त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदशमोऽध्यायः । १३७ प्रतिबिम्बो निरादर्शो यथा नाथ तथैव तत् । तस्मात्तत्पदसंत्यागान्नास्ति कुत्रापि किंचन ॥ ३१ ॥ तत्ते नेत्रोन्मीलनेन किमन्तरितमियात् । यावदेवं विजानामीत्येवं ग्रन्थिर्दृढा भवेत् ॥ ३२ ॥ तावन्न तत्पदं प्राप्तं यत्प्राप्तं स्यान्न तद्भवेत् । निमील्योन्मील्य वा नेत्रे यत्प्राप्तं मन्यसे पदम् ॥ ३३ ॥ तन्न पूर्णपदं यस्मात्परिच्छेदान्क्रियादितः । कुत्र नाथ महासंवित्नास्ति कालानलप्रभा ॥ ३४ ॥ स्वात्मीकरोति यानल्पकल्पनेन्धनसंचयम् । न ते कर्त्तव्यशेषो विज्ञाय परमं पदम् ॥ ३५ ॥ हे नाथ ! जिस प्रकार दर्पणके बिना प्रतिबिम्ब नहीं हो सकता उसी प्रकार [ आत्म-संवित्के बिना ] वे भी अलीक हैं। अतः उस पदके न रहनेपर तो कहीं कुछ भी नहीं रहता। ऐसी अवस्थामें आपके नेत्र खोलनेसे उसमें क्या अन्तर आ सकता है ॥ ३१-३२ पू० ॥ जबतक यह ग्रन्थि दृढ़ बनी हुई है कि मैं इस प्रकार ( साधन- विशेषके द्वारा ) उसे जानता हूँ, तब तक उस पदकी प्राप्ति नहीं हुई; क्योंकि जो [ किसी प्रयत्नके द्वारा ] प्राप्त होता है वह वह पद नहीं होता ॥ ३२ उ०-३३ पू० ॥ जिस पदको आप नेत्रोंके मूँदने या खोलनेसे प्राप्त हुआ समझते हैं वह पूर्णपद नहीं हो सकता, क्योंकि उसका तो क्रियाविशेषसे परिच्छेद हो जाता है ॥ ३३ उ०-३४ पू० ॥ नाथ ! वह कालाग्निके समान सर्वग्रासिनी महासंवित् भला, कहाँ नहीं है; जो इस तुच्छ कल्पनारूप ईंधनकी ढेरीको अपनेमें लीन कर लेती है? ॥ ३४ उ०-३५ पू० ॥ उस परम पदको जान लेनेपर अब आपको कुछ भी करना शेष नहीं है। 'मैं चित्तका निरोध करके उस हृदयस्थित आत्मतत्त्वका साक्षा- १. अर्थात् जब वह उदित होती है तो सब तद्रूप ही भासता है। उससे भिन्न किसी भी देश, काल या वस्तुकी सत्ता नहीं रहती।