त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमोऽध्यायः । ६३ श्रद्धया पौरुषपरो न विहन्यते सर्वथा । दृढं पौरुषमाश्रित्य न प्राप्येत कथं फलम् ॥ १२ ॥ पौरुषात् कर्षका धान्यं वणिजो धनमेव च । राज्यलक्ष्मीं नृपा विप्रा विद्यां सर्वसुखाश्रयाम् ॥ १३ ॥ शूद्रा भृतिं सुधां देवास्तापसा लोकमुत्तमम् । प्रापुरन्येऽप्यभिमतं पौरुषेणैव कर्मणा ॥ १४ ॥ अनवस्थिततर्केणाश्रद्धेन पुरुषेण किम् । कदा किञ्चित् कथं प्राप्तं फलं वद विमृश्य तत् ॥ १५ ॥ क्वचित् फलविसंवादात् सर्वत्राश्वासवर्जने । विजानीयाद्विहतं तं स्वात्मरिपुरूपिणम् ॥ १६ ॥ अतः पौरुषमाश्रित्य श्रद्धासत्तर्कपोषितम् । श्रेयसां यन्मुख्यतमं साधनं तत् समाश्रयेत् ॥ १७ ॥ जो श्रद्धापूर्वक प्रयत्नमें लगा रहता है वह कभी असफल नहीं रह सकता। सुदृढ पुरुषार्थका आश्रय ले लेनेपर फिर फल कैसे प्राप्त न होगा ॥ १२ ॥ पुरुषार्थसे ही कृषक अनाज, व्यापारी धन, राजा लोग राजवैभव, ब्राह्मण लोग सम्पूर्ण सुखकी आश्रयभूता विद्या, शूद्र आजीविका, देवता अमृत और तपस्वी उत्तम लोक प्राप्त करते हैं। तथा और सबको भी पुरुषार्थरूप कर्मके द्वारा ही अपने अभीष्टकी प्राप्ति होती है ॥१३-१४॥ आप विचारकर बतलाइये कि शुष्कतर्क करनेवाले श्रद्धाहीन पुरुषने क्या कभी किसी प्रकार कोई फल प्राप्त किया है ॥ १५ ॥ [ दैवयोगसे ] कभी फल न मिलनेके कारण यदि किसीका सर्वत्र ही विश्वास न रहे तो उस अभागे पुरुषको अपना ही शत्रु समझना चाहिये ॥ १६ ॥ अतएव पुरुषार्थका आश्रय लेकर जो श्रद्धा और सत्तर्कसे पोषित, श्रेयःप्राप्तिका सबसे मुख्य साधन हो उसका आश्रय ले ॥ १७ ॥