त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे स्वप्नस्तु मानसोल्लासस्तदेतं वर्जये कथम् । भूयो निगृह्य पश्यामीत्येवं निश्चित्य वै दृढम् ॥ ४७ ॥ रुरोध चित्तं तु हठात्तदेतदभवत् स्थिरम् । तदानन्दसमुद्रान्तर्निमग्न इव सोऽभवत् ॥ ४८ ॥ पुनश्चित्तप्रचलनात् प्रबुद्धोऽभवदञ्जसा । किमेष मेऽभवत् स्वप्नश्चाऽथ वा चित्तविभ्रमः ॥ ४९ ॥ आहोस्वित् सत्य एष स्यादविचिन्त्यं विभाति मे । नाऽन्वभूवं किञ्चिदपि सुखमाप्तं कथं मया ॥ ५० ॥ अहोऽस्य सुखलेशस्य तुल्यं नास्त्यत्र किञ्चन । अहं सुषुप्तवन्मूढः कथमेतत् सुखं स्थितम् ॥ ५१ ॥ नात्र हेतुं कञ्चिदपि लक्षये तत् कथं भवेत् । आत्मावगमनायाऽहं प्रवृत्तोऽप्यद्य नाऽविदम् ॥ ५२ ॥ स्वप्न तो मनका ही पसारा होता है। तो फिर मैं इसे कैसे निवृत्त करूँ। अच्छा, एक बार फिर मनका निरोध करके देखूँ।' ऐसा दृढ़ निश्चय कर उसने हठपूर्वक चित्तका निरोध किया। इस बार वह स्थिर हो गया। और वह मानो आनन्दके समुद्रमें डूब गया ॥४७-४८॥ फिर चित्तमें गति होनेसे वह स्वभावसे ही जाग्रत् हो गया [और सोचने लगा]—इस बार भी मुझे स्वप्न ही हुआ था या यह मेरे चित्तका भ्रम था। अथवा सत्य ही था। मुझे तो यह बड़ा विचित्र-सा जान पड़ता है। मैंने किसी वस्तुका तो अनुभव किया नहीं, फिर मुझे सुख कैसे मालूम हुआ ॥ ४९-५० ॥ अहो ! इस सुखके तो लेशमात्रके समान कोई वस्तु नहीं है। मैं तो गहरी नींदमें पड़े हुएके समान अचेत था। फिर यह सुख कैसे हुआ ? ॥ ५१ ॥ इसका मुझे कोई हेतु तो दिखायी नहीं देता। फिर यह हुआ कैसे ? मैं तो आत्माका स्वरूप जाननेके लिये प्रवृत्त हुआ था, सो अभी तक उसे तो जान नहीं सका ॥ ५२ ॥