भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 143

नवमोऽध्यायः । १२५ नाथ सूक्ष्मदृशा पश्य ज्ञानज्ञेयात्मकं जगत् ।; ८६ ॥ तत्र ज्ञानं स्वतःसिद्धं तदभावे न किञ्चन । प्रमाणानां प्रमाणं तदप्रमाणं स्वतो भवेत् ॥ ८७ ॥ यतः प्रमाणानपेक्षमादिसिद्धमतस्तु तत् । सिद्धसाधकभावेन न तत्सिद्धिः कदाचन ॥ ८८ ॥ तत्र विप्रतिपन्नस्य न प्रश्नो नापि चोत्तरम् । अनपह्नवनीयं तन्महादर्शतलं भवेत् ॥ ८९ ॥ तत्र सर्वं भासते वै दर्पणप्रतिबिम्बवत् । देशेन वापि कालेन परिच्छित्तिर्न विद्यते ॥ ९० ॥ तदन्तर्भासमानत्वात् कथं ताभ्यां परिच्छिदिः । परिच्छेदस्य भानन्तु गगने वस्तुभिर्यथा ॥ ९१ ॥ नाथ ! इस ज्ञान और ज्ञेयस्वरूप जगत्‌को आप सूक्ष्मदृष्टिसे देखिये । इसमें जो ज्ञान ( अनुभव ) है वह स्वतः सिद्ध है; वह न हो तो कुछ भी नहीं रह सकता ॥ ८६ उ०-८७ पू० ॥ वह सम्पूर्ण प्रमाणोंका प्रमाण है, किन्तु स्वयं किसी प्रमाणका विषय नहीं है। क्योंकि अपनी सिद्धिके लिये उसे प्रमाणकी अपेक्षा नहीं है, इसलिये वह सबसे पहले सिद्ध ( विद्यमान ) है। वह किसी सिद्धिका साधक है—इस रूपसे भी उसकी कभी सिद्धि नहीं हो सकती¹ ॥ ८७ उ०-८८ ॥ जिसे उस ज्ञानकी सत्तामें सन्देह है उसका तो कोई प्रश्न भी नहीं हो सकता और न उसे उत्तर ही दिया जा सकता है। एक महान् दर्पणके समान उसका किसी भी प्रकार निषेध नहीं किया जा सकता ॥ ८९ ॥ दर्पणमें प्रतिबिम्बकी तरह उसीमें सब कुछ भास रहा है। किसी भी देश या कालसे उसका परिच्छेद नहीं हो सकता ॥ ९० ॥ क्योंकि ये ( देश और काल ) भी तो उसीमें भास रहे हैं, फिर इनसे उसका परिच्छेद कैसे हो सकता है। इनके द्वारा उसके १. क्योंकि न तो उससे भिन्न किसीकी सत्ता है, जिसकी वह सिद्धि करे। और न वह किसीका कर्ता या करण ही है, जो किसीकी सिद्धिका साधक या साधन बने।