त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तत्रैवं सति नैवान्तं कश्चिदत्रापि गच्छति । यः शून्यमाह तत्त्वं सोऽप्यशून्यं दूषयेत् परम् ॥ ६५ ॥ अश्रद्धेयं कुतो वा तत् सङ्गतं चागमेन हि । एतद् ब्रूहि प्रिये सम्यग् न ह्येतत्तेऽस्त्यचिन्तितम् ॥६६॥ इति श्रीत्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे हेमचूडोपाख्याने श्रद्धाप्रशंसनं नाम षष्ठोऽध्यायः । ऐसी स्थितिमें अन्तिम निर्णयतक इन शास्त्रादिमें से भी कोई पहुँच नहीं पाता । जो शून्यको ही तत्त्व बताता है वह भी अपने विरोधी अशून्यको सदोष सिद्ध करता ही है ॥ ६५ ॥ उनका कथन भी उनके शास्त्रसे संगत है ही, अतः उसे भी अवि- श्वसनीय कैसे कहें ? इसपर तुमने विचार न किया हो—ऐसी बात है नहीं, इसलिये प्रिये ! मुझे यह अच्छी तरह समझाकर कहो” ॥ ६६ ॥ षष्ठ अध्याय समाप्त ।