त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अनवस्थिततर्कत्वमपहाय विनाशनम् । सत्तर्कमाश्रित्य जनः प्राप्नुयात् सुफलं द्रुतम् ॥ ६ ॥ सत्तर्कसंश्रयेणाशु साधनैकपरो भवेत् । सत्तर्कजनितां श्रद्धां प्राप्येह फलभाङ् नरः ॥ ७ ॥ अनवस्थिततर्कन्तं विहायालोकय प्रिय । प्रवृत्तिमेतां जगतः श्रद्धया फलशालिनीम् ॥ ८ ॥ सुतर्कितेन कालेन कर्षकः क्ष्मां विकर्षति । श्रद्धयैव तथा रूप्यस्वर्णरत्नौषधादिकम् ॥ ९ ॥ व्यवस्यन्ति सुतर्केण त्यक्त्वा तर्कानवस्थितिम् । तस्मात् सुतर्कश्रद्धाभ्यां व्यवस्य श्रेय आत्मनः ॥ १० ॥ प्रयतेत साधनाय नहि तर्कानवस्थितेः । विरमेत् पौरुषायत्नाच्छृङ्गाद्यनुगनरा इव ॥ ११ ॥ मनुष्य इस विनाशकारी शुष्क तर्कको त्यागकर सत् (शास्त्रानुसारी) तर्कका आश्रय लेनेसे तत्काल ही उत्तम फल प्राप्त कर सकता है ॥ ६ ॥ इसलिये शास्त्रानुसारी तर्कका आश्रय लेकर उसे साधनमें ही लग जाना चाहिये । मनुष्य शास्त्रानुसारी तर्कसे उत्पन्न होनेवाली श्रद्धाको पाकर इस लोकमें फलका भागी हो सकता है ॥ ७ ॥ प्रिय ! आप निराधार तर्कको त्यागकर देखिये, इस जगत्का सारा व्यवहार श्रद्धा होनेपर ही फलदायक होता है ॥ ८ ॥ विचारपूर्वक निश्चय किये हुए कालमें ही किसान भूमि जोतता है । तथा निराधार शुष्क तर्कको त्यागकर सम्यक् विचारसे श्रद्धाके द्वारा ही लोग चाँदी, सोने, रत्न और ओषधि आदिका निश्चय करते हैं ॥ ९-१० पू० ॥ अतएव शास्त्रानुसारी तर्क और श्रद्धाके द्वारा अपने परम हितका निर्णय कर साधनके लिये प्रयत्न करना चाहिये । तर्ककी कोई स्थिति नहीं है, अतः शृंगका अनुसरण करनेवाले पुरुषोंकी तरह अपना पुरुषार्थ न छोड़ बैठे ॥ १० उ०-११ ॥