त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे मनो बुद्धिश्च नाहं स्यां यत एतन्ममेरितम् । अतो देहादिबुद्ध्यन्तस्तदन्य एव न संशयः ॥ ३४ ॥ अहं कदाचिन्नास्मीति भासनाभावहेतुतः । सर्वदाऽहं भासमानः स्थित एव न संशयः ॥ ३५ ॥ भासमानस्य तु मम केन भानमिति स्फुटम् । न हि जानामि तत् कस्मादेतन्न विदितं मया ॥ ३६ ॥ घटादिकं चक्षुराद्यैर्भासते भुवि नान्यतः । प्राणस्त्वचा विभात्येव मनो ज्ञानेन चेहितम् ॥ ३७ ॥ एवं बुद्धिः केन च मे भासनं नात्रिदं त्विदम् । अथैषां भासनादेव नात्मा भासेत मे यदि ॥ ३८ ॥ तर्हि नो विमृशाम्येतांस्ततो मे भासनं भवेत् । इति निश्चित्य मनसा जहौ मानसगोचरम् ॥ ३९ ॥ इसी प्रकार मन और बुद्धि भी 'मैं' नहीं हो सकते, क्योंकि ये 'मेरे' कहे जाते हैं। इसलिये निःसन्देह देहसे लेकर बुद्धिपर्यन्त जो कुछ है 'मैं' उससे भिन्न ही हूँ ॥ ३४ ॥ 'मैं नहीं हूँ' ऐसा कभी नहीं भासता। इसलिये मैं सर्वदा भास- मान रूपसे ही स्थित हूँ—इसमें सन्देह नहीं ॥ ३५ ॥ किन्तु मैं जो भासमान हूं उसका भान किससे होता है—यह मैं स्पष्ट नहीं जानता। तो यह बात मुझे क्यों विदित नहीं होती ? ॥ ३६ ॥ संसारमें घट आदि पदार्थ नेत्रादि इन्द्रियोंसे भासते हैं, किसी अन्य से नहीं। प्राण त्वचाके द्वारा स्पर्श होनेसे जाना जाता है तथा मन अपने ज्ञानात्मक कर्मसे अनुमित होता है ॥ ३७ ॥ इसी प्रकार बुद्धिकी भी पहचान [ अपने निश्चयात्मक कर्म से ] होती है। किन्तु मेरा भान कैसे होता है—यह मैं क्यों नहीं जानता ? यदि इन सबके भानके कारण ही मुझे आत्माका भान न होता हो, तो मैं इन सबका संकल्प ही छोड़ देता हूँ। तब सम्भव है, मुझे आत्माका भान हो जाय।' ऐसा निश्चय कर उसने मनसे होनेवाले सभी संक- ल्पोंको त्याग दिया ॥ ३८-३६ ॥