त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमोऽध्यायः । ६६ अन्यथानादिसंसारे कुतोऽनिन्द्यत्वमाप्नुयात् । न्यवस्थिता जगद्धात्रा चापि वा स्यात् कथं वद ॥ ४८ ॥ अनवस्थस्य राज्यन्तु नष्टमालोक्यते यतः । तस्मादेव दयासिन्धुः सुव्यवस्थश्च कीर्त्तितः ॥ ४९ ॥ तमेव सर्वभावेन भक्त्याशु शरणीकुरु । श्रेयसि त्वां योजयेत् स त्वं न तत्परतां व्रज ॥ ५० ॥ उपासने बहुविधमार्त्यार्थित्वतोऽपि च । निर्हेतुकन्तु काचित्कं तत् सत्योपासनं भवेत् ॥ ५१ ॥ दृष्टमेतत् सर्वतो वै चार्त्तेनोपासितः प्रभुः । कदाचिद् दयाविष्ट आर्त्तिं तस्य विमोचयेत् ॥ ५२ ॥ उपेक्षेत कदाचिद्धोपास्तेर्वै तारतम्यतः । एवमेवार्थार्थिनोऽपि मितञ्चानियतं फलम् ॥ ५३ ॥ यदि ऐसा न होता तो बताइये इस अनादि संसार में वह कैसे अनिन्दित रहते, तथा उन जगत्कर्ताकी की हुई यह लोकव्यवस्था किस प्रकार नियमित रहती ॥ ४८ ॥ क्योंकि यह देखा जाता है कि जिसकी व्यवस्था ठीक नहीं होती उसका राज्य नष्ट हो जाता है। इसलिये भगवान् दयाके सागर और सुव्यवस्थित कहे जाते हैं ॥ ४९ ॥ अतः सम्पूर्ण भक्तिभावसे आप उनकी शरण ग्रहण करें। वे ही आपको श्रेयः-साधनमें लगा देंगे। आपको साधन ढूँढ़नेके पछड़ेमें पड़नेकी आवश्यकता नहीं है ॥ ५० ॥ उपासनामें आर्त्ति और अर्थिताके निमित्तसे भी अनेकों भेद हैं। निष्काम उपासना तो विरलोंकी ही होती है। किन्तु है वही सच्ची उपासना ॥ ५१ ॥ सब ओर प्रायः यही देखा जाता है कि आर्त्त (संकटग्रस्त) पुरुष प्रभुकी उपासना करता है। अतः भगवान् कभी तो दयाके वशीभूत होकर उसका कष्ट दूर कर देते हैं ॥ ५२ ॥ और कभी उपासनामें त्रुटि रह जानेपर उपेक्षा भी कर देते हैं। इसी प्रकार अर्थार्थी उपासकोंको मिलनेवाला फल भी सीमित और अनि- श्चित ही होता है ॥ ५३ ॥