भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 105, कुल 404 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 105

सप्तमोऽध्यायः इति पृष्टा हेमलेखा भर्त्रा प्रियतरेण सा । प्रोवाच विदुषी सम्यग् विज्ञातलोकसंस्थितिः ॥ १ ॥ शृणु वक्ष्ये प्रियतम स्थिरशान्त समादरात् । मनो हि मर्कटप्रायमस्थिरं सर्वदैव तत् ॥ २ ॥ यत एवं महानर्थं प्राप्तवान् प्राकृतो जनः । चलन्मनः सर्वदुःखनिदानं दृष्टमेव हि ॥ ३ ॥ यतः सुषुप्तौ चलनाभावाद्बिन्दति वै सुखम् । तस्मान्मनः स्थिरीकृत्य शृणु यत्ते ब्रवीम्यहम् ॥ ४ ॥ अनादरेण श्रुतञ्च भवेदश्रुतसम्मितम् । अफलं स्यात्तदत्यन्तं यथा चित्रतरुश्रयः ॥ ५ ॥ सप्तम अध्याय ॥ ७ ॥ विचार, ईश्वर तथा निष्काम उपासनाके स्वरूपका निर्णय अपने प्रियतम पतिके इस प्रकार प्रश्न करनेपर संसारके स्वरूपको अच्छी तरह पहचाननेवाली विदुषी हेमलेखा कहने लगी ॥ १ ॥ "प्रियतम ! स्थिर और शान्तचित्त होकर आदरपूर्वक सुनिये । मैं आपके प्रश्नका उत्तर देती हूँ । यह मन बन्दरकी तरह है, सदा चंचल ही रहता है ॥ २ ॥ क्योंकि ऐसा है, इसलिये साधारण लोगोंको बड़े अनर्थोंमें फँस जाना पड़ता है। यह देखा ही गया है कि चंचल मन ही सारे दुःखों- की जड़ है ॥ ३ ॥ क्योंकि सुषुप्तिमें चंचलताका अभाव हो जानेके कारण ही सुखकी अनुभूति होती है । इसलिये मैं आपसे जो कुछ कहती हूँ मनको स्थिर करके सुनिये ॥ ४ ॥ जो बात अनादरपूर्वक सुनी जाती है वह न सुनी-सी ही होती है । चित्रमें बने हुए वृक्षके समान का कोई फल नहीं होता ॥ ५ ।