भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 108

६४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तत्र दृष्टसाधनानां वैचित्र्यञ्च पृथग्विधम् । तेषु यत् सर्वथा साध्यं साधयेत् तद्धि मुख्यकम् ॥ १८ ॥ तत् सुतर्कानुभूतिभ्यां व्यवस्याशु समारभेत् । तत्ते सर्वं प्रवक्ष्यामि सावधानः शृणुष्व तत् ॥ १९ ॥ श्रेयस्तद्धि विजानीयाद्यस्माद् भूयो न शोचति । शोकः सर्वत एव स्याद् दृश्यते सूक्ष्मया दृशा ॥ २० ॥ यच्छोकैरनुसंभिन्नं न तच्छ्रेयो हि सर्वथा । धनं पुत्रास्तथा दारा राज्यं कोशो बलं यशः ॥ २१ ॥ विद्या बुद्धिर्दर्शनञ्च देहः सौन्दर्यसम्पदः । सर्वमेतदस्थिरत्वात् कालसर्पमुखस्थितम् ॥ २२ ॥ शोकाङ्कुरमहाशक्तिबीजात्मकतया स्थितम् । कुत आत्यन्तिकश्रेयःसाधनत्वं समर्हति ॥ २३ ॥ अतः परमकं श्रेय एतद्वै मुख्यतो भवेत् । जो साधन देखनेमें आते हैं उनमें कई प्रकारकी विलक्षणता है। उनमेंसे जिसके द्वारा अपने लक्ष्यकी प्राप्ति सुलभ जान पड़े उसे ही अपना मुख्य साधन समझे ॥ १८ ॥ शास्त्रानुसारी तर्क और अनुभवके द्वारा उसका निश्चय करके तुरन्त आरम्भ कर दे। यह सब रहस्य मैं आपको बतलाती हूँ, आप सावधान होकर सुनें ॥ १९ ॥ श्रेय उसीको समझना चाहिये जिसकी प्राप्ति होनेपर फिर किसी प्रकारका शोक न रहे। यदि सूक्ष्म दृष्टिसे विचार करें तो इस संसारमें सभी ओर शोक दिखायी देता है। और जो शोकसे मिला हुआ है वह किसी प्रकार भी श्रेय नहीं हो सकता ॥ २०-२१ पू० ॥ धन, पुत्र, स्त्री, राज्य, कोश, बल, कीर्ति, विद्या, बुद्धि, रूप, शरीर और सुन्दरता—ये सभी अस्थिर होनेके कारण कालरूपी सर्पके मुखमें स्थित हैं तथा शोकरूप अंकुरके अत्यन्त शक्तिशाली बीजरूपसे विद्य- मान हैं। इनमें आत्यन्तिक श्रेयकी साधनता कैसे मानी जा सकती है ? ॥ २१ उ०-२३ ॥ अतः जो परम श्रेय है उसका मुख्य साधन तो यही है [ जो