त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदशमोऽध्यायः । १३३ एवं पृष्टस्तया प्राह मदमत्त इवालसः । अनिच्छन्नपि वक्तुं तामालस्यभरमन्थरः ॥ ६ ॥ प्रिये विश्रान्तिमत्यन्तं प्राप्तवानस्मि वै चिरात् । न बाह्ये दुःखभूयिष्ठे विश्रमोऽस्ति क्वचिन्मम ॥ ७ ॥ अलं ऋजीषरोमन्थप्रायव्यवहृतैर्बहिः । दौर्भाग्यान्धो नाद्य यावदविदं स्वात्मसत्सुखम् ॥ ८ ॥ यथा कश्चिदटन्भिक्षां निधानं स्वं न वेद वै । तथाहं स्वसुखाम्भोधिमविदित्वा पुनः पुनः ॥ ९ ॥ सुखं वैषयिकं श्रेष्ठं दुःखसंघाभिसंप्लुतम् । विद्युद्विलयनं मत्वा स्थिरं तत्परतावशात् ॥ १० ॥ दुःखैरभिहतो नूनं विश्रान्तिं न तु लब्धवान् । अहो जना दुःखसुखविवेकज्ञानवर्जिताः ॥ ११ ॥ हेमचूडका चित्त इस समय आलस्यके भारसे कुछ मन्दगति हो रहा था। अतः हेमलताके इस प्रकार प्रश्न करनेपर उसने बोलनेकी इच्छा न होने पर भी मदमत्तके समान आलस्यपूर्वक उससे कहा-॥६॥ "प्रिये ! मुझे आज बहुत काल पश्चात् बड़ी शान्ति प्राप्त हुई है। अब इस दुःखबहुल बाह्य प्रपञ्चमें मुझे कहीं विश्राम नहीं मिल सकता ॥ ७॥ ये बाह्य व्यवहार तो गन्नेकी छूँछ चूसनेके समान नीरस हैं, इनकी मुझे आवश्यकता नहीं है। मैं तो दुर्भाग्यवश अन्धा हो रहा था, इसीसे अबतक आत्मस्थितिके इस सच्चे सुखकी अनुभूति नहीं कर सका ॥ ८॥ जिस प्रकार कोई पुरुष अपने घरके खजानेको न जाने और भिक्षा माँगता फिरे, उसी प्रकार मैं इस आत्मानन्दरूप समुद्रको न जानकर बार-बार दुःखसमूहसे भरे वैषयिक सुखको ही, जो बिजलीके समान लीन हो जानेवाला है, श्रेष्ठ और स्थिर समझता रहा। और उसीके पीछे लगे रहनेके कारण दुःखोंसे दबा रहकर आजतक विश्राम नहीं पा सका ॥ ९-११ पू० ॥ अहो ! सबलोग दुःख-सुखके विवेकज्ञानसे रहित होनेके कारण,