भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 109

सप्तमोऽध्यायः । ६५ एवं धनादिविषये यदादेयत्वविभ्रमः ॥ २४ ॥ मोहादेव समुद्भूतो मोहको हि महेश्वरः । यो हि सर्वजगत्कर्त्ता तस्मात् सर्वे हि मोहिताः ॥ २५ ॥ मोहयत्यल्पकोऽपीह विद्याभागसमाश्रयात् । कांश्चिदेव न सर्वान् स यस्माद्विद्या हि सा मिता ॥ २६ ॥ अल्पविद्यं मायिनञ्चाप्यनुत्क्रान्ता जना यतः । महादेवं महामायं कः समुत्क्रान्तुमर्हति ॥ २७ ॥ यो हि लोकेऽल्पमायाञ्च जानाति प्रतिविद्यया । स मोहान्निर्गतः स्वस्थः सुखमाप्नोत्यनश्वरम् ॥ २८ ॥ एवंविधापि विद्या तमनाश्रित्य तु मायिनम् । न लभ्या सर्वथा यावदप्रसाद्य तु सर्वथा ॥ २९ ॥ आगे बताया जाता है ]—लोकमें जो धनादि विषयमें उपादेयताका भ्रम है वह मोहसे ही हुआ है और मोहमें डालनेवाले हैं महेश्वर, जो सम्पूर्ण जगत्की रचना करनेवाले हैं। इसीसे सब लोग मोहमें पड़े हुए हैं ॥ २४-२५ ॥ एक तुच्छ ऐन्द्रजालिक भी अपनी आंशिक विद्याके बलसे किन्हीं- किन्हीं लोगोंको मोहमें डाल देता है, किन्तु सबको नहीं, क्योंकि उसकी विद्या सीमित है ॥ २६ ॥ तथापि जब साधारण लोग इस सीमित विद्यावाले मायावीकी मायाका भी पार नहीं पा सकते तो महामायावी महेश्वरका पार पानेमें कौन समर्थ हो सकता है ॥ २७ ॥ जो विरोधी विद्याके द्वारा इस लोकमें मायावीकी तुच्छ मायाको रोकनेकी युक्ति जान लेता है वह उसके जालसे निकलकर स्वस्थ (मायाजनित सर्पादिके भयसे रहित) रह सकता है और उसे अविनाशी (मायाजनित सर्पादिके भयसे नष्ट न होनेवाला) सुख प्राप्त होता है ॥ २८ ॥ किन्तु ऐसी विद्या भी उस ऐन्द्रजालिकका आश्रय लिये बिना और [धनादि देकर] उसे किसी भी प्रकार प्रसन्न किये बिना प्राप्त नहीं हो सकती ॥ २६ ॥