भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 137

नवमोऽध्यायः । १२३ आत्मानमन्यचान्यच्च पश्यामि किमिदं भवेत् । प्रकाशो वाऽन्धकारो वा सुखं वाऽन्यदथापि वा ॥ ५३ ॥ आत्मा भवेन्मम तथा क्रमिकैतत्स्वरूपकः । नाऽन्तमेम्यत्र भूयस्तां पृच्छामि विदुषीं प्रियाम् ॥ ५४ ॥ इति निश्चित्य द्वारेशमाहूयाज्ञां समाविशत् । स्वसन्निधानमानेतुं हेमलेखां नृपात्मजः ॥ ५५ ॥ अथ प्राप्ता मुहूर्तेन द्वारिकस्य निदेशतः । आरुरोह महासौधं मेरुमिन्दुप्रभेव सा ॥ ५६ ॥ अथाऽपश्यद्राजसुतं प्रियं शान्तात्ममानसम् । निश्चलं निर्विकारञ्च संहृतेन्द्रियमण्डलम् ॥ ५७ ॥ समीपमुपसृत्याशु तद्विस्तरमुपारुहत् । एकासनोपविष्टायां तस्यां स निमिषार्द्धतः ॥ ५८ ॥ उस आत्माको मैं अन्य-अन्य रूपसे ही देख रहा हूँ। वह वास्तवमें हे क्या ! वह प्रकाश है, अन्धकार है, सुख है, अथवा कुछ और ही है ? ॥ ५३ ॥ अथवा मेरा आत्मा क्रमशः इन सभी स्वरूपोंवाला है ? इस विषयमें मैं तो कोई निर्णय कर नहीं पाता । अतः अपनी उस विदुषी प्रियासे ही पूछूँ ॥ ५४ ॥ ऐसा विचारकर उस राजकुमारने द्वारपालको बुलाया और हेम- लेखाको अपने पास लानेके लिये उसे आज्ञा दी ॥ ५५ ॥ द्वारपालके प्रार्थना करने पर एक मुहूर्त्तमें ही हेमलेखा आ गयी और चन्द्रमाकी ज्योत्स्ना जैसे सुमेरुपर्वतपर चढ़े वैसे ही उस विशाल मन्दिर पर चढ़ गयी ॥ ५६ ॥ वहाँ उसने अपने प्रियतम राजकुमारको देखा कि उसके शरीर और मन शान्त हैं, प्राण निश्चल हैं, कामादि विकार निवृत्त हो गये हैं तथा इन्द्रियवर्ग संयत हैं ॥ ५७ ॥ हेमचूडके समीप पहुँचकर वह उसीके विस्तरपर बैठ गयी।