भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 145, कुल 404 में से

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नवमोऽध्यायः । १३१ सर्वाश्रयं सर्वरूपमपि सर्वविवर्जितम् । एष सर्वेश्वरो धाता विष्णुरीशः सदाशिवः ॥ ९७ ॥ पश्येषदन्तः संरुध्य स्वात्मानं स्वात्मना सता । त्यक्त्वा बहिः प्रसरतामन्तः प्रसरणोद्यतः ॥ ९८ ॥ त्यक्त्वा पश्यामीति भावमन्धवन्निश्चलात्मना । दर्शनादर्शने त्यक्त्वा योऽसि सोऽसि द्रुतं भज ॥ ९९ ॥ इत्युक्तः प्रियया हेमचूड आलक्ष्य तत् पदम् । चिरं विश्रान्तिमालभ्य वहिर्विस्मरणं ययौ ॥ १०० ॥ इति श्रीज्ञानखण्डे हेमचूडविश्रान्तिर्नवमोऽध्यायः । यह सबका आश्रय और सर्वरूप होनेपर भी सबसे रहित है । यही सबका स्वामी तथा ब्रह्मा, विष्णु और महादेव भी है ॥ ९७ ॥ अपने अन्तःकरणको थोड़ा रोककर सत्स्वरूप आत्माके द्वारा ही अपने आत्माका साक्षात्कार कीजिये । चित्तके बाह्य प्रसारको त्यागकर उसे भीतरकी ओर ले जानेका उद्योग कीजिये ॥ ९८ ॥ ‘मैं देखता हूँ’ इस भावको भी त्यागकर बिलकुल अन्धेके समान निश्चलचित्त होकर देखने और न देखनेके संकल्पको भी छोड़कर आप जो कुछ हैं तुरन्त उसी रूपसे स्थित हो जाइये१ ॥ ९९ ॥ प्रियतमा हेमलताके इस प्रकार कहनेपर हेमचूडने उस आत्मपदका अनुभव किया और चिरकालतक (निर्विकल्प समाधिमें) विश्रान्तिकी उपलब्धि करते हुए उसे बाह्य विषयोंका विस्मरण हो गया ॥ १०० ॥ नवम अध्याय समाप्त । १. ‘देखने’ अर्थात् जाग्रत् और स्वप्नावस्थाओंके तथा ‘न देखने’—सुषुप्ताव- स्थाके विकल्पोंको छोड़कर इन तीनोंका साक्षी, तीनोंसे विलक्षण और तीनोंमें अनुगत जो सामान्य चैतन्य रूप तुरीय है वही आप हैं, अतः उस आत्मस्वरूपसे ही स्थित हो जाइये ।

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