओंसे लेकर कीट-पतंगादि पर्यन्त सभीके आत्मस्वरूपसे भासमान है, किन्तु किसी भी अन्य प्रकाशसे प्रकाशित होनेवाला नहीं है। वही सबको सर्वत्र ज्ञानरूपसे भास रहा है, किन्तु किसी भी प्रमाण का विषय नहीं है ॥ ९ ॥
- 'शुद्धबुद्धि' अर्थात् विषयविमुक्त बुद्धिके 'आश्रय'-अधिष्ठान भूत उस आत्म- तत्त्वको निखिल दृश्यरूप अनात्माका निषेध कर देनेपर 'आत्मभाव'से अर्थात दृश्य और दृश्याभावके साक्षीरूपसे ही अनुभव कर सकते हैं।
११६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे कथं कुत्र कदा केन निरूप्येतापि लेशतः । मन्नेत्रं दर्शयत्येवमुक्तमेतत् प्रियाधुना ॥ १० ॥ नात्राचार्यस्योपयोगो यथा नयनदर्शने । निपुणोऽपि महाचार्यः कथं नेत्रं प्रदर्शयेत् ॥ ११ ॥ अतो गुरुपायोऽत्र तदुपायप्रदर्शनात् । तत्ते वक्ष्याम्युपायन्तच्छृणु संयतमानसः ॥ १२ ॥ यावत्त्वमात्मनि ममेत्येवन्तु प्रतिपश्यसि । ततः परं निजं रूपं यन्ममेति न भाति ते ॥ १३ ॥ गत्वैकान्ते विविच्यैतद्यद्यद्भाति ममत्वतः । तत्तत् परित्यज्य परं स्वात्मानमभिलक्षय ॥ १४ ॥ यथाऽहं ते ममत्वेन भासनान्नात्मता मयि । सम्बन्धमात्रादात्मीया न स्वरूपगता ह्यहम् ॥ १५ ॥ उसका किसीके द्वारा किसी भी देश या कालमें किस प्रकार लेशमात्र भी निरूपण किया जा सकता है। प्रियतम ! यह बात ऐसी ही है जैसे कोई कहे कि अब मुझे मेरे नेत्र दिखाओ ॥ १० ॥ जिस प्रकार नेत्रोंको दिखानेमें आचार्यका कोई उपयोग नहीं हो सकता, क्योंकि कोई अत्यन्त कुशल आचार्य भी भला नेत्रोंको कैसे दिखा सकता है ॥ ११ ॥ अतः गुरुदेव तो आत्मदर्शनका उपाय दिखानेके कारण ही इसमें उपयोगी हैं। इसलिये मैं उसका उपाय बताती हूं, आप एकाग्रचित्त होकर सुनें ॥ १२ ॥ आप अपनेमें जहाँतक 'मेरा' ऐसा अनुभव करते हैं, आपका अपना स्वरूप उससे भिन्न ही है, जो आपको 'मेरा' इस रूपसे नहीं भासता ॥ १३ ॥ अब आप एकान्तमें जाकर इसका विवेचन करें और आपको जो कुछ 'मेरा' इस रूपमें प्रतीत हो उसे त्यागकर अपने आत्माको पहिचानें ॥ १४ ॥ जिस प्रकार मैं आपको अपनी रूपसे भासती हूं, इसलिये मुझमें आपका आत्मभाव नहीं हो सकता। केवल सम्बन्ध होनेके कारण आत्मीय तो हूं किन्तु आपके स्वरूपके अन्तर्गत नहीं हूँ ॥ १५ ॥
नवमोऽध्यायः । ११७ ममार्थमखिलं त्यक्त्वा यत्त्यक्तुं नैव शक्यते । तथाऽऽत्मानं समालक्ष्य परं श्रेयः समाप्नुहि ॥ १६ ॥ इत्युक्तः प्रियया हेमचूड उत्थाय वै द्रुतम् । ययावश्वं समारुह्य तत्क्षणे नगराद्बहिः ॥ १७ ॥ उद्यानं नन्दनसमं प्रविश्य क्षणमात्रतः । वनान्तसौधमुन्नम्रं स्फाटिकं प्रविवेश ह ॥ १८ ॥ विसृज्यानुचरान् सर्वान् द्वारपालानशासयत् । न कोऽप्यत्र प्रविशतु मय्येकान्तविचारणे ॥ १९ ॥ राजामात्याश्च गुरवो राजा वाऽप्यत्र सङ्गतः । अप्रवेश्या एव यावदहमाज्ञां दिशामि वः ॥ २० ॥ इत्युक्त्वाऽऽरुह्य सौधाग्र्यं नवमीं भूमिमाविशत् । तत्र वातायने चित्रे सर्वलोकावलोकने ॥ २१ ॥ इसी प्रकार 'अपने' कहे जानेवाले सभी पदार्थोंको त्यागने पर फिर जिसका त्याग न किया जा सके उसीको आत्मा जानकर आप परम कल्याणको प्राप्त करें" ॥ १६ ॥ प्रियाके इस प्रकार कहनेपर हेमचूड तत्काल उठा और घोड़ेपर चढ़कर उसी समय नगरसे बाहर चला गया ॥ १७ ॥ एक क्षणमें ही वह नन्दनवनके समान अपने उद्यानमें पहुँचा और उसके भीतर स्फटिकके बने हुए एक ऊँचे मन्दिरमें प्रविष्ट हो गया ॥ १८ ॥ अपने सभी सेवकोंको उसने बाहर छोड़ दिया और द्वारपालोंको आज्ञा दी की यहाँ एकान्त में विचार करते समय कोई भी भीतर न आये ॥ १६ ॥ चाहे राजमन्त्री, गुरुजन अथवा स्वयं महाराज भी यहाँ आवें तो भी जबतक मैं तुम्हें आज्ञा न दूँ तबतक उन्हें भी प्रवेश नहीं करना चाहिये ॥ २० ॥ ऐसा कह वह महलके ऊपर चढ़कर नवीं मंजिलपर पहुँच गया । वहाँके झरोखे में जहाँसे सब ओरका दृश्य दिखायी देता था,
११८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे आसने मृदूतूलाढ्ये विवेशान्यत्रिवर्जितः । मनः समाधाय दृढं विचारमकरोत्तदा ॥ २२ ॥ नूनमेते जनाः सर्वे कथमेवं विमोहिताः । न कोऽप्यत्र विजानाति स्वात्मानं लेशतोऽपि च ॥ २३ ॥ सर्वोऽपि स्वात्मनो हेतोः करोति विविधाः क्रियाः । केचित् पठन्ति शास्त्राणि साम्नायानि च नित्यशः ॥ २४ ॥ केचिद्धनान्यर्जयन्ति केचिच्छासति चावनिम् । अन्ये युध्यन्ति रिपुभिरन्ये भोगैकलम्पटाः ॥ २५ ॥ कुर्वन्त्येतत् स्वार्थमेते स्वस्वात्मा कतमो भवेत् । नैनं जानाति कोऽप्यत्र कुत एवमयं भ्रमः ॥ २६ ॥ अहो यथावदात्मानमविदित्वाैव वै कृतम् । व्यर्थं स्वप्ने कृतमिव तदद्य विमृशामि तम् ॥ २७ ॥ कोमल रुईसे भरे गद्दे पर बैठ गया और मनको अच्छी तरह एकाग्रकर विचार करने लगा । उस समय वहाँ और कोई नहीं था ॥ २१-२२ ॥ 'सचमुच ये सब लोग ऐसा क्यों मोहमें पड़े हैं ? यहाँ कोई अपने आत्मस्वरूपको लेशमात्र भी तो नहीं जानता ! ॥ २३ ॥ सब लोग अपने सुखके लिये ही तरह-तरहके कर्म कर रहे हैं । कोई नित्यप्रति शास्त्राध्ययन करते हैं और कोई वेदपाठमें लगे हुए हैं ॥ २४ ॥ कोई धनोपार्जन करते हैं, कोई पृथ्वीका शासन कर रहे हैं, कोई शत्रुओंके साथ युद्ध करनेमें संलग्न हैं और कोई भोग भोगनेमें मस्त हैं ॥ २५ ॥ ये सब कार्य अपने ही लिये समझकर किये जाते हैं, किन्तु यह कोई नहीं जानता कि अपना आत्मा कौन है । ऐसा भ्रम कैसे हो गया ॥ २६ ॥ अहो ! इस आत्मतत्त्वको यथावत् बिना जाने तो ये सभी कर्म स्वप्नमें किये कर्मोंके समान व्यर्थ ही हैं। इसलिये अब मैं उस आत्मा- का ही विचार करता हूँ ॥ २७ ॥
नवमोऽध्यायः । ११६ गृहधान्यराज्यधनयोषित्पश्वादिकञ्च न । न मे स्वरूपं भवति त्वनहन्ताश्रयत्वतः ॥ २८ ॥ मदर्थभूतताहेतोर्देहोऽहं स्यां हि सर्वथा । नूनं क्षत्रियदायादो गौराङ्गोऽहं न संशयः ॥ २९ ॥ अहन्तया समाक्रान्तास्तथैतेऽपि जनाः परे । इति निश्चित्य दध्यौ तं देहं राजकुमारकः ॥ ३० ॥ अथ देहस्य चात्मत्वं प्रतिषेद्धुं प्रचक्रमे । अहो कथं देह एष ममतायाः समाश्रयः ॥ ३१ ॥ रुधिरास्थ्यादिसंघातः प्रतिक्षणविकारवान् । मम रूपं भवेन्नूनं छिन्नमेतत्तु लक्ष्यते ॥ ३२ ॥ काष्ठलोष्ठसमत्वेन स्वप्नादौ चान्यथा स्थितः । नाहं देहोऽन्य एव स्यां प्राणोऽप्येष तथाविधः ॥ ३३ ॥ गृह, अन्न, राज्य, धन, स्त्री और पशु आदि तो मेरे स्वरूप हो नहीं सकते, क्योंकि ये अहन्ता ( मैं-पन ) के आश्रय नहीं हैं । [ अर्थात् इन्हें 'मैं' नहीं कह सकते, ये 'मेरे' हैं ] ॥ २८ ॥ 'मैं' शब्दका अर्थ होनेके कारण मैं सर्वथा देह ही हो सकता हूँ । इसमें सन्देह नहीं मैं क्षत्रिय कुलमें जन्म लेनेवाला गौरवर्ण देह- ही हूँ ॥ २९ ॥ इसी प्रकार ये और सब लोग भी देहमें अहंबुद्धिसे सम्पन्न हैं । ऐसा निश्चय कर वह राजकुमार देहका ही आत्मबुद्धिसे चिन्तन करने लगा ॥ ३० ॥ अब तो उसने देहकी आत्मताका निषेध करना आरम्भ कर दिया । [ वह सोचने लगा- ] अहो ! यह देह मेरा वास्तविक स्वरूप कैसे हो सकता है ? यह तो ममताका आश्रय है, रक्त और अस्थि आदिका संघात है, प्रतिक्षण परिवर्तित होनेवाला है तथा काष्ठ और पाषाणके समान छिन्न-भिन्न होता भी देखा जाता है । इसके सिवा स्वप्न आदि अन्य अवस्थाओंमें इसकी स्थिति अन्य प्रकारकी ही रहती है । इसलिये मैं देह नहीं हो सकता । साथ ही यह प्राण भी ऐसा ही है ॥ ३१-३३ ॥
१२० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे मनो बुद्धिश्च नाहं स्यां यत एतन्ममेरितम् । अतो देहादिबुद्ध्यन्तस्तदन्य एव न संशयः ॥ ३४ ॥ अहं कदाचिन्नास्मीति भासनाभावहेतुतः । सर्वदाऽहं भासमानः स्थित एव न संशयः ॥ ३५ ॥ भासमानस्य तु मम केन भानमिति स्फुटम् । न हि जानामि तत् कस्मादेतन्न विदितं मया ॥ ३६ ॥ घटादिकं चक्षुराद्यैर्भासते भुवि नान्यतः । प्राणस्त्वचा विभात्येव मनो ज्ञानेन चेहितम् ॥ ३७ ॥ एवं बुद्धिः केन च मे भासनं नात्रिदं त्विदम् । अथैषां भासनादेव नात्मा भासेत मे यदि ॥ ३८ ॥ तर्हि नो विमृशाम्येतांस्ततो मे भासनं भवेत् । इति निश्चित्य मनसा जहौ मानसगोचरम् ॥ ३९ ॥ इसी प्रकार मन और बुद्धि भी 'मैं' नहीं हो सकते, क्योंकि ये 'मेरे' कहे जाते हैं। इसलिये निःसन्देह देहसे लेकर बुद्धिपर्यन्त जो कुछ है 'मैं' उससे भिन्न ही हूँ ॥ ३४ ॥ 'मैं नहीं हूँ' ऐसा कभी नहीं भासता। इसलिये मैं सर्वदा भास- मान रूपसे ही स्थित हूँ—इसमें सन्देह नहीं ॥ ३५ ॥ किन्तु मैं जो भासमान हूं उसका भान किससे होता है—यह मैं स्पष्ट नहीं जानता। तो यह बात मुझे क्यों विदित नहीं होती ? ॥ ३६ ॥ संसारमें घट आदि पदार्थ नेत्रादि इन्द्रियोंसे भासते हैं, किसी अन्य से नहीं। प्राण त्वचाके द्वारा स्पर्श होनेसे जाना जाता है तथा मन अपने ज्ञानात्मक कर्मसे अनुमित होता है ॥ ३७ ॥ इसी प्रकार बुद्धिकी भी पहचान [ अपने निश्चयात्मक कर्म से ] होती है। किन्तु मेरा भान कैसे होता है—यह मैं क्यों नहीं जानता ? यदि इन सबके भानके कारण ही मुझे आत्माका भान न होता हो, तो मैं इन सबका संकल्प ही छोड़ देता हूँ। तब सम्भव है, मुझे आत्माका भान हो जाय।' ऐसा निश्चय कर उसने मनसे होनेवाले सभी संक- ल्पोंको त्याग दिया ॥ ३८-३६ ॥
नवमोऽध्यायः। १२१ अथाऽपश्यदन्धकारं गाढं तत्क्षणमात्रतः। इदं ममाऽऽत्मनो रूपमिति निश्चितमानसः॥ ४० ॥ प्रहर्षमतुलं लेभे चाऽथ भूयो व्यचिन्तयत्। नूनं पुनः प्रपश्यामीत्येवं चित्तं रुरोध वै॥ ४१ ॥ चञ्चलं हठयोगेन निरुद्धं समवैक्षत। तेजःपुञ्जमनाद्यन्तं भास्वरं क्षणमात्रतः॥ ४२ ॥ प्रबुद्धश्चिन्तयामास किमेतदिति विस्मितः। अहो पश्यामि विविधं किमात्मानं कथन्त्विदम्॥ ४३ ॥ भूयः पश्यामि चेत्येवं रुरोध स्वमनस्तदा। विलीनं निद्रया चित्तं बभौ चिरतरं दृढम्॥ ४४ ॥ तत्राऽपश्यत् स्वप्नजालं विचित्रानेकदर्शनम्। अथ प्रबुद्धोऽत्यन्तं वै चिन्तां प्राप महत्तराम्॥ ४५ ॥ किमहं निद्रयाऽऽच्छन्नः स्वप्नान् समवलोकयम्। तमस्तेजश्चापि दृष्टमहो स्वप्नात्मको भवेत्॥ ४६ ॥ तब एक क्षणमें ही उसने गाढ़ अन्धकार देखा। और यह समझकर कि यही आत्माका स्वरूप है उसे अपार आनन्द हुआ। फिर यह सोचकर कि अभी और कुछ देखना चाहिये उसने अपने चञ्चल चित्तका हठयोगके द्वारा निरोध किया। चित्त निरुद्ध होनेपर उसने एक क्षणमें ही बड़ा प्रकाशपूर्ण अनादि-अनन्त तेजःपुञ्ज देखा॥ ४०-४२॥ उससे उत्थान होनेपर वह आश्चर्यचकित होकर सोचने लगा— यह क्या था? अहो! मैं अपने आत्माको इस प्रकार अनेक रूपमें क्यों देख रहा हूँ॥ ४३॥ अच्छा, मैं फिर देखूँ—यह सोचकर उसने फिर मनका निरोध किया। इस समय उसका चित्त बहुत देरतक गहरी निद्रामें लीन हो गया॥ ४४॥ उस अवस्थामें उसने स्वप्नजालमें पड़कर अनेकों विचित्र दृश्य देखे। उससे जगनेपर वह पुनः बड़ी भारी गम्भीर चिन्तामें पड़ गया॥ ४५॥ 'क्या मैंने निद्रामें पड़कर ये स्वप्न ही देखे थे? तब तो मैंने जो अन्धकार और प्रकाश देखे थे वे भी स्वप्न ही होने चाहिये॥ ४६॥
१२२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे स्वप्नस्तु मानसोल्लासस्तदेतं वर्जये कथम् । भूयो निगृह्य पश्यामीत्येवं निश्चित्य वै दृढम् ॥ ४७ ॥ रुरोध चित्तं तु हठात्तदेतदभवत् स्थिरम् । तदानन्दसमुद्रान्तर्निमग्न इव सोऽभवत् ॥ ४८ ॥ पुनश्चित्तप्रचलनात् प्रबुद्धोऽभवदञ्जसा । किमेष मेऽभवत् स्वप्नश्चाऽथ वा चित्तविभ्रमः ॥ ४९ ॥ आहोस्वित् सत्य एष स्यादविचिन्त्यं विभाति मे । नाऽन्वभूवं किञ्चिदपि सुखमाप्तं कथं मया ॥ ५० ॥ अहोऽस्य सुखलेशस्य तुल्यं नास्त्यत्र किञ्चन । अहं सुषुप्तवन्मूढः कथमेतत् सुखं स्थितम् ॥ ५१ ॥ नात्र हेतुं कञ्चिदपि लक्षये तत् कथं भवेत् । आत्मावगमनायाऽहं प्रवृत्तोऽप्यद्य नाऽविदम् ॥ ५२ ॥ स्वप्न तो मनका ही पसारा होता है। तो फिर मैं इसे कैसे निवृत्त करूँ। अच्छा, एक बार फिर मनका निरोध करके देखूँ।' ऐसा दृढ़ निश्चय कर उसने हठपूर्वक चित्तका निरोध किया। इस बार वह स्थिर हो गया। और वह मानो आनन्दके समुद्रमें डूब गया ॥४७-४८॥ फिर चित्तमें गति होनेसे वह स्वभावसे ही जाग्रत् हो गया [और सोचने लगा]—इस बार भी मुझे स्वप्न ही हुआ था या यह मेरे चित्तका भ्रम था। अथवा सत्य ही था। मुझे तो यह बड़ा विचित्र-सा जान पड़ता है। मैंने किसी वस्तुका तो अनुभव किया नहीं, फिर मुझे सुख कैसे मालूम हुआ ॥ ४९-५० ॥ अहो ! इस सुखके तो लेशमात्रके समान कोई वस्तु नहीं है। मैं तो गहरी नींदमें पड़े हुएके समान अचेत था। फिर यह सुख कैसे हुआ ? ॥ ५१ ॥ इसका मुझे कोई हेतु तो दिखायी नहीं देता। फिर यह हुआ कैसे ? मैं तो आत्माका स्वरूप जाननेके लिये प्रवृत्त हुआ था, सो अभी तक उसे तो जान नहीं सका ॥ ५२ ॥
नवमोऽध्यायः । १२३ आत्मानमन्यचान्यच्च पश्यामि किमिदं भवेत् । प्रकाशो वाऽन्धकारो वा सुखं वाऽन्यदथापि वा ॥ ५३ ॥ आत्मा भवेन्मम तथा क्रमिकैतत्स्वरूपकः । नाऽन्तमेम्यत्र भूयस्तां पृच्छामि विदुषीं प्रियाम् ॥ ५४ ॥ इति निश्चित्य द्वारेशमाहूयाज्ञां समाविशत् । स्वसन्निधानमानेतुं हेमलेखां नृपात्मजः ॥ ५५ ॥ अथ प्राप्ता मुहूर्तेन द्वारिकस्य निदेशतः । आरुरोह महासौधं मेरुमिन्दुप्रभेव सा ॥ ५६ ॥ अथाऽपश्यद्राजसुतं प्रियं शान्तात्ममानसम् । निश्चलं निर्विकारञ्च संहृतेन्द्रियमण्डलम् ॥ ५७ ॥ समीपमुपसृत्याशु तद्विस्तरमुपारुहत् । एकासनोपविष्टायां तस्यां स निमिषार्द्धतः ॥ ५८ ॥ उस आत्माको मैं अन्य-अन्य रूपसे ही देख रहा हूँ। वह वास्तवमें हे क्या ! वह प्रकाश है, अन्धकार है, सुख है, अथवा कुछ और ही है ? ॥ ५३ ॥ अथवा मेरा आत्मा क्रमशः इन सभी स्वरूपोंवाला है ? इस विषयमें मैं तो कोई निर्णय कर नहीं पाता । अतः अपनी उस विदुषी प्रियासे ही पूछूँ ॥ ५४ ॥ ऐसा विचारकर उस राजकुमारने द्वारपालको बुलाया और हेम- लेखाको अपने पास लानेके लिये उसे आज्ञा दी ॥ ५५ ॥ द्वारपालके प्रार्थना करने पर एक मुहूर्त्तमें ही हेमलेखा आ गयी और चन्द्रमाकी ज्योत्स्ना जैसे सुमेरुपर्वतपर चढ़े वैसे ही उस विशाल मन्दिर पर चढ़ गयी ॥ ५६ ॥ वहाँ उसने अपने प्रियतम राजकुमारको देखा कि उसके शरीर और मन शान्त हैं, प्राण निश्चल हैं, कामादि विकार निवृत्त हो गये हैं तथा इन्द्रियवर्ग संयत हैं ॥ ५७ ॥ हेमचूडके समीप पहुँचकर वह उसीके विस्तरपर बैठ गयी।
१२४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे उन्मील्य नयने पार्श्वे समालोकयदास्थिताम् । आलोकिता प्रियं शीघ्रं प्रणयात् परिषस्वजे ॥ ५९ ॥ ततः प्राहऽमृतस्यन्दि सुन्दरं वचनं प्रिया । नाथ किं भवताऽऽहूता कच्चित्ते नीरुजं तनौ ॥ ६० ॥ वदाऽऽहूतौ कारणं मे यदर्थमहमागता । एवं प्रियानुयुक्तः स बभाषे स्वात्मनः प्रियाम् ॥ ६१ ॥ प्रिये त्वयाऽनुशिष्टोऽहं विविक्तेऽत्र समास्थितः । विचारपरमः स्वात्मरूपलक्षणहेतवे ॥ ६२ ॥ तत्परेणापि चित्तन्तु लक्षितं तत् पृथक् किमु । आत्मनः सर्वदा प्राप्तेर्भासमानत्वतोऽपि च ॥ ६३ ॥ असम्यग् भासनञ्चान्यभासनस्य निमित्ततः । इति मत्वा निरुध्यान्यभासनं सुव्यवस्थितः ॥ ६४ ॥ उसके एक ही आसनपर बैठ जानेपर राजकुमारने आधे निमेषमें ही नेत्र खोल दिये और उसे अपने बगलमें बैठे देखा ॥ ५८-५९ पू० ॥ हेमचूडकी दृष्टि पड़ते ही उसने तुरन्त बड़े प्रेमसे उसका आलिं- गन किया और फिर अमृतकी वर्षा-सी करनेवाले सुन्दर वचन बोली ॥ ५९ उ०-६० पू० ॥ "नाथ ! आपने मुझे कैसे बुलाया ! आपका शरीर तो स्वस्थ है न ? मुझे बुलानेका कारण बताइये, जिस निमित्तसे कि मैं यहाँ आयी हूँ" ॥ ६० उ० ६१ पू० ॥ अपनी प्रियाके द्वारा इस प्रकार पूछे जानेपर वह उससे बोला, "प्रिये ! तुम्हारा उपदेश सुनकर मैं यहाँ एकान्तमें अपने स्वरू- पका साक्षात्कार करनेके लिये विचारमें तन्मय होकर बैठा था ॥ ६१ उ०-६२ ॥ यद्यपि मेरा चित्त केवल आत्मचिन्तनमें ही निरत था और आत्मा नित्य प्राप्त एवं प्रकाशस्वरूप भी है, फिर भी मुझे पृथक्-पृथक् दृश्य क्यों दिखायी दिये ॥ ६३ ॥ फिर यह सोचकर कि यह असम्यक् प्रतीति अन्य पदार्थोंकी प्रतीतिके कारण हुई है, मैं अन्य सभी प्रतीतियोंका निरोध करके स्थित हो गया ॥ ६४ ॥