भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 142

१२८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे यावदन्वेषणं कुर्याद्विचारं वाऽपि पण्डितः। तावन्न प्राप्यते तद्वै यतो न ग्राह्यमेव तत् ॥ ८१ ॥ गत्वा दूरं न तत् प्राप्यं स्थित्वा प्राप्तं हि सर्वदा । न तद्विचार्य विज्ञेयमविचाराद्विभासते ॥ ८२ ॥ धावन् स्वमूर्द्धच्छायेव न प्राप्यं क्रियया क्वचित् । यथा हि निर्मलादर्शे प्रतिबिम्बसहस्रकम् ॥ ८३ ॥ पश्यन् बालोऽपि नाऽऽदर्शं पश्यत्येवं जनः खलु । पश्यन् स्वात्ममहादर्शे प्रतिबिम्बं हि जागतम् ॥ ८४ ॥ स्वात्मानं न विजानाति तद्व्युत्पत्तिविवर्जनात् । यथाऽपरिचिताकाशः पश्यन्नाकाशसंश्रितम् ॥ ८५ ॥ जगन्नावेत्ति चाकाशं तथा स्वात्मस्वरूपकम् । जबतक कोई पण्डित आत्माकी खोज अथवा उसके विचारमें लगा रहता है तबतक वह मिल नहीं सकता, क्योंकि वह ग्राह्य तो है ही नहीं ॥ ८१ ॥ वह दूर चलकर जानेसे नहीं मिलता, वह तो सर्वदा स्थिर रहनेसे ही मिलता है। विचार करनेसे उसका ज्ञान नहीं होता, उसकी अनुभूति तो विचारकी निवृत्ति होनेसे ही होती है¹। जिस प्रकार अपने मस्तककी छाया दौड़कर नहीं पकड़ी जा सकती उसी प्रकार किसी क्रियाके द्वारा वह कभी प्राप्त नहीं होता ॥ ८२-८३ पू० ॥ जैसे एक बच्चा भी निर्मल दर्पणमें हजारों प्रतिबिम्ब देख लेता है किन्तु दर्पणको नहीं देख पाता, उसी प्रकार लोग इस आत्मरूप महान् दर्पणमें जगत्रूप प्रतिबिम्बको देखते हुए भी परिचय न होनेके कारण अपने आत्माको नहीं देख पाते ॥ ८३ उ०-८५ पू० ॥ जैसे आकाशसे अपरिचित पुरुष आकाशमें स्थित सम्पूर्ण जगत्को देखते हुए भी आकाशको नहीं जान पाता उसी प्रकार जीव अपने स्वरूपको नहीं जान पाता ॥ ८५ उ०-८६ पू० ॥ १. क्योंकि चलनेसे इन्द्रियोंका प्रसार होता है और उसकी प्राप्ति होती है इन्द्रियोंके संकोचसे। इसी प्रकार विचार करनेसे अन्तःकरण की वृत्तियाँ फैलती हैं और उसकी उपलब्धि होती है वृत्तियोंका निरोध होने पर।