त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽध्यायः । १२७ यथा प्रकाशे व्युत्पन्नो रात्रौ राजसभां गतः । पश्यन् सभ्यांश्च दीपांश्च न जानाति प्रकाशकम् ॥ ७६ ॥ शृणु प्रिय निरोधान्ते ह्यन्धकारो विलोकितः । अन्धकारावलोकादौ शेषभावस्तव स्थितः ॥ ७७ ॥ तं भावं भावय सदा परमानन्ददायकम् । अत्र सर्वे महामोहग्रहग्रस्ताः पराग्दृशः ॥ ७८ ॥ अन्विष्यान्विष्य विहता न तां प्रापुश्च भावनाम् । सन्ति लोके शास्त्रविदः कुशलाश्च सुतार्किकाः ॥ ७९ ॥ अविदित्वा भावममुं शोचन्त्येव दिवानिशम् । शब्दार्थशिल्पमात्रेण न हि तत् पदमाप्यते ॥ ८० ॥ जिस प्रकार पुरुष रात्रिके समय राजसभामें जाय और प्रकाशसे उसका परिचय न हो, तो वह वहाँ सभासद् और दीपकोंको देखते हुए भी प्रकाश करनेवालेको नहीं जान पाता ॥ ७६ ॥ प्रिय ! सुनो आपने चित्तनिरोधके पश्चात् अन्धकार देखा; किन्तु उस अन्धकारावलोकनसे पूर्व [ निर्विकल्प अवस्थामें सम्पूर्ण विषयोंका अभाव हो जानेपर ] तो शेषरूपसे आप ही रह गये थे¹ ॥ ७७ ॥ उस परमानन्ददायक शेषभावका ही आप सर्वदा चिन्तन कीजिये । सब बहिर्मुख लोग इसी स्थानमें महामोहसे ग्रस्त हो जाते हैं । वे खोज-खोजकर थक जाते हैं, तो भी इस भावको प्राप्त नहीं कर पाते ॥ ७८-७९ पू० ॥ लोकमें ऐसे अनेकों शास्त्रज्ञ और कुशल तार्किक हैं जो इस भावको न जाननेके कारण रात-दिन शोक ही करते रहते हैं । शब्दोंका अर्थ कर लेनेकी कलासे ही उस पदकी प्राप्ति नहीं हो सकती ॥ ७९ उ०-८० ॥ १. निरोधकालमें दृश्यका सर्वथा अभाव हो जानेपर जो ज्ञानमात्र शेष रहता है वही आत्माका शेषभाव है। उसका किसी प्रकार निषेध नहीं हो सकता, क्योंकि वह स्वयंप्रकाश होनेसे सर्वदा प्रकाशमान है। सभी सन्धियोंमें उसका स्वयं ही अनुभव होता रहता है।