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त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

नवमोऽध्यायः । १२५ नाथ सूक्ष्मदृशा पश्य ज्ञानज्ञेयात्मकं जगत् ।; ८६ ॥ तत्र ज्ञानं स्वतःसिद्धं तदभावे न किञ्चन । प्रमाणानां प्रमाणं तदप्रमाणं स्वतो भवेत् ॥ ८७ ॥ यतः प्रमाणानपेक्षमादिसिद्धमतस्तु तत् । सिद्धसाधकभावेन न तत्सिद्धिः कदाचन ॥ ८८ ॥ तत्र विप्रतिपन्नस्य न प्रश्नो नापि चोत्तरम् । अनपह्नवनीयं तन्महादर्शतलं भवेत् ॥ ८९ ॥ तत्र सर्वं भासते वै दर्पणप्रतिबिम्बवत् । देशेन वापि कालेन परिच्छित्तिर्न विद्यते ॥ ९० ॥ तदन्तर्भासमानत्वात् कथं ताभ्यां परिच्छिदिः । परिच्छेदस्य भानन्तु गगने वस्तुभिर्यथा ॥ ९१ ॥ नाथ ! इस ज्ञान और ज्ञेयस्वरूप जगत्‌को आप सूक्ष्मदृष्टिसे देखिये । इसमें जो ज्ञान ( अनुभव ) है वह स्वतः सिद्ध है; वह न हो तो कुछ भी नहीं रह सकता ॥ ८६ उ०-८७ पू० ॥ वह सम्पूर्ण प्रमाणोंका प्रमाण है, किन्तु स्वयं किसी प्रमाणका विषय नहीं है। क्योंकि अपनी सिद्धिके लिये उसे प्रमाणकी अपेक्षा नहीं है, इसलिये वह सबसे पहले सिद्ध ( विद्यमान ) है। वह किसी सिद्धिका साधक है—इस रूपसे भी उसकी कभी सिद्धि नहीं हो सकती¹ ॥ ८७ उ०-८८ ॥ जिसे उस ज्ञानकी सत्तामें सन्देह है उसका तो कोई प्रश्न भी नहीं हो सकता और न उसे उत्तर ही दिया जा सकता है। एक महान् दर्पणके समान उसका किसी भी प्रकार निषेध नहीं किया जा सकता ॥ ८९ ॥ दर्पणमें प्रतिबिम्बकी तरह उसीमें सब कुछ भास रहा है। किसी भी देश या कालसे उसका परिच्छेद नहीं हो सकता ॥ ९० ॥ क्योंकि ये ( देश और काल ) भी तो उसीमें भास रहे हैं, फिर इनसे उसका परिच्छेद कैसे हो सकता है। इनके द्वारा उसके १. क्योंकि न तो उससे भिन्न किसीकी सत्ता है, जिसकी वह सिद्धि करे। और न वह किसीका कर्ता या करण ही है, जो किसीकी सिद्धिका साधक या साधन बने।

१३० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे राजपुत्र सूक्ष्मदृशा तल्लक्षय निजं वपुः । यत्र सामान्यचैतन्ये जगदेतद्विराजते ॥ ९२ ॥ तत्समावेशसंसिद्ध्या सर्वकर्तृत्वमाप्नुयात् । तस्योपलब्धिं वक्ष्यामि यतः प्राप्नोति तत् पदम् ॥ ९३ ॥ निद्राजाग्रन्मध्यभागे संविद्भेदान्तरे तथा । मध्ये संविद्विद्येयोश्च सूक्ष्मबुद्ध्याऽभिलक्षय ॥ ९४ ॥ एतत् पदं निजं रूपं यत् प्राप्य न विमुह्यसि । एतदज्ञानमात्रेण प्रवृत्तं जगदीदृशम् ॥ ९५ ॥ नात्र रूपं रसो वापि न गन्धस्पर्शशब्दकम् । न दुःखं न सुखं वा तु न ग्राह्यं ग्राहकञ्च न ॥ ९६ ॥ परिच्छेदका भान तो ऐसा ही है जैसे [ घटादि ] वस्तुओंके द्वारा आकाशमें परिच्छेदकी प्रतीति होना ॥ ६१ ॥ राजकुमार ! आप सूक्ष्म दृष्टिसे उस अपने स्वरूपका विचार कीजिये । उस सर्वसामान्य चैतन्य ( ज्ञान ) पर ही यह सारा जगत् खड़ा हुआ है ॥ ६२ ॥ उसके साथ अपने अभेदकी अनुभूति दृढ़ हो जानेपर जीव सर्व- कर्त्तृत्व ( परमेश्वरके साथ तन्मयत्व ) प्राप्त कर लेता है। मैं आपको उसकी उपलब्धिके स्थान बतलाती हूँ, जिनसे कि उस पदकी प्राप्ति हो सकती है ॥ ६३ ॥ निद्रा और जाग्रत् अवस्थाओंके मध्यमें, चित्तके एक विषयको छोड़कर दूसरे विषयपर जानेके बीचकी स्थितिमें और दो प्रकारकी बुद्धिवृत्तियोंके बीचमें आप सूक्ष्म बुद्धिसे उसका अनुभव कीजिये ॥६४॥ यह पद ही अपना वास्तविक स्वरूप है, जिसे पा लेनेपर जीव मोहमें नहीं पड़ता। इसके अज्ञान-मात्रसे ही यह सारा जगत्‌का पसारा फैला हुआ है ॥ ६५ ॥ इस आत्मस्वरूपमें न रूप है, न रस है और न गंध, स्पर्श या शब्द हैं । इसमें दुःख-सुख तथा ग्राह्य ( विषय ) और ग्राहक ( इन्द्रियाँ ) भी नहीं हैं ॥ ६६ ॥

नवमोऽध्यायः । १३१ सर्वाश्रयं सर्वरूपमपि सर्वविवर्जितम् । एष सर्वेश्वरो धाता विष्णुरीशः सदाशिवः ॥ ९७ ॥ पश्येषदन्तः संरुध्य स्वात्मानं स्वात्मना सता । त्यक्त्वा बहिः प्रसरतामन्तः प्रसरणोद्यतः ॥ ९८ ॥ त्यक्त्वा पश्यामीति भावमन्धवन्निश्चलात्मना । दर्शनादर्शने त्यक्त्वा योऽसि सोऽसि द्रुतं भज ॥ ९९ ॥ इत्युक्तः प्रियया हेमचूड आलक्ष्य तत् पदम् । चिरं विश्रान्तिमालभ्य वहिर्विस्मरणं ययौ ॥ १०० ॥ इति श्रीज्ञानखण्डे हेमचूडविश्रान्तिर्नवमोऽध्यायः । यह सबका आश्रय और सर्वरूप होनेपर भी सबसे रहित है । यही सबका स्वामी तथा ब्रह्मा, विष्णु और महादेव भी है ॥ ९७ ॥ अपने अन्तःकरणको थोड़ा रोककर सत्स्वरूप आत्माके द्वारा ही अपने आत्माका साक्षात्कार कीजिये । चित्तके बाह्य प्रसारको त्यागकर उसे भीतरकी ओर ले जानेका उद्योग कीजिये ॥ ९८ ॥ ‘मैं देखता हूँ’ इस भावको भी त्यागकर बिलकुल अन्धेके समान निश्चलचित्त होकर देखने और न देखनेके संकल्पको भी छोड़कर आप जो कुछ हैं तुरन्त उसी रूपसे स्थित हो जाइये१ ॥ ९९ ॥ प्रियतमा हेमलताके इस प्रकार कहनेपर हेमचूडने उस आत्मपदका अनुभव किया और चिरकालतक (निर्विकल्प समाधिमें) विश्रान्तिकी उपलब्धि करते हुए उसे बाह्य विषयोंका विस्मरण हो गया ॥ १०० ॥ नवम अध्याय समाप्त । १. ‘देखने’ अर्थात् जाग्रत् और स्वप्नावस्थाओंके तथा ‘न देखने’—सुषुप्ताव- स्थाके विकल्पोंको छोड़कर इन तीनोंका साक्षी, तीनोंसे विलक्षण और तीनोंमें अनुगत जो सामान्य चैतन्य रूप तुरीय है वही आप हैं, अतः उस आत्मस्वरूपसे ही स्थित हो जाइये ।

दशमोऽध्यायः अथाऽपश्यद्धेमलेखा प्रियं प्राप्तपरस्थितिम् । न चालयत्परपदात्ततः सोपि मुहूर्तः ॥ १ ॥ प्रबुद्ध उन्मील्य नेत्रे सोऽपश्यत्सप्रियं जगत् । भूयस्तत्पदविश्रान्तिमीहमानोऽतिवेगतः ॥ २ ॥ नेत्रे निमीलयद्यावद्ब्रवीत्तावदेव सा । प्रियं हस्ते समादाय सुधासुन्दरभाषिणी ॥ ३ ॥ नाथ किं ते व्यवसितं ब्रूहि नेत्रनिमीलनात् । उन्मीलनाद्वा किं स्यात्ते लाभालाभौ समीरय ॥ ४ ॥ उन्मील्य न प्राप्यते किं निमील्य प्राप्यते च किम् । तन्मे ब्रूहि प्रियतम श्रोतुमिच्छामि ते स्थितिम् ॥ ५ ॥ दशम अध्याय ॥ १० ॥ सभी तत्त्वज्ञ हो गये अब हेमलेखाने देखा कि उसके पतिको परमात्मामें स्थिति प्राप्त हो गयी है। तब उसने भी कुछ देर उसे उस परमपदसे विचलित नहीं किया ॥ १ ॥ फिर उसने सावधान होकर नेत्र खोले और अपनी प्रियाके सहित इस संसारको देखा। किन्तु ज्योंही वह पुनः नेत्र मूँदकर बड़ी तेजीसे उसी पदमें विश्रान्त होनेकी चेष्टा करने लगा, हेमलेखाने उसका हाथ पकड़कर अमृतके समान मधुर भाषण करते हुए उससे कहा ॥ २-३ ॥ “नाथ ! बतलाइये, आपका क्या विचार है ? कहिये न, इस प्रकार नेत्र मूँदने या खोलनेसे आपको क्या लाभ या हानि होती है ॥ ४ ॥ प्रियतम ! मैं आपकी स्थितिके विषयमें सुनना चाहती हूँ। नेत्र खोलनेसे आपको क्या नहीं मिलता और मूँद लेनेसे क्या मिल जाता है—यह मुझे बतलाइये” ॥ ५ ॥

दशमोऽध्यायः । १३३ एवं पृष्टस्तया प्राह मदमत्त इवालसः । अनिच्छन्नपि वक्तुं तामालस्यभरमन्थरः ॥ ६ ॥ प्रिये विश्रान्तिमत्यन्तं प्राप्तवानस्मि वै चिरात् । न बाह्ये दुःखभूयिष्ठे विश्रमोऽस्ति क्वचिन्मम ॥ ७ ॥ अलं ऋजीषरोमन्थप्रायव्यवहृतैर्बहिः । दौर्भाग्यान्धो नाद्य यावदविदं स्वात्मसत्सुखम् ॥ ८ ॥ यथा कश्चिदटन्भिक्षां निधानं स्वं न वेद वै । तथाहं स्वसुखाम्भोधिमविदित्वा पुनः पुनः ॥ ९ ॥ सुखं वैषयिकं श्रेष्ठं दुःखसंघाभिसंप्लुतम् । विद्युद्विलयनं मत्वा स्थिरं तत्परतावशात् ॥ १० ॥ दुःखैरभिहतो नूनं विश्रान्तिं न तु लब्धवान् । अहो जना दुःखसुखविवेकज्ञानवर्जिताः ॥ ११ ॥ हेमचूडका चित्त इस समय आलस्यके भारसे कुछ मन्दगति हो रहा था। अतः हेमलताके इस प्रकार प्रश्न करनेपर उसने बोलनेकी इच्छा न होने पर भी मदमत्तके समान आलस्यपूर्वक उससे कहा-॥६॥ "प्रिये ! मुझे आज बहुत काल पश्चात् बड़ी शान्ति प्राप्त हुई है। अब इस दुःखबहुल बाह्य प्रपञ्चमें मुझे कहीं विश्राम नहीं मिल सकता ॥ ७॥ ये बाह्य व्यवहार तो गन्नेकी छूँछ चूसनेके समान नीरस हैं, इनकी मुझे आवश्यकता नहीं है। मैं तो दुर्भाग्यवश अन्धा हो रहा था, इसीसे अबतक आत्मस्थितिके इस सच्चे सुखकी अनुभूति नहीं कर सका ॥ ८॥ जिस प्रकार कोई पुरुष अपने घरके खजानेको न जाने और भिक्षा माँगता फिरे, उसी प्रकार मैं इस आत्मानन्दरूप समुद्रको न जानकर बार-बार दुःखसमूहसे भरे वैषयिक सुखको ही, जो बिजलीके समान लीन हो जानेवाला है, श्रेष्ठ और स्थिर समझता रहा। और उसीके पीछे लगे रहनेके कारण दुःखोंसे दबा रहकर आजतक विश्राम नहीं पा सका ॥ ९-११ पू० ॥ अहो ! सबलोग दुःख-सुखके विवेकज्ञानसे रहित होनेके कारण,

१३४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे सुखार्थिनो दुःखसंघं सञ्चिन्वन्ति मुधा सदा । तदलं दुःखभोगेन स्वयत्नासादितेन वै ॥ १२ ॥ प्रिये कृपां मयि कुरु प्रार्थयामि कृताञ्जलिः । विश्रान्तिमभिवाञ्छामि चिरं स्वस्मिन्सुखात्मनि ॥ १३ ॥ अहो दैवहता भासि ज्ञात्वापि त्वमिदं पदम् । तद्विश्रान्तिं परित्यज्य मुधा दुःखाय चेष्टसे ॥ १४ ॥ इत्युक्ता सा प्रियं प्राह स्मयित्वेपन्मनीषिणी । नाथ ते तन्न विदितं पदं परमपावनम् ॥ १५ ॥ यत्र स्थिता न मुह्यन्ति पण्डिताः पावनाशयाः । तत्पदं दूरतस्तेस्ति भूस्थस्येव नभस्तलम् ॥ १६ ॥ त्वया किञ्चित्सुविदितं भवेदविदितोपमम् । निमील्योन्मील्य वा नेत्रे तत्पदं न समीक्ष्यते ॥ १७ ॥ सुखकी लालसा रहनेपर भी, व्यर्थ ही सर्वदा दुःखराशिका ही संग्रह करते रहते हैं। अतः अपने ही प्रयत्नसे प्राप्त किये हुए दुःखभोगकी अब मुझे आवश्यकता नहीं है ॥ ११ उ०-१२ ॥ प्रिये ! मैं हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूँ, तुम मुझपर कृपा करो। अब तो मैं अपने इस आनन्दस्वरूप आत्मामें ही चिरकालतक विश्रान्त रहना चाहता हूँ ॥ १३ ॥ अहो ! मुझे तुम बड़ी अभागिनी जान पड़ती हो, जो इस पदको जानकर भी तुम इसकी विश्रान्तिको छोड़कर व्यर्थ ही दुःख भोगनेके लिये व्यवहारमें लगी रहती हो” ॥ १४ ॥ इस प्रकार कहे जानेपर वह विवेकवती बाला कुछ मुसकराकर अपने प्रियतमसे बोली, “नाथ ! अभी आपको उस परम पवित्र पदका पता नहीं लगा है ॥ १५ ॥ पवित्र हृदय पण्डितजन जिसमें स्थित होकर कभी मोहग्रस्त नहीं होते वह पद तो अभी आपके लिये वैसे ही दूर है जैसे पृथ्वीपरके मनुष्यके लिये आकाश ॥ १६ ॥ आपने जो कुछ ठीक-ठीक समझा है वह तो न समझनेके समान ही है। वह पद आँखोंको मूँदने या खोलनेसे नहीं देखा जाता ॥ १७ ॥

दशमोऽध्यायः । १३५ अकृत्वा वापि कृत्वा वा न तल्लभ्येत कर्हिचित् । अगत्वा चापि वा गत्वा न तदासादयेत्पदम् ॥ १८ ॥ निमील्य कृत्वा गत्वा वा प्राप्तं पूर्णं कथं भवेत् । यवाष्टकमितेनैव पक्ष्मणोन्मीलितेन तु ॥ १९ ॥ अन्तर्हितं यदि तदा ननु पूर्णं भवेत्पदम् । अहो ते मोहमाहात्म्यमाश्चर्यं किमहं ब्रुवे ॥ २० ॥ यस्मिन्ब्रह्माण्डकोटीनां कोटयः कोणसंस्थिताः । पक्ष्मणोऽङ्गुलिमानस्योन्मीलनात्तत्तिरोहितम् ॥ २१ ॥ शृणु राजकुमारैतत्तत्त्वसारं वदामि यत् । यावद् ग्रन्थिविभेदो न न तावत्सुखमृच्छति ॥ २२ ॥ ग्रन्थयः कोटिशः सन्ति मोहरज्जुविवर्त्तिताः । तत्र स्वरूपासंविन्निर्मोहरज्जुरुदीरिता ॥ २३ ॥ यत्र ता ग्रन्थयः सन्ति विपरीतग्रहात्मकाः । तत्राद्या देहमुख्येषु भवेदात्मत्वनिश्चयः ॥ २४ ॥ इसी प्रकार कुछ करने या न करनेसे भी वह कभी नहीं मिलता तथा कहीं जाने या न जानेसे भी उस पदकी प्राप्ति नहीं होती ॥ १८ ॥ जो वस्तु आँख मूँदने, करने या जानेसे मिलती है वह भला, पूर्ण कैसे हो सकती है ? यदि आठ जौके बराबर आकारवाले पलकोंके खोलनेसे ही वह पद लुप्त हो जाता है तो वह अच्छा पूर्ण पद हुआ ? अहो ! आपके मोहकी बड़ी विलक्षण महिमा है । इस आश्चर्यके विषयमें मैं क्या कहूँ ॥ १९-२० ॥ जिसके एक कोनेमें करोड़ों ब्रह्माण्ड पड़े हुए हैं वह परमपद एक अंगुलि बराबर पलकके खोलनेसे ही लुप्त हो जाता है ! ॥ २१ ॥ राजकुमार ! सुनिये, मैं जो तत्त्वका सार है वह आपको बताती हूँ, क्योंकि जबतक ग्रन्थि ( गाँठ ) नहीं खुलती तबतक आनन्द प्राप्त नहीं होता ॥ २२ ॥ इस अज्ञानरूप रज्जुमें करोड़ों ग्रन्थियाँ भासित हो रही हैं, और आत्मस्वरूपको न पहचानना यही अज्ञान-रज्जु कही गयी है ॥ २३ ॥ उसमें जो विपरीतग्रहणरूप ग्रन्थियाँ हैं उनमें सबसे पहली है देहादिमें आत्मबुद्धि करना ॥ २४ ॥

१३६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे यद्वशादेष संसार आततो दुष्प्रतिक्रियः । तथा जगत्यनात्मत्वबुद्धिर्भानसमाश्रये ॥ २५ ॥ एवं जीवेशभेदादिनिश्चया ग्रन्थयो मताः । एतच्चिरात्समुद्भूतं भूयः संवर्धितं च वै ॥ २६ ॥ ग्रन्थिरूपसमापन्नं पुरुषः पाशितस्ततः । तद्ग्रन्थिविस्रंसनतो बन्धान्मुक्तिः समीरिता ॥ २७ ॥ यत्त्वं निमील्य नेत्रे स्वे पदमासादयस्यलम् । तत्पदं निजरूपं ते शुद्धसंविदनुत्तरम् ॥ २८ ॥ तदेवाखिलसंसारचित्रादर्शतलं महत् । कदा क्व केन रूपेण नास्ति तन्मे निरूपय ॥ २९ ॥ यदा यद्रूपतो यस्मिन्नेति ब्रूयाः स्वसंविदम् । तर्हि तत्कालदेशादेर्वन्ध्यापुत्रत्वमेव हि ॥ ३० ॥ जिसके कारण इस संसारका विस्तार हुआ है, जिससे छुटकारा पाना बड़ा ही कठिन है। तथा [ दर्पणमें प्रतिबिम्बके समान ] केवल भानके आश्रय खड़े हुए इस संसारमें अनात्मबुद्धि होना [ दूसरी ग्रन्थि है ] ॥ २५ ॥ इसी प्रकार जीव और ईश्वरमें भेद-निश्चय करना आदि अन्य ग्रन्थियाँ मानी गयी हैं। यह स्वरूपका अज्ञान अनादिकालसे उत्पन्न और बार-बार उलझकर ग्रन्थिरूप हो गया है। उसीसे यह पुरुष बँधा हुआ है। उस ग्रन्थिके कट जानेसे ही जीवकी बन्धनसे मुक्ति कही जाती है ॥ २६-२७ ॥ अपने नेत्रोंको मूँदकर आपने जो पूर्णपद प्राप्त किया है वह तो आपका अपना ही स्वरूप है और वह सम्पूर्ण अनात्मवर्गका निषेध करनेपर बचनेवाली शुद्ध संवित् ही है ॥ २८ ॥ वही इस सम्पूर्ण संसार-चित्रको प्रतिबिम्बित करनेवाला महान् दर्पण है। मुझे बताइये तो, वह कब, कहाँ और किस रूपमें नहीं है? ॥ २९ ॥ आप जिस काल, जिस रूप और जिस देशमें उस आत्मसंवित्का अभाव बतलायेंगे तब वे देश और कालादि तो वन्ध्यापुत्रके समान अलीक सिद्ध होंगे ॥ ३० ॥

दशमोऽध्यायः । १३७ प्रतिबिम्बो निरादर्शो यथा नाथ तथैव तत् । तस्मात्तत्पदसंत्यागान्नास्ति कुत्रापि किंचन ॥ ३१ ॥ तत्ते नेत्रोन्मीलनेन किमन्तरितमियात् । यावदेवं विजानामीत्येवं ग्रन्थिर्दृढा भवेत् ॥ ३२ ॥ तावन्न तत्पदं प्राप्तं यत्प्राप्तं स्यान्न तद्भवेत् । निमील्योन्मील्य वा नेत्रे यत्प्राप्तं मन्यसे पदम् ॥ ३३ ॥ तन्न पूर्णपदं यस्मात्परिच्छेदान्क्रियादितः । कुत्र नाथ महासंवित्नास्ति कालानलप्रभा ॥ ३४ ॥ स्वात्मीकरोति यानल्पकल्पनेन्धनसंचयम् । न ते कर्त्तव्यशेषो विज्ञाय परमं पदम् ॥ ३५ ॥ हे नाथ ! जिस प्रकार दर्पणके बिना प्रतिबिम्ब नहीं हो सकता उसी प्रकार [ आत्म-संवित्‌के बिना ] वे भी अलीक हैं। अतः उस पदके न रहनेपर तो कहीं कुछ भी नहीं रहता। ऐसी अवस्थामें आपके नेत्र खोलनेसे उसमें क्या अन्तर आ सकता है ॥ ३१-३२ पू० ॥ जबतक यह ग्रन्थि दृढ़ बनी हुई है कि मैं इस प्रकार ( साधन- विशेषके द्वारा ) उसे जानता हूँ, तब तक उस पदकी प्राप्ति नहीं हुई; क्योंकि जो [ किसी प्रयत्नके द्वारा ] प्राप्त होता है वह वह पद नहीं होता ॥ ३२ उ०-३३ पू० ॥ जिस पदको आप नेत्रोंके मूँदने या खोलनेसे प्राप्त हुआ समझते हैं वह पूर्णपद नहीं हो सकता, क्योंकि उसका तो क्रियाविशेषसे परिच्छेद हो जाता है ॥ ३३ उ०-३४ पू० ॥ नाथ ! वह कालाग्निके समान सर्वग्रासिनी महासंवित् भला, कहाँ नहीं है; जो इस तुच्छ कल्पनारूप ईंधनकी ढेरीको अपनेमें लीन कर लेती है? ॥ ३४ उ०-३५ पू० ॥ उस परम पदको जान लेनेपर अब आपको कुछ भी करना शेष नहीं है। 'मैं चित्तका निरोध करके उस हृदयस्थित आत्मतत्त्वका साक्षा- १. अर्थात् जब वह उदित होती है तो सब तद्रूप ही भासता है। उससे भिन्न किसी भी देश, काल या वस्तुकी सत्ता नहीं रहती।

१३८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे त्यज ग्रन्थिं सन्निरुध्य पश्यामीति हृदि स्थिताम् । इदं नाहमिति ग्रन्थिमुन्मूल्य परां दृढाम् ॥ ३६ ॥ पश्य सर्वत्र चात्मानमखण्डानन्दबृंहितम् । पश्यात्मन्यखिलं लोकं दर्पणप्रतिबिम्बवत् ॥ ३७ ॥ सर्वत्राखिलमात्मानमिति भूयो न भावयन् । शेषमभ्युपगम्यान्तःस्वस्थो भव निजात्मना ॥ ३८ ॥ इति प्रियोदितं श्रुत्वा हेमचूडः सिताशयः । विदित्वा पूर्णमात्मानं सर्वत्र भ्रान्तिवर्जितः ॥ ३९ ॥ क्रमात्पूर्णसमावेशासादनात्स्थिरभावनः । विहरन्सर्वदा हेमलेखादियुवतीगणैः ॥ ४० ॥ शासन् राज्यं समृद्धं स्वं जित्वा शत्रुगणं रणे । शास्त्राणि श्रावयन् शृण्वन्नर्जयन्धनसंचयम् ॥ ४१ ॥ त्कार करूँ' इस ग्रन्थिको आप त्याग दीजिये । 'मैं यह नहीं हूँ' इस अत्यन्त दृढ ग्रन्थिको भी काट डालिये ॥ ३५ उ०-३६ ॥ सर्वत्र अखण्डानन्दपूर्ण आत्मतत्त्वका दर्शन कीजिये । सम्पूर्ण प्रपञ्चको दर्पणमें प्रतीत होनेवाले प्रतिबिम्बके समान अपने आत्मामें ही भासमान देखिये ॥ ३७ ॥ और फिर यह भावना भी मत कीजिये कि सर्वत्र केवल आत्मा ही है । इस प्रकार सम्पूर्ण भावनाओंके त्यागनेपर जो शेष रहे उसीको अपना स्वरूप जानकर अपने अकृत्रिम स्वरूपसे अभिन्न होकर स्थित रहिये' ॥ ३८ ॥ अपनी प्रियाका यह भाषण सुनकर हेमचूडका चित्त सर्वथा शुद्ध हो गया । आत्माको सर्वत्र पूर्ण जानकर उसकी सम्पूर्ण भ्रान्ति निवृत्त हो गयी [ अब उसे निरोध आदि किसी अवस्था विशेषका आग्रह नहीं रहा ] ॥ ३९ ॥ क्रमशः परमात्माके परिपूर्ण स्वरूपमें दृढ भावना होनेसे उसकी स्थिर स्थिति हो गयी । अब वह सर्वदा हेमलेखा आदि युवतियोंके साथ विहार करते हुए, शत्रुसमूहको युद्धमें जीतकर ऐश्वर्यसम्पन्न राज्यका शासन करते हुए, शास्त्र श्रवण करने और कराने हुए तथा धनसंचय करके

दशमोऽध्यायः । १३६ अश्वमेधराजसूयाद्यैर्यजन्क्रतुमुरुयकैः । वर्षाणामयुते द्वे वै जीवन्मुक्तो भुवि स्थितः ॥ ४२ ॥ जीवन्मुक्तदशासंस्थं निशाम्य तनयं नृपः । मुक्ताचूडश्च तद्‌भ्राता मणिचूडोऽप्यचिन्तयत् ॥ ४३ ॥ किमयं पूर्ववन्नेह लक्ष्यते सर्वथा किल । सुखे न हृष्यत्यत्यन्तं दुःखे नोद्विजते तथा ॥ ४४ ॥ लाभालाभौ शत्रुमित्रे साम्यात्पश्यति वै कुतः । करोति राजकार्याणि नटवद्रङ्गमण्डले ॥ ४५ ॥ कापिशायनपायीव सदा मत्तोऽभिलक्ष्यते । सदान्यत्र गतस्वान्त इव कृत्यङ्करोत्यलम् ॥ ४६ ॥ तत्केन हेतुना चेति तमासाद्य रहः क्वचित् । अपृच्छतां हेमचूडं कुत एवं भवानिति ॥ ४७ ॥ अश्वमेध और राजसूय आदि बड़े-बड़े यज्ञ करते हुए बीस हजार वर्षतक जीवन्मुक्त अवस्थामें इस पृथ्वीतलपर रहा ॥ ४०-४२ ॥ अपने पुत्रको जीवन्मुक्त अवस्थामें स्थित देखकर राजा मुक्ताचूड़ने और उसके भाई मणिचूड़ने भी विचार किया — ॥ ४३ ॥ ‘क्या कारण है अब यह हेमचूड़ पहलेकी तरह बिलकुल दिखायी नहीं देता । यह न तो सुखमें विशेष प्रसन्न होता है और न दुःखमें उदास होता है ॥ ४४ ॥ यह लाभ-हानि और शत्रु-मित्रोंको समान दृष्टिसे क्यों देखने लगा है । आजकल यह राज्यके सब कार्य रंगभूमिमें नाटकके पात्रके समान कर रहा है ॥ ४५ ॥ यह मद्यपायीके समान सर्वदा अपनेमें मस्त दिखायी देता है और सारे कार्य सदा इस प्रकार करता है मानो इसका चित्त कहीं अन्यत्र ही लगा हो ॥ ४६ ॥ यह सब किस कारणसे हुआ ?’ ऐसा सोचकर किसी दिन उन्होंने एकान्तमें हेमचूड़के पास जाकर पूछा, “तुम्हारी यह दशा कैसे हो गयी” ॥ ४७ ॥

१४० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे ततः स्वस्थितिमाचख्यौ हेमचूडस्तयोः क्रमात् । तावुभौ भ्रातृपितरौ हेमचूडेन बोधितौ ॥ ४८ ॥ आसादितपरतत्त्वौ जीवन्मुक्तौ बभूवतुः । अथ मन्त्रिगणोप्येवं राज्ञः श्रुत्वा जगद्गतिम् ॥ ४९ ॥ विचार्य स्वात्मनो भावं ज्ञातज्ञेयोऽभवत्तदा । एवं विशालनगरे क्रमेणैव परस्परम् ॥ ५० ॥ उपदेशाद्विदुः सर्वे तत्त्वमाबालगोपकाः । नरा नार्यो बालवृद्धा दासा दासीगणा अपि ॥ ५१ ॥ ज्ञातज्ञेयास्त्यक्तदेहाहम्भावा अभवन्खलु । न तत्र कस्यचित्कामः क्रोधो वा लोभ एव वा ॥ ५२ ॥ अनाहृतोऽस्ति बालस्य स्थविरस्यापि वा क्वचित् । आहृतक्रोधकामाद्यैर्व्यवहारपरायणाः ॥ ५३ ॥ बालं माता खेलयति परतत्त्वस्य वार्तया । दासा दास्यः स्वामिनं स्वं सदा परिचरन्ति वै ॥ ५४ ॥ तब हेमचूडने क्रमशः उन्हें अपनी सब स्थिति सुनायी और उसके बोध करानेसे वे पिता और चाचा दोनों ही परमतत्त्वकी उपलब्धि कर जीवन्मुक्त हो गये ॥ ४८-४९ पू० ॥ इसी प्रकार फिर मन्त्रियोंने भी राजासे जगत्का रहस्य सुनकर आत्माके स्वरूपका विचार किया और उन्होंने भी जो जानने योग्य था उसे जान लिया ॥ ४९ उ०-५० पू० ॥ इस प्रकार उस विशाल नगरमें बालक और ग्वाले तक सभी क्रमशः एक-दूसरेसे उपदेश लेकर परमतत्त्वको जान गये ॥५० उ०-५१ पू० ॥ नर-नारी, बालक-वृद्ध और दास-दासी भी ज्ञात-ज्ञेय होकर देहमें अहंबुद्धिसे रहित हो गये। वहाँ बालक या वृद्ध किसीके भी काम, क्रोध या लोभ निवृत्त हुए बिना नहीं रहे। सब लोग काम-क्रोधादिको संयत रखकर ही व्यवहारमें तत्पर रहते थे ॥ ५१ उ०-५३ ॥ माताएँ परमतत्त्वकी चर्चा करके ही बच्चोंको खिलाती थीं। दास और दासियाँ सर्वदा आपसमें परमतत्त्व-विषयक वाक्योंका व्यवहार

परतत्त्वपरैर्वाक्यैर्व्याहरन्तः परस्परम् । नटा नाट्यं वितन्वन्ति पात्रैस्तत्त्वप्रसङ्गजैः ॥ ५५ ॥ विवेकवार्तापरमं वचो गायन्ति गायकाः । विदूषका दूषयन्ति लोकव्यवहृतिं सदा ॥ ५६ ॥ शास्त्राणि पाठयन्ति स्म विद्वांसः पाठकान् जनान् । परतत्त्वविचारार्हेरुदाहरणमण्डलैः ॥ ५७ ॥ एवं तत्र नरा नार्यो दासा दास्यो नटा विटाः । भृत्या भटा मन्त्रिणश्च शिल्पिनो वारयोषितः ॥ ५८ ॥ सर्वे वेदितवेद्यास्ते विशालनगरेऽभवन् । प्राक्तसंस्कारबलेनैव व्यवहारपरायणताः ॥ ५९ ॥ न संस्मरति संवृत्तं शुभं वाप्यशुभं तथा । भविष्यं नानुसन्धत्ते हर्षशोकादिसाधनम् ॥ ६० ॥ वर्तमाने स्मयन्हृष्यन्खिद्यन् क्रुध्यन्निवान्वहम् ।

करते हुए ही अपने स्वामीकी सेवा करते थे। तथा नट लोग तत्त्व- प्रसंगसम्बन्धी [ विवेक-मोह आदि ] पात्रोंके द्वारा ही नाटक खेलते थे ॥ ५४-५५ ॥ गानेवाले विवेककी चर्चासे भरी वाणियोंका ही गान करते थे तथा विदूषक लोग सर्वदा लौकिक व्यवहारका उपहास करते थे ॥ ५६ ॥ विद्वान् लोग विद्यार्थियोंको परमतत्त्वके विचारका पोषण करने- वाले उदाहरणोंसे पूर्ण शास्त्रोंका अध्ययन कराते थे ॥ ५७ ॥ इस प्रकार उस विशाल नगरमें नर, नारी, दास, दासी, नट, विदूषक, सेवक, सिपाही, मन्त्री, कारीगर, और वेश्याएँ सभी जानने योग्य परमतत्त्वको जान गये ॥ ५८-५९ पू० ॥ अपने पूर्वसंस्कारोंके अनुसार व्यवहार करते हुए भी उन्हें अपनी क्रियाओंमें शुभ या अशुभ का अनुसन्धान नहीं होता था। [ उनकी सब चेष्टाएँ बच्चोंके समान स्वभावसे ही होती थीं ] ॥ ५९ उ०-६० पू० ॥ जिसके कारण हर्ष या शोकादिकी कल्पनाएँ होती हैं उस भविष्य- का वे कभी चिन्तन नहीं करते थे। वर्तमानमें प्रसंगवश मुसकराते,

१४२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे मधुक्षीव इवात्यन्तं व्यवहारपरो जनः ॥ ६१ ॥ एवंविधं तन्नगरं ऋषयः सनकादयः । प्रसिद्धविद्यानगरमित्याख्यमृचुरागताः ॥ ६२ ॥ यत्र कीराः पञ्जरस्था अपि वाचो वदन्ति वै । चितिरूपं स्वमात्मानं भजध्वं चेत्यवर्जितम् ॥ ६३ ॥ नास्ति चेत्यं चितेरन्यद्दर्पणप्रतिबिम्बवत् । चितिश्चेत्यं चितिरहं चितिः सर्वं चराचरम् ॥ ६४ ॥ यतः सर्वं चितिमनु भाति सा तु स्वतन्त्रतः । अतश्चितिं जनाः सर्वभासिनीं सर्वसंश्रयाम् ॥ ६५ ॥ भजध्वं भ्रान्तिमुत्सृज्य चितिमात्रं सुदृष्टयः । तिर्यञ्चोप्येवमत्यन्तं यत्र वाचो वदन्ति वै ॥ ६६ ॥ प्रसिद्धविद्यानगरं तदद्यापि प्रचक्षते । हर्षित होते, खिन्न होते और क्रोध-सा करते हुए भी वे मद्योन्मत्तके समान निरन्तर अत्यन्त व्यवहारपरायण रहते थे ॥ ६० उ०-६१ ॥ इस प्रकारके उस नगरमें एकबार सनकादि ऋषि आये । उन्होंने उसका 'विद्यानगर' नाम रख दिया¹ ॥ ६२ ॥ वहाँ पिंजरोंमें बन्द तोते भी इन वाणियोंका पाठ करते थे— “चेत्य पदार्थोंसे रहित जो चिन्मात्र अपना आत्मा है उसका भजन करो ॥ ६३ ॥ दर्पणमें प्रतिबिम्बके समान चेत्य पदार्थ चिन्मात्रसे भिन्न नहीं है । चिति (चिन्मात्र) ही चेत्य है, चिति ही 'मैं' हूँ और चिति ही सारा चराचर, क्यों इन सबका भान चितिसे ही होता है और चिति स्वयंप्रकाश है ॥ ६४-६५ पू० ॥ इसलिये हे लोगो ! भ्रान्तिको त्यागकर केवल चितिपर ही दृष्टि रखते हुए सबको प्रकाशित करनेवाली और सभीकी आश्रयभूता चितिका ही भजन करो” ॥ ६५ उ०-६६ पू० ॥ जहाँ पक्षी भी सर्वथा ऐसी वाणी बोलते हैं वह सुप्रसिद्ध विद्या- नगर आज भी देखा जाता है ॥ ६६ उ०-६७ पू० ॥ १. आगेके चार श्लोक चतुर्थ अध्यायके अन्तमें भी आ चुके हैं ।

दशमोऽध्यायः । १४३ एवं तत्र पुरा हेमलेखया खलु बोधितः ॥ ६७ ॥ हेमचूड़ोऽभवद्विद्वान्जीवन्मुक्तस्तथेतेरे । स्त्रीबालप्रमुखाः सर्वे जाता ज्ञातपरावराः ॥ ६८ ॥ तस्माच्छ्रेयोनिदानं तु सत्सङ्गः प्रथमं भवेत् । तस्माच्छ्रेयोवाञ्छने तु सत्संश्रयपरो भवेत् ॥ ६९ ॥ इति श्रीमज्ज्ञानखण्डे हेमचूड़ोपाख्याने दशमोऽध्यायः । इस प्रकार पूर्वकालमें वहाँ हेमलेखाके द्वारा ज्ञान प्राप्त करनेवाला हेमचूड नामका तत्त्ववेत्ता और जीवन्मुक्त राजा हुआ। उसके पश्चात् स्त्री और बालक पर्यन्त अन्य सब लोग भी परमतत्त्वको जान गये ॥ ६७ उ०-६८ ॥ इसलिये कल्याणका सबसे पहला साधन सत्संग है। इसलिये जिसे निःश्रेयसकी इच्छा हो उसे सन्तोंके सहवासमें रहना चाहिये ॥ ६६ ॥ दशम अध्याय समाप्त ।

एकादशोऽध्यायः श्रुत्वैवं हेमचूडस्य कथामत्यद्भुतां तदा । भार्गवः सन्दिग्धमनाः प्रष्टुं समुपचक्रमे ॥ १ ॥ भगवन् श्रीगुरो यत्ते प्रोक्तं ज्ञानं महाद्भुतम् । भाति मे विषमं ह्येतदसाध्यं चापि सर्वतः ॥ २ ॥ कथमेतज्जगद् दृश्यं चितिमात्रस्वरूपकम् । अदृष्टं केवलं ह्येतच्छ्रद्धोपेयं न चान्यथा ॥ ३ ॥ चितिश्चेत्यविनिर्मुक्ता नानुभाव्या कथंचन । नोपपन्नं सर्वथैतत्कथं चित्तं समारुहेत् ॥ ४ ॥ कृपया बोधनीयोऽहमत्र सर्वात्मना खलु । इत्यापृष्टो दत्तगुरुरवदद्भार्गवं प्रति ॥ ५ ॥ एकादश अध्याय ॥ ११ ॥ जगत्‌के स्वरूपका विवेचन इसप्रकार हेमचूडकी यह अद्भुत कथा सुनकर परशुरामजीके मनमें कुछ सन्देह हुआ और वे पूछने लगे— ॥ १ ॥ “भगवन् ! गुरुदेव ! आपने जो बड़ा ही विचित्र तत्त्वज्ञान कहा है, वह मुझे तो सब प्रकार बड़ा कठिन और असाध्य जान पड़ता है ॥ २ ॥ यह दृश्य जगत् केवल चिन्मात्रस्वरूप कैसे हो सकता है ? यह बात प्रत्यक्ष देखनेमें तो नहीं आती; हाँ, श्रद्धासे मानी जा सकती है, और किसी प्रकार नहीं ॥ ३ ॥ चेत्यसे भिन्न चिति तो किसी प्रकार अनुभवमें भी नहीं आ सकती । यह बात किसी प्रकार युक्तिसंगत नहीं है, फिर यह चित्तमें कैसे बैठे ? ॥ ४ ॥ यह विषय कृपा करके मुझे सब प्रकार समझा दीजिये।” इस प्रकार पूछे जानेपर गुरु दत्तात्रेयजी परशुरामसे बोले— ॥ ५ ॥

एकादशोऽध्यायः । १४५ शृणु राम प्रवक्ष्यामि दृश्यतत्त्वं यथास्थितम् । एतद् दृश्यमशेषं तु दृशिमात्रं न चेतरत् ॥ ६ ॥ अत्रोपपत्तिं वक्ष्यामि शृणु सम्यक्समाहितः । एतद् दृश्यं कार्यभूतमुत्पत्तेरुपलम्भतः ॥ ७ ॥ उत्पत्तिर्नूतनाभासः प्रतिक्षणमिदं जगत् । नूतनत्वेनैव भाति तत्क्षणोत्पत्तिमज्जगत् ॥ ८ ॥ केचित्प्राहुर्जगदिदमखण्डैकक्षणोद्भवम् । अन्ये पदार्थसंघातमयं स्थिरचरात्मकम् ॥ ९ ॥ सर्वथा तु समुत्पत्तिमदित्येव सुनिश्चितम् । तत्र स्वभाववादस्तु नोचितोऽतिप्रसङ्गतः ॥ १० ॥ परशुराम ! सुन, मैं तुम्हें यथार्थ रीतिसे इस दृश्यका रहस्य बतलाता हूँ । यह सारा दृश्य दृङ्मात्र है, और कुछ नहीं ॥ ६ ॥ इसमें मैं तुम्हें युक्ति भी बताता हूँ, खूब सावधान होकर सुनो । यह दृश्य किसीका कार्य है, क्योंकि इसकी उत्पत्ति देखी जाती है ॥ ७ ॥ उत्पत्ति कहते हैं नवीनरूपसे प्रतीत होने को । यह जगत् प्रत्येक- क्षणमें नवीन रूपसे ही भासता है; इसलिये यह क्षण-क्षणमें उत्पन्न होनेवाला हुआ ॥ ८ ॥ कोई ( विज्ञानवादी ) तो इस जगत्को क्षण-क्षणमें उत्पन्न होने वाला किन्तु अखण्डपरम्परा-युक्त मानते हैं। और कोई ( न्याय-वैशे- षिक मतावलम्बी ) इसे आकाशादि स्थिर ( नित्य ) और घटादि चर ( अनित्य ) पदार्थोंका समूह बतलाते हैं ॥ ९ ॥ किन्तु सभी दृष्टियोंसे यह तो निश्चित है कि यह उत्पन्न होने- वाला ही है। उत्पत्तिमें स्वभाववाद¹ माना नहीं जा सकता, क्योंकि ऐसी स्थितिमें उत्पत्तिका कोई नियम नहीं रह सकेगा² ॥ १० ॥ १. बिना उपादान कारणके स्वतः उत्पन्न हो जाना । २. उत्पत्तिका यह नियम देखा जाता है कि एक विशेष उपादानसे किसी विशे कार्यकी ही उत्पत्ति होती है । यदि ऐसा न हो तो मिट्टीसे घड़ा और तन्तुओंसे वस्त्र ही क्यों उत्पन्न होता है ।

१४६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अन्वयव्यतिरेकाभ्यां कार्यकारणनिश्चयात् । संवादतः प्रवृत्तीनां कथमाकस्मिकं भवेत् ॥ ११ ॥ क्वचित्तु कारणेऽदृष्टेऽप्यदृष्टं कल्प्यमेव तत् । बहूनामनुरोधो हि न्याय्यः सर्वैरुदाहृतः ॥ १२ ॥ भूयो दृष्टं सपूर्वं हि कार्यं क्वचिददर्शने । दृष्टवत्परिकल्प्यं स्यादन्यथा सार्वलौकिकी ॥ १३ ॥ सम्प्रवृत्तिर्विरुध्येत तस्मात्सर्वं सकारणम् । अत एव कार्यहेतोः किंचित्कारणतत्परः ॥ १४ ॥ सर्वत्र दृश्यते लोकस्तस्मादेतन्न किंचन । केचिदाहुरसत्कल्पैरणुभिः कार्यमुद्यतम् ॥ १५ ॥ तेभ्योऽत्यन्तं विभिन्नं चाप्यसदत्यन्ततो भवेत् । [ कार्यमें कारणकी सत्ता रहती है, कारणके बिना कार्य होता ही नहीं ] इस अन्वय-व्यतिरेकके द्वारा भी कार्य-कारण भावका निश्चय होता ही है। इस नियममें कभी कोई अन्तर भी नहीं पड़ता। ऐसी स्थितिमें यह आकस्मिक ( अनियत ) कैसे हो सकता है ॥ ११ ॥ कहीं-कहीं कारण देखनेमें नहीं आता, वहाँ अदृष्ट कारणका अनुमान कर लेना चाहिये, क्योंकि जो बहुमत होता है उसे स्वीकार करना सभीने न्यायानुुकूल माना है ॥ १२ ॥ अधिकांश वस्तुएँ तो कारणपूर्वक ही देखी जाती हैं। इसलिये यदि कहीं कारण दिखायी न दे तो अन्यत्र देखे हुए कारणोंकी तरह वहाँ भी कारणकी कल्पना कर लेनी चाहिये। नहीं तो जो प्रवृत्ति सर्वत्र देखी जाती है उससे विरोध होगा। इसलिये सब पदार्थ कारणपूर्वक ही हैं ॥ १३-१४ पू० ॥ इसीलिये जब कोई कार्य करना होता है तो सभी जगह लोग उसकी साधनसामग्री जुटानेमें तत्पर देखे जाते हैं। अतः यह स्वभाव- वाद [ कि संसार बिना कारणके स्वयं उत्पन्न हो गया ] कुछ भी नहीं है ॥ १४ उ०-१५ पू० ॥ कोई ( परमाणुवादी नैयायिक ) कहते हैं कि यह कार्यरूप जगत् असत्तुल्य ( अव्यक्त एवं जड ) परमाणुओंसे बना है। किन्तु यह [ व्यक्त और सद्रूप होनेके कारण ] उनसे अत्यन्त भिन्न है। तथापि

एकादशोऽध्यायः। १४७ असत्सतोरेकता हि विरुद्धा न कुतो भवेत् ॥ १६ ॥ न हिपीतमपीतं च प्रकाशं चाप्रकाशकम् । एकं भवेद्विरुद्धत्वात्साङ्कर्यादिप्रसक्तितः ॥ १७ ॥ ईश्वरेच्छादितो वापि कथमादिक्रियोद्भवः । गुणसाम्यप्रकृतिकं जगदित्यप्यसंभवि ॥ १८ ॥ वैषम्यहेतोर्मृग्यत्वात्साम्यहेतोश्च हीनतः । चेतनेनानधिष्ठानाद् दृष्टान्तानुपलम्भतः ॥ १९ ॥ अन्तमें यह भी असत् हो जाता है । परन्तु इस सिद्धान्तमें जो असत् और सत् की अभिन्नता बतायी गयी है वह विरुद्ध क्यों नहीं है ? ॥ १५ उ० १६ ॥ पीत और अपीत या प्रकाश और अप्रकाश एक कभी नहीं हो सकते, क्योंकि इनका परस्पर विरोध है और ऐसा माननेसे संकरादि¹ दोषोंका भी प्रसंग होगा ॥ १७ ॥ [यदि कहें कि ईश्वरकी इच्छासे परमाणुओं में गति उत्पन्न हो जाती है, तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि ] ईश्वरकी इच्छासे भी आरम्भमें जड परमाणुओंमें क्रिया की उत्पत्ति कैसे हो सकती है ? [ इस प्रकार परमाणुवादका निराकरण कर अब सांख्योक्त प्रकृतिकारण- वादका खण्डन करते हैं—] गुणोंकी साम्यावस्थारूप प्रकृते जगत्का भाव है—यह बात भी सम्भव नहीं है ॥ १८ ॥ इसके लिये सृष्टिके आरम्भमें जोप्रकृतिके गुणोंमें विषमता होती है उसका कारण ढूँढ़ना होगा और प्रलयमें जो उनकी पुनः समता होती है उसका भी कोई हेतु नहीं जान पड़ता । [ यदि कहो कि ईश्वरकी इच्छासे ऐसा होता है तो ] सांख्यवादी प्रकृतिको किसी चेतनसे अधिष्ठित मानते नहीं हैं । और ऐसा कोई दृष्टान्त नहीं मिलता कि चेतनाके बिना ही किसी जडमें क्रिया उत्पन्न हो जाय ॥ १९ ॥ १. एक ही वस्तुमें दो विरुद्ध धर्मोंका आरोप करना 'संकर' दोष है। इसके सिवा नैयायिक परमाणुओंको निरवयव मानते हैं और निरवयव वस्तुओंका संयोग होना सम्भव नहीं है। यह 'अव्याप्यवृत्तित्वभंग' रूप दोष 'आदि' पदसे ग्रहण करना चाहिये।

१४८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तस्माज्जागतकार्यस्य कारणं नोपलभ्यते अदृष्टे तु श्रुतिर्मूलं नान्यमानसुसङ्गमः ॥ २० ॥ प्रमातॄणामपूर्णत्वात्प्रमाणस्यानवस्थितेः । कार्यकार्तृवियोगस्य भूयोऽदर्शनहेतुतः ॥ २१ ॥ सकर्तृकं जगदिदं सम्भवाच्चेतनो हि सः । कार्यस्याचिन्त्यरूपस्य कर्त्ता साधारणः कथम् ॥ २२ ॥ तस्मादचिन्त्यशक्तिः स आगमस्तद्विमर्शनम् । पूर्णस्य त्वप्रतिहतं प्रमाणं सर्वतोधिकम् ॥ २३ ॥ तत्रैकस्तु महेशानः पुरा सृष्टेरुदाहृतः । स्वतन्त्रो ह्यनुपादानः स्वातन्त्र्यभरवैभवात् ॥ २४ ॥ इस प्रकार जगत् रूप कार्यका कोई भी दृष्ट कारण तो मिलता नहीं है। और अदृष्ट कारणका निर्णय करनेमें श्रुति ही मूल प्रमाण है, उससे भिन्न कोई और प्रमाण माननीय नहीं हो सकता ॥ २० ॥ क्योंकि प्रमाता जीव तो अपूर्ण हैं तथा किसी प्रमाणकी उस ( परोक्ष कारण ) में गति नहीं है। और ऐसा कभी देखा नहीं जाता कि कर्ताके बिना ही कार्य हो गया हो। इसलिये यह जगत् किसी कर्ताकी ही रचना है। और सम्भव होनेके कारण वह कर्ता चेतन ही होना चाहिये। तथा यह जगत्-रूप कार्य बड़ा विलक्षण है, इसलिये इसका कर्ता भी साधारण कैसे हो सकता है ? ॥ २१-२२ ॥ अतएव वह अचिन्त्यशक्ति-सम्पन्न है और उसके तत्त्वको बत- लानेवाला उसीका व्यापार है आगम ( वेद )। अतः वही उस पूर्ण- तत्त्वको प्रकाशित करनेवाला सर्वथा अबाधित सबसे बड़ा प्रमाण है ॥ २३ ॥ उस आगममें कहा है कि सृष्टिसे पूर्व एकमात्र महेश्वर ही थे। उन परम स्वतन्त्र परमेश्वरमें बिना किसी अन्य सामग्रीके अपनी १. सृष्टिका कारण परोक्ष है, इसलिये उसमें किसी इन्द्रियकी गति न हो सकने के कारण वह प्रत्यक्ष प्रमाणका विषय नहीं हो सकता। और अनुमान प्रत्यक्ष- मूलक होता है, अतः प्रत्यक्षकी गति न होनेके कारण उसमें अनुमानकी भी गति नहीं है। इसी प्रकार किसी अन्य प्रमाण का भी वह विषय नहीं है।