त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदशमोऽध्यायः अथाऽपश्यद्धेमलेखा प्रियं प्राप्तपरस्थितिम् । न चालयत्परपदात्ततः सोपि मुहूर्तः ॥ १ ॥ प्रबुद्ध उन्मील्य नेत्रे सोऽपश्यत्सप्रियं जगत् । भूयस्तत्पदविश्रान्तिमीहमानोऽतिवेगतः ॥ २ ॥ नेत्रे निमीलयद्यावद्ब्रवीत्तावदेव सा । प्रियं हस्ते समादाय सुधासुन्दरभाषिणी ॥ ३ ॥ नाथ किं ते व्यवसितं ब्रूहि नेत्रनिमीलनात् । उन्मीलनाद्वा किं स्यात्ते लाभालाभौ समीरय ॥ ४ ॥ उन्मील्य न प्राप्यते किं निमील्य प्राप्यते च किम् । तन्मे ब्रूहि प्रियतम श्रोतुमिच्छामि ते स्थितिम् ॥ ५ ॥ दशम अध्याय ॥ १० ॥ सभी तत्त्वज्ञ हो गये अब हेमलेखाने देखा कि उसके पतिको परमात्मामें स्थिति प्राप्त हो गयी है। तब उसने भी कुछ देर उसे उस परमपदसे विचलित नहीं किया ॥ १ ॥ फिर उसने सावधान होकर नेत्र खोले और अपनी प्रियाके सहित इस संसारको देखा। किन्तु ज्योंही वह पुनः नेत्र मूँदकर बड़ी तेजीसे उसी पदमें विश्रान्त होनेकी चेष्टा करने लगा, हेमलेखाने उसका हाथ पकड़कर अमृतके समान मधुर भाषण करते हुए उससे कहा ॥ २-३ ॥ “नाथ ! बतलाइये, आपका क्या विचार है ? कहिये न, इस प्रकार नेत्र मूँदने या खोलनेसे आपको क्या लाभ या हानि होती है ॥ ४ ॥ प्रियतम ! मैं आपकी स्थितिके विषयमें सुनना चाहती हूँ। नेत्र खोलनेसे आपको क्या नहीं मिलता और मूँद लेनेसे क्या मिल जाता है—यह मुझे बतलाइये” ॥ ५ ॥