त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽध्यायः। १२१ अथाऽपश्यदन्धकारं गाढं तत्क्षणमात्रतः। इदं ममाऽऽत्मनो रूपमिति निश्चितमानसः॥ ४० ॥ प्रहर्षमतुलं लेभे चाऽथ भूयो व्यचिन्तयत्। नूनं पुनः प्रपश्यामीत्येवं चित्तं रुरोध वै॥ ४१ ॥ चञ्चलं हठयोगेन निरुद्धं समवैक्षत। तेजःपुञ्जमनाद्यन्तं भास्वरं क्षणमात्रतः॥ ४२ ॥ प्रबुद्धश्चिन्तयामास किमेतदिति विस्मितः। अहो पश्यामि विविधं किमात्मानं कथन्त्विदम्॥ ४३ ॥ भूयः पश्यामि चेत्येवं रुरोध स्वमनस्तदा। विलीनं निद्रया चित्तं बभौ चिरतरं दृढम्॥ ४४ ॥ तत्राऽपश्यत् स्वप्नजालं विचित्रानेकदर्शनम्। अथ प्रबुद्धोऽत्यन्तं वै चिन्तां प्राप महत्तराम्॥ ४५ ॥ किमहं निद्रयाऽऽच्छन्नः स्वप्नान् समवलोकयम्। तमस्तेजश्चापि दृष्टमहो स्वप्नात्मको भवेत्॥ ४६ ॥ तब एक क्षणमें ही उसने गाढ़ अन्धकार देखा। और यह समझकर कि यही आत्माका स्वरूप है उसे अपार आनन्द हुआ। फिर यह सोचकर कि अभी और कुछ देखना चाहिये उसने अपने चञ्चल चित्तका हठयोगके द्वारा निरोध किया। चित्त निरुद्ध होनेपर उसने एक क्षणमें ही बड़ा प्रकाशपूर्ण अनादि-अनन्त तेजःपुञ्ज देखा॥ ४०-४२॥ उससे उत्थान होनेपर वह आश्चर्यचकित होकर सोचने लगा— यह क्या था? अहो! मैं अपने आत्माको इस प्रकार अनेक रूपमें क्यों देख रहा हूँ॥ ४३॥ अच्छा, मैं फिर देखूँ—यह सोचकर उसने फिर मनका निरोध किया। इस समय उसका चित्त बहुत देरतक गहरी निद्रामें लीन हो गया॥ ४४॥ उस अवस्थामें उसने स्वप्नजालमें पड़कर अनेकों विचित्र दृश्य देखे। उससे जगनेपर वह पुनः बड़ी भारी गम्भीर चिन्तामें पड़ गया॥ ४५॥ 'क्या मैंने निद्रामें पड़कर ये स्वप्न ही देखे थे? तब तो मैंने जो अन्धकार और प्रकाश देखे थे वे भी स्वप्न ही होने चाहिये॥ ४६॥