त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽध्यायः । ११६ गृहधान्यराज्यधनयोषित्पश्वादिकञ्च न । न मे स्वरूपं भवति त्वनहन्ताश्रयत्वतः ॥ २८ ॥ मदर्थभूतताहेतोर्देहोऽहं स्यां हि सर्वथा । नूनं क्षत्रियदायादो गौराङ्गोऽहं न संशयः ॥ २९ ॥ अहन्तया समाक्रान्तास्तथैतेऽपि जनाः परे । इति निश्चित्य दध्यौ तं देहं राजकुमारकः ॥ ३० ॥ अथ देहस्य चात्मत्वं प्रतिषेद्धुं प्रचक्रमे । अहो कथं देह एष ममतायाः समाश्रयः ॥ ३१ ॥ रुधिरास्थ्यादिसंघातः प्रतिक्षणविकारवान् । मम रूपं भवेन्नूनं छिन्नमेतत्तु लक्ष्यते ॥ ३२ ॥ काष्ठलोष्ठसमत्वेन स्वप्नादौ चान्यथा स्थितः । नाहं देहोऽन्य एव स्यां प्राणोऽप्येष तथाविधः ॥ ३३ ॥ गृह, अन्न, राज्य, धन, स्त्री और पशु आदि तो मेरे स्वरूप हो नहीं सकते, क्योंकि ये अहन्ता ( मैं-पन ) के आश्रय नहीं हैं । [ अर्थात् इन्हें 'मैं' नहीं कह सकते, ये 'मेरे' हैं ] ॥ २८ ॥ 'मैं' शब्दका अर्थ होनेके कारण मैं सर्वथा देह ही हो सकता हूँ । इसमें सन्देह नहीं मैं क्षत्रिय कुलमें जन्म लेनेवाला गौरवर्ण देह- ही हूँ ॥ २९ ॥ इसी प्रकार ये और सब लोग भी देहमें अहंबुद्धिसे सम्पन्न हैं । ऐसा निश्चय कर वह राजकुमार देहका ही आत्मबुद्धिसे चिन्तन करने लगा ॥ ३० ॥ अब तो उसने देहकी आत्मताका निषेध करना आरम्भ कर दिया । [ वह सोचने लगा- ] अहो ! यह देह मेरा वास्तविक स्वरूप कैसे हो सकता है ? यह तो ममताका आश्रय है, रक्त और अस्थि आदिका संघात है, प्रतिक्षण परिवर्तित होनेवाला है तथा काष्ठ और पाषाणके समान छिन्न-भिन्न होता भी देखा जाता है । इसके सिवा स्वप्न आदि अन्य अवस्थाओंमें इसकी स्थिति अन्य प्रकारकी ही रहती है । इसलिये मैं देह नहीं हो सकता । साथ ही यह प्राण भी ऐसा ही है ॥ ३१-३३ ॥