त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अप्राप्तावात्मता न स्यादात्मत्वेनासता कुतः । अप्राप्यः सर्वथैवात्मा प्राप्तिस्तस्य न विद्यते ॥ ७० ॥ अप्राप्तस्य भवेत् प्राप्तिरात्मत्वान्नाप्तिरस्त्यतः । तन्निरोधोऽपि नाप्त्यर्थस्त्वत्र पश्य निदर्शनम् ॥ ७१ ॥ अन्धकारसमाच्छन्नं किञ्चित्तस्य निरोधतः । दीपाद्यैराप्यते प्राप्तमिव लोके यथा तथा ॥ ७२ ॥ यथा कश्चिद् भ्रान्तचित्तः कश्चिद्विस्मृतनिष्ककः । अन्यचिन्तानिरोधेन समाहिततया पुनः ॥ ७३ ॥ आसादयति तन्निष्कं नष्टं प्राप्तं यथा तथा । न निरोधोऽत्र हेतुः स्यान्निष्काप्तौ तु यथा तथा ॥ ७४ ॥ आत्मलाभेन हेतुः स्यान्निरोधो बाह्यवस्तुनः । त्वया न लक्षितः स्वात्मा तत्र व्युत्पत्तिवर्जनात् ॥ ७५ ॥ यदि वह अप्राप्त हो तो आत्मा नहीं हो सकता और आत्मा है तो उसकी प्राप्ति कहाँसे होगी ? इसलिये आत्मा सर्वथा प्राप्त न होने वाला ही है, उसकी प्राप्ति नहीं हुआ करती ॥ ७० ॥ प्राप्ति सर्वदा अप्राप्तकी ही होती है, अतः आत्मा होनेके कारण इसकी प्राप्ति नहीं होती । मनका निरोध भी आत्माकी प्राप्तिका कारण नहीं है; इसके लिये इस दृष्टान्त पर दृष्टि दो ॥ ७१ ॥ जिस प्रकार लोकमें अन्धकारसे आच्छादित कोई वस्तु दीपका- दिके द्वारा अन्धकारका निरोध होनेपर प्राप्त-सी कही जाती है, उसी प्रकार यहां समझना चाहिये ॥ ७२ ॥ जिस प्रकार कोई भ्रान्तचित्त पुरुष कहीं सोना रखकर भूल जाय और फिर अन्य सब चिन्ताओंको छोड़कर चित्तको समाहित करनेपर उसे वह मिल जाय तो वह खोकर पाया हुआ माना जाता है, उसी प्रकार यहां समझो । जिस तरह अन्य चिन्तनोंका त्याग सुवर्णकी प्राप्तिमें हेतु नहीं उसी तरह आत्मप्राप्तिमें भी मनका निरोध कारण नहीं है। आपको आत्माके स्वरूपका परिचय नहीं है, इसीसे आप उसका अनुभव नहीं कर सके ॥ ७३-७५ ॥