त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे उन्मील्य नयने पार्श्वे समालोकयदास्थिताम् । आलोकिता प्रियं शीघ्रं प्रणयात् परिषस्वजे ॥ ५९ ॥ ततः प्राहऽमृतस्यन्दि सुन्दरं वचनं प्रिया । नाथ किं भवताऽऽहूता कच्चित्ते नीरुजं तनौ ॥ ६० ॥ वदाऽऽहूतौ कारणं मे यदर्थमहमागता । एवं प्रियानुयुक्तः स बभाषे स्वात्मनः प्रियाम् ॥ ६१ ॥ प्रिये त्वयाऽनुशिष्टोऽहं विविक्तेऽत्र समास्थितः । विचारपरमः स्वात्मरूपलक्षणहेतवे ॥ ६२ ॥ तत्परेणापि चित्तन्तु लक्षितं तत् पृथक् किमु । आत्मनः सर्वदा प्राप्तेर्भासमानत्वतोऽपि च ॥ ६३ ॥ असम्यग् भासनञ्चान्यभासनस्य निमित्ततः । इति मत्वा निरुध्यान्यभासनं सुव्यवस्थितः ॥ ६४ ॥ उसके एक ही आसनपर बैठ जानेपर राजकुमारने आधे निमेषमें ही नेत्र खोल दिये और उसे अपने बगलमें बैठे देखा ॥ ५८-५९ पू० ॥ हेमचूडकी दृष्टि पड़ते ही उसने तुरन्त बड़े प्रेमसे उसका आलिं- गन किया और फिर अमृतकी वर्षा-सी करनेवाले सुन्दर वचन बोली ॥ ५९ उ०-६० पू० ॥ "नाथ ! आपने मुझे कैसे बुलाया ! आपका शरीर तो स्वस्थ है न ? मुझे बुलानेका कारण बताइये, जिस निमित्तसे कि मैं यहाँ आयी हूँ" ॥ ६० उ० ६१ पू० ॥ अपनी प्रियाके द्वारा इस प्रकार पूछे जानेपर वह उससे बोला, "प्रिये ! तुम्हारा उपदेश सुनकर मैं यहाँ एकान्तमें अपने स्वरू- पका साक्षात्कार करनेके लिये विचारमें तन्मय होकर बैठा था ॥ ६१ उ०-६२ ॥ यद्यपि मेरा चित्त केवल आत्मचिन्तनमें ही निरत था और आत्मा नित्य प्राप्त एवं प्रकाशस्वरूप भी है, फिर भी मुझे पृथक्-पृथक् दृश्य क्यों दिखायी दिये ॥ ६३ ॥ फिर यह सोचकर कि यह असम्यक् प्रतीति अन्य पदार्थोंकी प्रतीतिके कारण हुई है, मैं अन्य सभी प्रतीतियोंका निरोध करके स्थित हो गया ॥ ६४ ॥