भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 144

१३० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे राजपुत्र सूक्ष्मदृशा तल्लक्षय निजं वपुः । यत्र सामान्यचैतन्ये जगदेतद्विराजते ॥ ९२ ॥ तत्समावेशसंसिद्ध्या सर्वकर्तृत्वमाप्नुयात् । तस्योपलब्धिं वक्ष्यामि यतः प्राप्नोति तत् पदम् ॥ ९३ ॥ निद्राजाग्रन्मध्यभागे संविद्भेदान्तरे तथा । मध्ये संविद्विद्येयोश्च सूक्ष्मबुद्ध्याऽभिलक्षय ॥ ९४ ॥ एतत् पदं निजं रूपं यत् प्राप्य न विमुह्यसि । एतदज्ञानमात्रेण प्रवृत्तं जगदीदृशम् ॥ ९५ ॥ नात्र रूपं रसो वापि न गन्धस्पर्शशब्दकम् । न दुःखं न सुखं वा तु न ग्राह्यं ग्राहकञ्च न ॥ ९६ ॥ परिच्छेदका भान तो ऐसा ही है जैसे [ घटादि ] वस्तुओंके द्वारा आकाशमें परिच्छेदकी प्रतीति होना ॥ ६१ ॥ राजकुमार ! आप सूक्ष्म दृष्टिसे उस अपने स्वरूपका विचार कीजिये । उस सर्वसामान्य चैतन्य ( ज्ञान ) पर ही यह सारा जगत् खड़ा हुआ है ॥ ६२ ॥ उसके साथ अपने अभेदकी अनुभूति दृढ़ हो जानेपर जीव सर्व- कर्त्तृत्व ( परमेश्वरके साथ तन्मयत्व ) प्राप्त कर लेता है। मैं आपको उसकी उपलब्धिके स्थान बतलाती हूँ, जिनसे कि उस पदकी प्राप्ति हो सकती है ॥ ६३ ॥ निद्रा और जाग्रत् अवस्थाओंके मध्यमें, चित्तके एक विषयको छोड़कर दूसरे विषयपर जानेके बीचकी स्थितिमें और दो प्रकारकी बुद्धिवृत्तियोंके बीचमें आप सूक्ष्म बुद्धिसे उसका अनुभव कीजिये ॥६४॥ यह पद ही अपना वास्तविक स्वरूप है, जिसे पा लेनेपर जीव मोहमें नहीं पड़ता। इसके अज्ञान-मात्रसे ही यह सारा जगत्‌का पसारा फैला हुआ है ॥ ६५ ॥ इस आत्मस्वरूपमें न रूप है, न रस है और न गंध, स्पर्श या शब्द हैं । इसमें दुःख-सुख तथा ग्राह्य ( विषय ) और ग्राहक ( इन्द्रियाँ ) भी नहीं हैं ॥ ६६ ॥