त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे सुखार्थिनो दुःखसंघं सञ्चिन्वन्ति मुधा सदा । तदलं दुःखभोगेन स्वयत्नासादितेन वै ॥ १२ ॥ प्रिये कृपां मयि कुरु प्रार्थयामि कृताञ्जलिः । विश्रान्तिमभिवाञ्छामि चिरं स्वस्मिन्सुखात्मनि ॥ १३ ॥ अहो दैवहता भासि ज्ञात्वापि त्वमिदं पदम् । तद्विश्रान्तिं परित्यज्य मुधा दुःखाय चेष्टसे ॥ १४ ॥ इत्युक्ता सा प्रियं प्राह स्मयित्वेपन्मनीषिणी । नाथ ते तन्न विदितं पदं परमपावनम् ॥ १५ ॥ यत्र स्थिता न मुह्यन्ति पण्डिताः पावनाशयाः । तत्पदं दूरतस्तेस्ति भूस्थस्येव नभस्तलम् ॥ १६ ॥ त्वया किञ्चित्सुविदितं भवेदविदितोपमम् । निमील्योन्मील्य वा नेत्रे तत्पदं न समीक्ष्यते ॥ १७ ॥ सुखकी लालसा रहनेपर भी, व्यर्थ ही सर्वदा दुःखराशिका ही संग्रह करते रहते हैं। अतः अपने ही प्रयत्नसे प्राप्त किये हुए दुःखभोगकी अब मुझे आवश्यकता नहीं है ॥ ११ उ०-१२ ॥ प्रिये ! मैं हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूँ, तुम मुझपर कृपा करो। अब तो मैं अपने इस आनन्दस्वरूप आत्मामें ही चिरकालतक विश्रान्त रहना चाहता हूँ ॥ १३ ॥ अहो ! मुझे तुम बड़ी अभागिनी जान पड़ती हो, जो इस पदको जानकर भी तुम इसकी विश्रान्तिको छोड़कर व्यर्थ ही दुःख भोगनेके लिये व्यवहारमें लगी रहती हो” ॥ १४ ॥ इस प्रकार कहे जानेपर वह विवेकवती बाला कुछ मुसकराकर अपने प्रियतमसे बोली, “नाथ ! अभी आपको उस परम पवित्र पदका पता नहीं लगा है ॥ १५ ॥ पवित्र हृदय पण्डितजन जिसमें स्थित होकर कभी मोहग्रस्त नहीं होते वह पद तो अभी आपके लिये वैसे ही दूर है जैसे पृथ्वीपरके मनुष्यके लिये आकाश ॥ १६ ॥ आपने जो कुछ ठीक-ठीक समझा है वह तो न समझनेके समान ही है। वह पद आँखोंको मूँदने या खोलनेसे नहीं देखा जाता ॥ १७ ॥