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त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

दशमोऽध्यायः । १३७ प्रतिबिम्बो निरादर्शो यथा नाथ तथैव तत् । तस्मात्तत्पदसंत्यागान्नास्ति कुत्रापि किंचन ॥ ३१ ॥ तत्ते नेत्रोन्मीलनेन किमन्तरितमियात् । यावदेवं विजानामीत्येवं ग्रन्थिर्दृढा भवेत् ॥ ३२ ॥ तावन्न तत्पदं प्राप्तं यत्प्राप्तं स्यान्न तद्भवेत् । निमील्योन्मील्य वा नेत्रे यत्प्राप्तं मन्यसे पदम् ॥ ३३ ॥ तन्न पूर्णपदं यस्मात्परिच्छेदान्क्रियादितः । कुत्र नाथ महासंवित्नास्ति कालानलप्रभा ॥ ३४ ॥ स्वात्मीकरोति यानल्पकल्पनेन्धनसंचयम् । न ते कर्त्तव्यशेषो विज्ञाय परमं पदम् ॥ ३५ ॥ हे नाथ ! जिस प्रकार दर्पणके बिना प्रतिबिम्ब नहीं हो सकता उसी प्रकार [ आत्म-संवित्‌के बिना ] वे भी अलीक हैं। अतः उस पदके न रहनेपर तो कहीं कुछ भी नहीं रहता। ऐसी अवस्थामें आपके नेत्र खोलनेसे उसमें क्या अन्तर आ सकता है ॥ ३१-३२ पू० ॥ जबतक यह ग्रन्थि दृढ़ बनी हुई है कि मैं इस प्रकार ( साधन- विशेषके द्वारा ) उसे जानता हूँ, तब तक उस पदकी प्राप्ति नहीं हुई; क्योंकि जो [ किसी प्रयत्नके द्वारा ] प्राप्त होता है वह वह पद नहीं होता ॥ ३२ उ०-३३ पू० ॥ जिस पदको आप नेत्रोंके मूँदने या खोलनेसे प्राप्त हुआ समझते हैं वह पूर्णपद नहीं हो सकता, क्योंकि उसका तो क्रियाविशेषसे परिच्छेद हो जाता है ॥ ३३ उ०-३४ पू० ॥ नाथ ! वह कालाग्निके समान सर्वग्रासिनी महासंवित् भला, कहाँ नहीं है; जो इस तुच्छ कल्पनारूप ईंधनकी ढेरीको अपनेमें लीन कर लेती है? ॥ ३४ उ०-३५ पू० ॥ उस परम पदको जान लेनेपर अब आपको कुछ भी करना शेष नहीं है। 'मैं चित्तका निरोध करके उस हृदयस्थित आत्मतत्त्वका साक्षा- १. अर्थात् जब वह उदित होती है तो सब तद्रूप ही भासता है। उससे भिन्न किसी भी देश, काल या वस्तुकी सत्ता नहीं रहती।

१३८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे त्यज ग्रन्थिं सन्निरुध्य पश्यामीति हृदि स्थिताम् । इदं नाहमिति ग्रन्थिमुन्मूल्य परां दृढाम् ॥ ३६ ॥ पश्य सर्वत्र चात्मानमखण्डानन्दबृंहितम् । पश्यात्मन्यखिलं लोकं दर्पणप्रतिबिम्बवत् ॥ ३७ ॥ सर्वत्राखिलमात्मानमिति भूयो न भावयन् । शेषमभ्युपगम्यान्तःस्वस्थो भव निजात्मना ॥ ३८ ॥ इति प्रियोदितं श्रुत्वा हेमचूडः सिताशयः । विदित्वा पूर्णमात्मानं सर्वत्र भ्रान्तिवर्जितः ॥ ३९ ॥ क्रमात्पूर्णसमावेशासादनात्स्थिरभावनः । विहरन्सर्वदा हेमलेखादियुवतीगणैः ॥ ४० ॥ शासन् राज्यं समृद्धं स्वं जित्वा शत्रुगणं रणे । शास्त्राणि श्रावयन् शृण्वन्नर्जयन्धनसंचयम् ॥ ४१ ॥ त्कार करूँ' इस ग्रन्थिको आप त्याग दीजिये । 'मैं यह नहीं हूँ' इस अत्यन्त दृढ ग्रन्थिको भी काट डालिये ॥ ३५ उ०-३६ ॥ सर्वत्र अखण्डानन्दपूर्ण आत्मतत्त्वका दर्शन कीजिये । सम्पूर्ण प्रपञ्चको दर्पणमें प्रतीत होनेवाले प्रतिबिम्बके समान अपने आत्मामें ही भासमान देखिये ॥ ३७ ॥ और फिर यह भावना भी मत कीजिये कि सर्वत्र केवल आत्मा ही है । इस प्रकार सम्पूर्ण भावनाओंके त्यागनेपर जो शेष रहे उसीको अपना स्वरूप जानकर अपने अकृत्रिम स्वरूपसे अभिन्न होकर स्थित रहिये' ॥ ३८ ॥ अपनी प्रियाका यह भाषण सुनकर हेमचूडका चित्त सर्वथा शुद्ध हो गया । आत्माको सर्वत्र पूर्ण जानकर उसकी सम्पूर्ण भ्रान्ति निवृत्त हो गयी [ अब उसे निरोध आदि किसी अवस्था विशेषका आग्रह नहीं रहा ] ॥ ३९ ॥ क्रमशः परमात्माके परिपूर्ण स्वरूपमें दृढ भावना होनेसे उसकी स्थिर स्थिति हो गयी । अब वह सर्वदा हेमलेखा आदि युवतियोंके साथ विहार करते हुए, शत्रुसमूहको युद्धमें जीतकर ऐश्वर्यसम्पन्न राज्यका शासन करते हुए, शास्त्र श्रवण करने और कराने हुए तथा धनसंचय करके

दशमोऽध्यायः । १३६ अश्वमेधराजसूयाद्यैर्यजन्क्रतुमुरुयकैः । वर्षाणामयुते द्वे वै जीवन्मुक्तो भुवि स्थितः ॥ ४२ ॥ जीवन्मुक्तदशासंस्थं निशाम्य तनयं नृपः । मुक्ताचूडश्च तद्‌भ्राता मणिचूडोऽप्यचिन्तयत् ॥ ४३ ॥ किमयं पूर्ववन्नेह लक्ष्यते सर्वथा किल । सुखे न हृष्यत्यत्यन्तं दुःखे नोद्विजते तथा ॥ ४४ ॥ लाभालाभौ शत्रुमित्रे साम्यात्पश्यति वै कुतः । करोति राजकार्याणि नटवद्रङ्गमण्डले ॥ ४५ ॥ कापिशायनपायीव सदा मत्तोऽभिलक्ष्यते । सदान्यत्र गतस्वान्त इव कृत्यङ्करोत्यलम् ॥ ४६ ॥ तत्केन हेतुना चेति तमासाद्य रहः क्वचित् । अपृच्छतां हेमचूडं कुत एवं भवानिति ॥ ४७ ॥ अश्वमेध और राजसूय आदि बड़े-बड़े यज्ञ करते हुए बीस हजार वर्षतक जीवन्मुक्त अवस्थामें इस पृथ्वीतलपर रहा ॥ ४०-४२ ॥ अपने पुत्रको जीवन्मुक्त अवस्थामें स्थित देखकर राजा मुक्ताचूड़ने और उसके भाई मणिचूड़ने भी विचार किया — ॥ ४३ ॥ ‘क्या कारण है अब यह हेमचूड़ पहलेकी तरह बिलकुल दिखायी नहीं देता । यह न तो सुखमें विशेष प्रसन्न होता है और न दुःखमें उदास होता है ॥ ४४ ॥ यह लाभ-हानि और शत्रु-मित्रोंको समान दृष्टिसे क्यों देखने लगा है । आजकल यह राज्यके सब कार्य रंगभूमिमें नाटकके पात्रके समान कर रहा है ॥ ४५ ॥ यह मद्यपायीके समान सर्वदा अपनेमें मस्त दिखायी देता है और सारे कार्य सदा इस प्रकार करता है मानो इसका चित्त कहीं अन्यत्र ही लगा हो ॥ ४६ ॥ यह सब किस कारणसे हुआ ?’ ऐसा सोचकर किसी दिन उन्होंने एकान्तमें हेमचूड़के पास जाकर पूछा, “तुम्हारी यह दशा कैसे हो गयी” ॥ ४७ ॥

१४० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे ततः स्वस्थितिमाचख्यौ हेमचूडस्तयोः क्रमात् । तावुभौ भ्रातृपितरौ हेमचूडेन बोधितौ ॥ ४८ ॥ आसादितपरतत्त्वौ जीवन्मुक्तौ बभूवतुः । अथ मन्त्रिगणोप्येवं राज्ञः श्रुत्वा जगद्गतिम् ॥ ४९ ॥ विचार्य स्वात्मनो भावं ज्ञातज्ञेयोऽभवत्तदा । एवं विशालनगरे क्रमेणैव परस्परम् ॥ ५० ॥ उपदेशाद्विदुः सर्वे तत्त्वमाबालगोपकाः । नरा नार्यो बालवृद्धा दासा दासीगणा अपि ॥ ५१ ॥ ज्ञातज्ञेयास्त्यक्तदेहाहम्भावा अभवन्खलु । न तत्र कस्यचित्कामः क्रोधो वा लोभ एव वा ॥ ५२ ॥ अनाहृतोऽस्ति बालस्य स्थविरस्यापि वा क्वचित् । आहृतक्रोधकामाद्यैर्व्यवहारपरायणाः ॥ ५३ ॥ बालं माता खेलयति परतत्त्वस्य वार्तया । दासा दास्यः स्वामिनं स्वं सदा परिचरन्ति वै ॥ ५४ ॥ तब हेमचूडने क्रमशः उन्हें अपनी सब स्थिति सुनायी और उसके बोध करानेसे वे पिता और चाचा दोनों ही परमतत्त्वकी उपलब्धि कर जीवन्मुक्त हो गये ॥ ४८-४९ पू० ॥ इसी प्रकार फिर मन्त्रियोंने भी राजासे जगत्का रहस्य सुनकर आत्माके स्वरूपका विचार किया और उन्होंने भी जो जानने योग्य था उसे जान लिया ॥ ४९ उ०-५० पू० ॥ इस प्रकार उस विशाल नगरमें बालक और ग्वाले तक सभी क्रमशः एक-दूसरेसे उपदेश लेकर परमतत्त्वको जान गये ॥५० उ०-५१ पू० ॥ नर-नारी, बालक-वृद्ध और दास-दासी भी ज्ञात-ज्ञेय होकर देहमें अहंबुद्धिसे रहित हो गये। वहाँ बालक या वृद्ध किसीके भी काम, क्रोध या लोभ निवृत्त हुए बिना नहीं रहे। सब लोग काम-क्रोधादिको संयत रखकर ही व्यवहारमें तत्पर रहते थे ॥ ५१ उ०-५३ ॥ माताएँ परमतत्त्वकी चर्चा करके ही बच्चोंको खिलाती थीं। दास और दासियाँ सर्वदा आपसमें परमतत्त्व-विषयक वाक्योंका व्यवहार

परतत्त्वपरैर्वाक्यैर्व्याहरन्तः परस्परम् । नटा नाट्यं वितन्वन्ति पात्रैस्तत्त्वप्रसङ्गजैः ॥ ५५ ॥ विवेकवार्तापरमं वचो गायन्ति गायकाः । विदूषका दूषयन्ति लोकव्यवहृतिं सदा ॥ ५६ ॥ शास्त्राणि पाठयन्ति स्म विद्वांसः पाठकान् जनान् । परतत्त्वविचारार्हेरुदाहरणमण्डलैः ॥ ५७ ॥ एवं तत्र नरा नार्यो दासा दास्यो नटा विटाः । भृत्या भटा मन्त्रिणश्च शिल्पिनो वारयोषितः ॥ ५८ ॥ सर्वे वेदितवेद्यास्ते विशालनगरेऽभवन् । प्राक्तसंस्कारबलेनैव व्यवहारपरायणताः ॥ ५९ ॥ न संस्मरति संवृत्तं शुभं वाप्यशुभं तथा । भविष्यं नानुसन्धत्ते हर्षशोकादिसाधनम् ॥ ६० ॥ वर्तमाने स्मयन्हृष्यन्खिद्यन् क्रुध्यन्निवान्वहम् ।

करते हुए ही अपने स्वामीकी सेवा करते थे। तथा नट लोग तत्त्व- प्रसंगसम्बन्धी [ विवेक-मोह आदि ] पात्रोंके द्वारा ही नाटक खेलते थे ॥ ५४-५५ ॥ गानेवाले विवेककी चर्चासे भरी वाणियोंका ही गान करते थे तथा विदूषक लोग सर्वदा लौकिक व्यवहारका उपहास करते थे ॥ ५६ ॥ विद्वान् लोग विद्यार्थियोंको परमतत्त्वके विचारका पोषण करने- वाले उदाहरणोंसे पूर्ण शास्त्रोंका अध्ययन कराते थे ॥ ५७ ॥ इस प्रकार उस विशाल नगरमें नर, नारी, दास, दासी, नट, विदूषक, सेवक, सिपाही, मन्त्री, कारीगर, और वेश्याएँ सभी जानने योग्य परमतत्त्वको जान गये ॥ ५८-५९ पू० ॥ अपने पूर्वसंस्कारोंके अनुसार व्यवहार करते हुए भी उन्हें अपनी क्रियाओंमें शुभ या अशुभ का अनुसन्धान नहीं होता था। [ उनकी सब चेष्टाएँ बच्चोंके समान स्वभावसे ही होती थीं ] ॥ ५९ उ०-६० पू० ॥ जिसके कारण हर्ष या शोकादिकी कल्पनाएँ होती हैं उस भविष्य- का वे कभी चिन्तन नहीं करते थे। वर्तमानमें प्रसंगवश मुसकराते,

१४२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे मधुक्षीव इवात्यन्तं व्यवहारपरो जनः ॥ ६१ ॥ एवंविधं तन्नगरं ऋषयः सनकादयः । प्रसिद्धविद्यानगरमित्याख्यमृचुरागताः ॥ ६२ ॥ यत्र कीराः पञ्जरस्था अपि वाचो वदन्ति वै । चितिरूपं स्वमात्मानं भजध्वं चेत्यवर्जितम् ॥ ६३ ॥ नास्ति चेत्यं चितेरन्यद्दर्पणप्रतिबिम्बवत् । चितिश्चेत्यं चितिरहं चितिः सर्वं चराचरम् ॥ ६४ ॥ यतः सर्वं चितिमनु भाति सा तु स्वतन्त्रतः । अतश्चितिं जनाः सर्वभासिनीं सर्वसंश्रयाम् ॥ ६५ ॥ भजध्वं भ्रान्तिमुत्सृज्य चितिमात्रं सुदृष्टयः । तिर्यञ्चोप्येवमत्यन्तं यत्र वाचो वदन्ति वै ॥ ६६ ॥ प्रसिद्धविद्यानगरं तदद्यापि प्रचक्षते । हर्षित होते, खिन्न होते और क्रोध-सा करते हुए भी वे मद्योन्मत्तके समान निरन्तर अत्यन्त व्यवहारपरायण रहते थे ॥ ६० उ०-६१ ॥ इस प्रकारके उस नगरमें एकबार सनकादि ऋषि आये । उन्होंने उसका 'विद्यानगर' नाम रख दिया¹ ॥ ६२ ॥ वहाँ पिंजरोंमें बन्द तोते भी इन वाणियोंका पाठ करते थे— “चेत्य पदार्थोंसे रहित जो चिन्मात्र अपना आत्मा है उसका भजन करो ॥ ६३ ॥ दर्पणमें प्रतिबिम्बके समान चेत्य पदार्थ चिन्मात्रसे भिन्न नहीं है । चिति (चिन्मात्र) ही चेत्य है, चिति ही 'मैं' हूँ और चिति ही सारा चराचर, क्यों इन सबका भान चितिसे ही होता है और चिति स्वयंप्रकाश है ॥ ६४-६५ पू० ॥ इसलिये हे लोगो ! भ्रान्तिको त्यागकर केवल चितिपर ही दृष्टि रखते हुए सबको प्रकाशित करनेवाली और सभीकी आश्रयभूता चितिका ही भजन करो” ॥ ६५ उ०-६६ पू० ॥ जहाँ पक्षी भी सर्वथा ऐसी वाणी बोलते हैं वह सुप्रसिद्ध विद्या- नगर आज भी देखा जाता है ॥ ६६ उ०-६७ पू० ॥ १. आगेके चार श्लोक चतुर्थ अध्यायके अन्तमें भी आ चुके हैं ।

दशमोऽध्यायः । १४३ एवं तत्र पुरा हेमलेखया खलु बोधितः ॥ ६७ ॥ हेमचूड़ोऽभवद्विद्वान्जीवन्मुक्तस्तथेतेरे । स्त्रीबालप्रमुखाः सर्वे जाता ज्ञातपरावराः ॥ ६८ ॥ तस्माच्छ्रेयोनिदानं तु सत्सङ्गः प्रथमं भवेत् । तस्माच्छ्रेयोवाञ्छने तु सत्संश्रयपरो भवेत् ॥ ६९ ॥ इति श्रीमज्ज्ञानखण्डे हेमचूड़ोपाख्याने दशमोऽध्यायः । इस प्रकार पूर्वकालमें वहाँ हेमलेखाके द्वारा ज्ञान प्राप्त करनेवाला हेमचूड नामका तत्त्ववेत्ता और जीवन्मुक्त राजा हुआ। उसके पश्चात् स्त्री और बालक पर्यन्त अन्य सब लोग भी परमतत्त्वको जान गये ॥ ६७ उ०-६८ ॥ इसलिये कल्याणका सबसे पहला साधन सत्संग है। इसलिये जिसे निःश्रेयसकी इच्छा हो उसे सन्तोंके सहवासमें रहना चाहिये ॥ ६६ ॥ दशम अध्याय समाप्त ।

एकादशोऽध्यायः श्रुत्वैवं हेमचूडस्य कथामत्यद्भुतां तदा । भार्गवः सन्दिग्धमनाः प्रष्टुं समुपचक्रमे ॥ १ ॥ भगवन् श्रीगुरो यत्ते प्रोक्तं ज्ञानं महाद्भुतम् । भाति मे विषमं ह्येतदसाध्यं चापि सर्वतः ॥ २ ॥ कथमेतज्जगद् दृश्यं चितिमात्रस्वरूपकम् । अदृष्टं केवलं ह्येतच्छ्रद्धोपेयं न चान्यथा ॥ ३ ॥ चितिश्चेत्यविनिर्मुक्ता नानुभाव्या कथंचन । नोपपन्नं सर्वथैतत्कथं चित्तं समारुहेत् ॥ ४ ॥ कृपया बोधनीयोऽहमत्र सर्वात्मना खलु । इत्यापृष्टो दत्तगुरुरवदद्भार्गवं प्रति ॥ ५ ॥ एकादश अध्याय ॥ ११ ॥ जगत्‌के स्वरूपका विवेचन इसप्रकार हेमचूडकी यह अद्भुत कथा सुनकर परशुरामजीके मनमें कुछ सन्देह हुआ और वे पूछने लगे— ॥ १ ॥ “भगवन् ! गुरुदेव ! आपने जो बड़ा ही विचित्र तत्त्वज्ञान कहा है, वह मुझे तो सब प्रकार बड़ा कठिन और असाध्य जान पड़ता है ॥ २ ॥ यह दृश्य जगत् केवल चिन्मात्रस्वरूप कैसे हो सकता है ? यह बात प्रत्यक्ष देखनेमें तो नहीं आती; हाँ, श्रद्धासे मानी जा सकती है, और किसी प्रकार नहीं ॥ ३ ॥ चेत्यसे भिन्न चिति तो किसी प्रकार अनुभवमें भी नहीं आ सकती । यह बात किसी प्रकार युक्तिसंगत नहीं है, फिर यह चित्तमें कैसे बैठे ? ॥ ४ ॥ यह विषय कृपा करके मुझे सब प्रकार समझा दीजिये।” इस प्रकार पूछे जानेपर गुरु दत्तात्रेयजी परशुरामसे बोले— ॥ ५ ॥

एकादशोऽध्यायः । १४५ शृणु राम प्रवक्ष्यामि दृश्यतत्त्वं यथास्थितम् । एतद् दृश्यमशेषं तु दृशिमात्रं न चेतरत् ॥ ६ ॥ अत्रोपपत्तिं वक्ष्यामि शृणु सम्यक्समाहितः । एतद् दृश्यं कार्यभूतमुत्पत्तेरुपलम्भतः ॥ ७ ॥ उत्पत्तिर्नूतनाभासः प्रतिक्षणमिदं जगत् । नूतनत्वेनैव भाति तत्क्षणोत्पत्तिमज्जगत् ॥ ८ ॥ केचित्प्राहुर्जगदिदमखण्डैकक्षणोद्भवम् । अन्ये पदार्थसंघातमयं स्थिरचरात्मकम् ॥ ९ ॥ सर्वथा तु समुत्पत्तिमदित्येव सुनिश्चितम् । तत्र स्वभाववादस्तु नोचितोऽतिप्रसङ्गतः ॥ १० ॥ परशुराम ! सुन, मैं तुम्हें यथार्थ रीतिसे इस दृश्यका रहस्य बतलाता हूँ । यह सारा दृश्य दृङ्मात्र है, और कुछ नहीं ॥ ६ ॥ इसमें मैं तुम्हें युक्ति भी बताता हूँ, खूब सावधान होकर सुनो । यह दृश्य किसीका कार्य है, क्योंकि इसकी उत्पत्ति देखी जाती है ॥ ७ ॥ उत्पत्ति कहते हैं नवीनरूपसे प्रतीत होने को । यह जगत् प्रत्येक- क्षणमें नवीन रूपसे ही भासता है; इसलिये यह क्षण-क्षणमें उत्पन्न होनेवाला हुआ ॥ ८ ॥ कोई ( विज्ञानवादी ) तो इस जगत्को क्षण-क्षणमें उत्पन्न होने वाला किन्तु अखण्डपरम्परा-युक्त मानते हैं। और कोई ( न्याय-वैशे- षिक मतावलम्बी ) इसे आकाशादि स्थिर ( नित्य ) और घटादि चर ( अनित्य ) पदार्थोंका समूह बतलाते हैं ॥ ९ ॥ किन्तु सभी दृष्टियोंसे यह तो निश्चित है कि यह उत्पन्न होने- वाला ही है। उत्पत्तिमें स्वभाववाद¹ माना नहीं जा सकता, क्योंकि ऐसी स्थितिमें उत्पत्तिका कोई नियम नहीं रह सकेगा² ॥ १० ॥ १. बिना उपादान कारणके स्वतः उत्पन्न हो जाना । २. उत्पत्तिका यह नियम देखा जाता है कि एक विशेष उपादानसे किसी विशे कार्यकी ही उत्पत्ति होती है । यदि ऐसा न हो तो मिट्टीसे घड़ा और तन्तुओंसे वस्त्र ही क्यों उत्पन्न होता है ।

१४६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अन्वयव्यतिरेकाभ्यां कार्यकारणनिश्चयात् । संवादतः प्रवृत्तीनां कथमाकस्मिकं भवेत् ॥ ११ ॥ क्वचित्तु कारणेऽदृष्टेऽप्यदृष्टं कल्प्यमेव तत् । बहूनामनुरोधो हि न्याय्यः सर्वैरुदाहृतः ॥ १२ ॥ भूयो दृष्टं सपूर्वं हि कार्यं क्वचिददर्शने । दृष्टवत्परिकल्प्यं स्यादन्यथा सार्वलौकिकी ॥ १३ ॥ सम्प्रवृत्तिर्विरुध्येत तस्मात्सर्वं सकारणम् । अत एव कार्यहेतोः किंचित्कारणतत्परः ॥ १४ ॥ सर्वत्र दृश्यते लोकस्तस्मादेतन्न किंचन । केचिदाहुरसत्कल्पैरणुभिः कार्यमुद्यतम् ॥ १५ ॥ तेभ्योऽत्यन्तं विभिन्नं चाप्यसदत्यन्ततो भवेत् । [ कार्यमें कारणकी सत्ता रहती है, कारणके बिना कार्य होता ही नहीं ] इस अन्वय-व्यतिरेकके द्वारा भी कार्य-कारण भावका निश्चय होता ही है। इस नियममें कभी कोई अन्तर भी नहीं पड़ता। ऐसी स्थितिमें यह आकस्मिक ( अनियत ) कैसे हो सकता है ॥ ११ ॥ कहीं-कहीं कारण देखनेमें नहीं आता, वहाँ अदृष्ट कारणका अनुमान कर लेना चाहिये, क्योंकि जो बहुमत होता है उसे स्वीकार करना सभीने न्यायानुुकूल माना है ॥ १२ ॥ अधिकांश वस्तुएँ तो कारणपूर्वक ही देखी जाती हैं। इसलिये यदि कहीं कारण दिखायी न दे तो अन्यत्र देखे हुए कारणोंकी तरह वहाँ भी कारणकी कल्पना कर लेनी चाहिये। नहीं तो जो प्रवृत्ति सर्वत्र देखी जाती है उससे विरोध होगा। इसलिये सब पदार्थ कारणपूर्वक ही हैं ॥ १३-१४ पू० ॥ इसीलिये जब कोई कार्य करना होता है तो सभी जगह लोग उसकी साधनसामग्री जुटानेमें तत्पर देखे जाते हैं। अतः यह स्वभाव- वाद [ कि संसार बिना कारणके स्वयं उत्पन्न हो गया ] कुछ भी नहीं है ॥ १४ उ०-१५ पू० ॥ कोई ( परमाणुवादी नैयायिक ) कहते हैं कि यह कार्यरूप जगत् असत्तुल्य ( अव्यक्त एवं जड ) परमाणुओंसे बना है। किन्तु यह [ व्यक्त और सद्रूप होनेके कारण ] उनसे अत्यन्त भिन्न है। तथापि

एकादशोऽध्यायः। १४७ असत्सतोरेकता हि विरुद्धा न कुतो भवेत् ॥ १६ ॥ न हिपीतमपीतं च प्रकाशं चाप्रकाशकम् । एकं भवेद्विरुद्धत्वात्साङ्कर्यादिप्रसक्तितः ॥ १७ ॥ ईश्वरेच्छादितो वापि कथमादिक्रियोद्भवः । गुणसाम्यप्रकृतिकं जगदित्यप्यसंभवि ॥ १८ ॥ वैषम्यहेतोर्मृग्यत्वात्साम्यहेतोश्च हीनतः । चेतनेनानधिष्ठानाद् दृष्टान्तानुपलम्भतः ॥ १९ ॥ अन्तमें यह भी असत् हो जाता है । परन्तु इस सिद्धान्तमें जो असत् और सत् की अभिन्नता बतायी गयी है वह विरुद्ध क्यों नहीं है ? ॥ १५ उ० १६ ॥ पीत और अपीत या प्रकाश और अप्रकाश एक कभी नहीं हो सकते, क्योंकि इनका परस्पर विरोध है और ऐसा माननेसे संकरादि¹ दोषोंका भी प्रसंग होगा ॥ १७ ॥ [यदि कहें कि ईश्वरकी इच्छासे परमाणुओं में गति उत्पन्न हो जाती है, तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि ] ईश्वरकी इच्छासे भी आरम्भमें जड परमाणुओंमें क्रिया की उत्पत्ति कैसे हो सकती है ? [ इस प्रकार परमाणुवादका निराकरण कर अब सांख्योक्त प्रकृतिकारण- वादका खण्डन करते हैं—] गुणोंकी साम्यावस्थारूप प्रकृते जगत्का भाव है—यह बात भी सम्भव नहीं है ॥ १८ ॥ इसके लिये सृष्टिके आरम्भमें जोप्रकृतिके गुणोंमें विषमता होती है उसका कारण ढूँढ़ना होगा और प्रलयमें जो उनकी पुनः समता होती है उसका भी कोई हेतु नहीं जान पड़ता । [ यदि कहो कि ईश्वरकी इच्छासे ऐसा होता है तो ] सांख्यवादी प्रकृतिको किसी चेतनसे अधिष्ठित मानते नहीं हैं । और ऐसा कोई दृष्टान्त नहीं मिलता कि चेतनाके बिना ही किसी जडमें क्रिया उत्पन्न हो जाय ॥ १९ ॥ १. एक ही वस्तुमें दो विरुद्ध धर्मोंका आरोप करना 'संकर' दोष है। इसके सिवा नैयायिक परमाणुओंको निरवयव मानते हैं और निरवयव वस्तुओंका संयोग होना सम्भव नहीं है। यह 'अव्याप्यवृत्तित्वभंग' रूप दोष 'आदि' पदसे ग्रहण करना चाहिये।

१४८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तस्माज्जागतकार्यस्य कारणं नोपलभ्यते अदृष्टे तु श्रुतिर्मूलं नान्यमानसुसङ्गमः ॥ २० ॥ प्रमातॄणामपूर्णत्वात्प्रमाणस्यानवस्थितेः । कार्यकार्तृवियोगस्य भूयोऽदर्शनहेतुतः ॥ २१ ॥ सकर्तृकं जगदिदं सम्भवाच्चेतनो हि सः । कार्यस्याचिन्त्यरूपस्य कर्त्ता साधारणः कथम् ॥ २२ ॥ तस्मादचिन्त्यशक्तिः स आगमस्तद्विमर्शनम् । पूर्णस्य त्वप्रतिहतं प्रमाणं सर्वतोधिकम् ॥ २३ ॥ तत्रैकस्तु महेशानः पुरा सृष्टेरुदाहृतः । स्वतन्त्रो ह्यनुपादानः स्वातन्त्र्यभरवैभवात् ॥ २४ ॥ इस प्रकार जगत् रूप कार्यका कोई भी दृष्ट कारण तो मिलता नहीं है। और अदृष्ट कारणका निर्णय करनेमें श्रुति ही मूल प्रमाण है, उससे भिन्न कोई और प्रमाण माननीय नहीं हो सकता ॥ २० ॥ क्योंकि प्रमाता जीव तो अपूर्ण हैं तथा किसी प्रमाणकी उस ( परोक्ष कारण ) में गति नहीं है। और ऐसा कभी देखा नहीं जाता कि कर्ताके बिना ही कार्य हो गया हो। इसलिये यह जगत् किसी कर्ताकी ही रचना है। और सम्भव होनेके कारण वह कर्ता चेतन ही होना चाहिये। तथा यह जगत्-रूप कार्य बड़ा विलक्षण है, इसलिये इसका कर्ता भी साधारण कैसे हो सकता है ? ॥ २१-२२ ॥ अतएव वह अचिन्त्यशक्ति-सम्पन्न है और उसके तत्त्वको बत- लानेवाला उसीका व्यापार है आगम ( वेद )। अतः वही उस पूर्ण- तत्त्वको प्रकाशित करनेवाला सर्वथा अबाधित सबसे बड़ा प्रमाण है ॥ २३ ॥ उस आगममें कहा है कि सृष्टिसे पूर्व एकमात्र महेश्वर ही थे। उन परम स्वतन्त्र परमेश्वरमें बिना किसी अन्य सामग्रीके अपनी १. सृष्टिका कारण परोक्ष है, इसलिये उसमें किसी इन्द्रियकी गति न हो सकने के कारण वह प्रत्यक्ष प्रमाणका विषय नहीं हो सकता। और अनुमान प्रत्यक्ष- मूलक होता है, अतः प्रत्यक्षकी गति न होनेके कारण उसमें अनुमानकी भी गति नहीं है। इसी प्रकार किसी अन्य प्रमाण का भी वह विषय नहीं है।

एकादशोऽध्यायः। १४६ स्वात्मभित्तौ जगच्चित्रं विलासायावभासयत् । तथा स्वप्नमनोराज्ये कल्पितं स्वेन केवलम् ॥ २५ ॥ अहंत्वेनैव गृह्णाति देहं तद्वदयं जगत् । न ते रूपं यथा देहः स्वप्नव्यावृत्तिहेतुतः ॥ २६ ॥ तथास्य न जगद्देहो व्यावृत्तेः प्रलये ननु । देहादिव्यतिरिक्तस्त्वं यथा केवलचिन्मयः ॥ २७ ॥ एवं देवो जगच्छून्यचिदेकवपुरव्ययः । तेनेदं स्वात्मनि जगच्चित्रमुन्मीलितं ननु ॥ २८ ॥ कोन्मीलयेज्जगच्चित्रं स्वान्यस्य क्वाप्यसम्भवात् । ऋते चितिं कदाचिद्वा क्व किं भवितुमर्हति ॥ २९ ॥ यत्राभावश्चितेर्ब्रूयात्स देशो नैव सिध्यति । अभावश्च चितेः केन सिध्येदस्माच्चितिः परा ॥ ३० ॥ स्वतन्त्रताके उत्कर्ष की महिमासे ही केवल क्रीडाकौतुकके लिये अपने ही स्वरूपभूत पटपर इस जगत्-चित्रको भासित कर दिया ॥ २४-२५ पू० ॥ जिस प्रकार स्वप्नके मनोराज्यमें अपने ही द्वारा कल्पित देहको 'मैं' रूपसे ग्रहण कर लिया जाता है उसी प्रकार का यह जगत् है ॥ २५ उ०-२६ पू० ॥ किन्तु स्वप्नकी निवृत्ति होनेपर न रहनेके कारण जैसे यह देह वास्तवमें तुम्हारा स्वरूप नहीं है, उसी तरह प्रलयमें न रहनेके कारण यह जगत् भी परमेश्वरका शरीर नहीं है ॥ २६ उ०-२७ पू० ॥ जैसे तुम देहादिसे अतिरिक्त शुद्ध चिन्मात्र हो उसी प्रकार भगवान् भी जगत्‌से सर्वथा शून्य एकमात्र अविनाशी चित्स्वरूप ही हैं। उन्होंने अपने ही पर यह जगच्चित्र प्रकट कर लिया है ॥२७ उ०-२८॥ उनसे भिन्न और कोई कहीं है ही नहीं; अतः इस जगच्चित्रको और कहाँ प्रकट किया जाता ? उस चिन्मात्रके सिवा क्या कभी कोई कहीं हो सकता है ? ॥ २९ ॥ जहाँ चितिका अभाव बताया जायगा वह देश तो सिद्ध ही नहीं हो सकता, क्योंकि बिना चेतनके उस अभावकी सिद्धि किससे होगी। इसलिये चिति ही परतत्त्व है [ उसका निषेध नहीं हो सकता ] ॥३०॥

१५० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे महासत्ता जगद्ग्रासशीला पूर्णावभासते । समुद्रमन्तरा तोयं दिवानाथं विना प्रभाः ॥ ३१ ॥ यथा न सन्ति तद्वद् वै संविद्रूपं विना जगत् । तस्मादेष महादेवः शुद्धचैतन्यविग्रहः ॥ ३२ ॥ आसीत्सृष्टेः पुरा तस्मादुत्पन्नं तत्र संस्थितम् । तस्मिन्विलीयते चान्ते जगदेतच्चराचरम् ॥ ३३ ॥ इत्यागमप्रसिद्धोऽर्थस्तन्न विप्रतिपद्यते । अदृष्टार्थेषु संवादात्प्रमाणं ह्यागमो भवेत् ॥ ३४ ॥ दृश्यन्ते मणिमन्त्रादिसिद्धयः सर्वतो यतः । नाल्पप्रज्ञो विजानीयान्मणिमन्त्रमहाफलम् ॥ ३५ ॥ तस्मात्सर्वज्ञगदितो ह्यागमः सर्वदर्शनः । तत्रोक्तो देव एवादौ सृष्टेर्जगत आस्थितः ॥ ३६ ॥ इस प्रकार सम्पूर्ण जगत्को अपनेमें लीन कर लेनेवाली वह महा- सत्ता ही पूर्णरूपसे प्रकाशमान है । जिस प्रकार समुद्रके बिना तरंग और सूर्यके बिना प्रभाकी सत्ता नहीं है उसी प्रकार उस चिन्मात्र के { बिना संसार नहीं है ॥ ३१-३२ पू० ॥ अतः सृष्टिसे पहले यह शुद्धचैतन्यस्वरूप महेश्वर ही थे । यह चरा- चर जगत् उन्हींसे उत्पन्न हुआ है, उन्हींमें स्थित है और अन्तमें उन्हींमें लीन होता है ॥ ३२ उ०-३३ ॥ यही श्रुतिसम्मत सिद्धान्त है, इसमें किसी प्रकारका सन्देह नहीं हो सकता, क्योंकि जहाँ अदृष्ट पदार्थके विषयमें शंका होती है वहाँ श्रुति ही प्रमाण मानी जाती है ॥ ३४ ॥ [ देखो, शास्त्रद्वारा प्रतिपादित होनेके कारण ही ] सर्वत्र मणि और मन्त्रादिसे प्राप्त होने वाली सिद्धियाँ देखी जाती हैं। इन मणि-मन्त्रा- दिके महान् प्रभावको कोई अल्पबुद्धि जीव नहीं जान सकता ॥ ३५ ॥ इसलिये सर्वज्ञ परमेश्वरके द्वारा कहा हुआ वेद ही सबसे बड़ा प्रमाण है । उसमें कहा है कि जगत्की रचनासे पूर्व एक परमात्मा ही था ॥ ३६ ॥

एकादशोऽध्यायः । १५१ निरुपादान एत्रादौ सृष्टवानखिलं जगत् । यस्मान्महेश्वरः पूर्णस्वच्छस्वातन्त्र्यसंयुतः ॥ ३७ ॥ चिदात्मभित्तावखिलं चित्रमुन्मीलयज्जगत् । न तज्जगत्सम्भवति बहिः क्वचिदवस्थितम् ॥ ३८ ॥ पूर्णत्वाद्दीश्वरस्येह स्थानमन्यन्न विद्यते । अन्यस्थानस्थितं तच्च कथञ्चिन्नैव सिध्यति ॥ ३९ ॥ तथा च दर्पणाभोगे प्रतिबिम्बवदेव हि । जगदुन्मीलितं देवे चैवं सर्वं समञ्जसम् ॥ ४० ॥ जगदादेर्हि देवस्य योगीव जगतः क्रिया । सङ्कल्पनगरप्रख्या सृष्टिर्देवस्य सम्मता ॥ ४१ ॥ राम ते मानसी सृष्टिर्मनोमध्यैव केवला । अनेकमातृमेयादिप्रचुरा ह्यवभासते ॥ ४२ ॥ उसने बिना किसी अन्य सामग्रीके आरम्भमें जगत्की रचना की, क्योंकि वह महेश्वर पूर्ण, शुद्ध और स्वातन्त्र्यशक्तिसे सम्पन्न है ॥३७॥ उसने अपने ही चैतन्यस्वरूप भीतपर यह जगत्-रूप चित्र प्रकट किया। वह जगत् उससे बाहर कहीं अन्यत्र नहीं हो सकता ॥ ३८ ॥ क्योंकि परमात्मा पूर्ण है, उससे भिन्न और कोई स्थान ही नहीं है। [ यदि उसे अपूर्ण मानें तब भी चेतनसे भिन्न होनेके कारण अन्य स्थान अचेतन अर्थात् अप्रकाश रूप होगा, अतः ] उससे भिन्न स्थानमें स्थित होनेपर तो उस जगत्की किसी प्रकार सिद्धि ही नहीं हो सकती ॥ ३९ ॥ अतः जिस प्रकार दर्पणमें प्रतिबिम्बकी प्रतीति होती है उसी प्रकार भगवान्‌में जगत्का भास हुआ—इस प्रकार माननेसे सब संगति लग जाती है ॥ ४० ॥ जगत्के आदिकारण भी भगवान्‌की यह जगत्सम्बन्धिनी क्रिया योगीके समान है। उन परमात्मदेवकी यह जगद्रचना सङ्कल्पद्वारा रचे हुए नगरके समान है ॥ ४१ ॥ परशुराम ! तुम्हारी जो मनःकल्पित सृष्टि होती है वह केवल मनोमात्र ही तो होती है, किन्तु उसमें अनेकों प्रमाता ( जीव ) और उनके प्रमेय ( विषय ) आदि भी भासते ही हैं ॥ ४२ ॥

१५२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अनेकभेदभिन्नापि मनसोऽन्या न हि क्वचित् । उत्पन्ना मनसस्तत्र स्थिता तत्रैव लीयते ॥ ४३ ॥ सा केवलमनोरूपा यथा तद्वज्जगच्छिवात् । स शिवश्चितिमात्रैकरूपश्चितिरविग्रहा ॥ ४४ ॥ त्रिपुरानन्तशक्त्यैकरूपिणी सर्वसाक्षिणी । सा चितिः सर्वतः पूर्णा परिच्छेदविवर्जनात् ॥ ४५ ॥ कालो देशश्च लोकेऽस्मिन्परिच्छेदकरः स्मृतः । तत्राकारमयो देशः कालस्तु स्यात्क्रियामयः ॥ ४६ ॥ यां चितिं समुपाश्रित्य स्यादाकारः क्रियापि वा । तस्याः परिच्छेदकत्वमनयोः स्यात्कथं वद ॥ ४७ ॥ कस्मिन्देशे च काले च चितिर्नास्तीह तद् वद । यत्र न स्याच्चितिः सोऽपि कथं स्यादिति वै भवेत् ॥ ४८ ॥ इस प्रकार अनेको भेदोंसे विभिन्न-सी भासती हुई भी वह मनके सिवा और कुछ नहीं होती । वह मनसे उत्पन्न होती है, उसीमें स्थित रहती है और उसीमें लीन भी हो जाती है ॥ ४३ ॥ जैसे वह केवल मनःस्वरूपा ही होती है, उसी प्रकार शिवसे उत्पन्न हुआ यह जगत् चेतनमात्र है; क्योंकि शिव एकमात्र चिति- स्वरूप ही है और उस चितिका कोई शरीर नहीं है ॥ ४४ ॥ एकमात्र अनन्तशक्ति ही जिसका स्वरूप है वह सर्वसाक्षिणी त्रिपुरा ही चिति है और वह परिच्छेदसे शून्य तथा सब ओर परिपूर्ण है ॥ ४५ ॥ इस लोकमें काल और देश ही परिच्छेद करनेवाले माने गये हैं । इनमें देश आकारमय है और काल क्रियामय । फिर ये आकार और क्रिया जिस शुद्ध चितिके आश्रित हैं, बताओ, उसीका ये परिच्छेद करनेवाले कैसे हो सकते हैं ? ॥ ४६-४७ ॥ बताओ, यहाँ ऐसा कौन देश या काल है जिसमें चिति नहीं है । जहाँ चिति नहीं होगी वहाँ देश या काल भी कैसे रहेगा ।¹ अतः सत्तारूपसे चिति ही सब कुछ है ॥ ४८ ॥ १. 'चिति' ज्ञानमात्र है । ज्ञान ही में सम्पूर्ण दृश्य का भाव होता है । अतः जैसे दर्पणके बिना प्रतिबिम्ब और मृत्तिकाके बिना घट-शरावादि नहीं हो सकते उसी प्रकार चितिके बिना देश-कालादि कोई दृश्य पदार्थ भी नहीं हो सकता ।

एकादशोऽध्यायः। १५३ अस्तिता हि पदार्थानां प्रकाशो नापरः खलु। प्रकाशस्तु चितिः प्रोक्ता नाऽचितः स्यात्प्रकाशता॥ ४९॥ प्रकाशस्तु सुमुख्यः स्याद्यः स्वतन्त्रः प्रकाशते। जडा न स्वप्रकाशा हि चितियोगप्रकाशनात्॥ ५०॥ अन्यानपेक्षेणैव चितिः स्वस्मिन्प्रकाशते। जडाश्चितिं समाश्रित्य प्रकाशन्ते न चान्यथा॥ ५१॥ अप्रकाशेऽपि वस्तूनामस्तिता चेत्तदा शृणु। अस्ति नास्तीति लोकेऽस्मिन् व्यवस्था न हि सेत्स्यति ॥५२॥ तस्माद्वस्त्वस्तिता लोके चित्प्रकाशो न चापरः। यथा हि प्रतिबिम्बानां सत्त्वं दर्पण एव हि॥ ५३॥ तथा चितिर्जगत्सत्ता ततः सर्वं चितिर्भवेत्। अधिकं भासते यत्तु तन्नैर्मल्यमहत्त्वतः॥ ५४॥ पदार्थोंकी सत्ता तो उनका प्रकाशित होना ही है, और कुछ नहीं। और 'प्रकाश' चिति को ही कहा जाता है, क्योंकि अचित् (जडवर्ग) प्रकाशरूप नहीं हो सकता ४६॥ प्रकाश भी वही मुख्य है जो [किसी अन्यकी सहायताके बिना] स्वयं ही प्रकाशित हो। [अग्नि-सूर्य आदि] जडपदार्थ स्वयं प्रका- शित होनेवाले नहीं हैं, क्योंकि वे चेतनके द्वारा ही प्रकाशित होते हैं॥ ५०॥ केवल चिति ही किसी अन्यकी अपेक्षाके बिना स्वयं प्रकाशित होती है। जड पदार्थ तो चितिके अधीन ही प्रकाशित होते हैं, अन्य किसी प्रकार नहीं॥ ५१॥ यदि कहो कि प्रकाशित न होनेपर भी जड वस्तुओंकी सत्ता तो रह ही सकती है, तो सुनो—ऐसी अवस्थायें लोकमें 'है' और 'नहीं है' इसकी कोई व्यवस्था नहीं हो सकेगी॥ ५२॥ अतः लोकमें 'वस्तु की सत्ता' का अर्थ है चैतन्यका उस रूपमें प्रकाश, और कुछ नहीं। जिस प्रकार प्रतिबिम्बोंकी सत्ता दर्पण ही है उसी प्रकार चिति ही जगत् की सत्ता है। अतः सब कुछ चिति ही है। वह जो घट-पटादि विशिष्टरूपोंमें भासती है यह उसकी निर्म- लताकी महिमा है॥ ५३-५४॥

१५४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे काठिन्यनिर्मलत्वाभ्यां प्रतिबिम्बावभासनम् । तयोस्तु तारतम्येन प्रतिबिम्बः स्फुटोऽस्फुटः ॥ ५५ ॥ दर्पणे च जले चापि स्पष्टमेतद्धि लक्ष्यते । जडत्वाद्दर्पणादेस्तु स्वातन्त्र्यपरिवर्जनात् ॥ ५६ ॥ बिम्बापेक्षा चितेः स्वच्छस्वातन्त्र्यादनपेक्षता । निर्मलत्वं स्वतःसिद्धं चितेर्मांलिन्यवर्जनात् ॥ ५७ ॥ अनेकरसतैव स्यान्मालिन्यं तच्चितेर्न हि । ऐकात्म्यरूप्यान्चिच्छक्तेरखण्डत्वाच्च सर्वथा ॥ ५८ ॥ अरिक्तात्मभावहेतो नैर्मल्यं सर्वतोऽधिकम् । अस्वतो भासमानस्य भानमन्यानुषङ्गतः ॥ ५९ ॥ प्रतिबिम्बकी प्रतीति [ दर्पणादि आधारकी ] सघनता और निर्म- लताके कारण हुआ करती है। इनकी न्यूनाधिकताके अनुसार प्रतिबिम्ब भी अस्पष्ट या स्पष्ट होता है। यह अन्तर दर्पण और जलमें साफ-साफ देखा जा सकता है। [ दर्पण की अपेक्षा जलमें सघनता और निर्मलता कम होती है, इसलिये उसमें जो प्रतिबिम्ब पड़ता है वह दर्पणमें पड़नेवाले प्रतिबिम्बकी अपेक्षा अस्पष्ट होता है ] ॥ ५५-५६ पू० ॥ [ यदि कहो कि दर्पणादिमें तो बिम्बके अनुसार प्रतिबिम्ब पड़ता है, चितिमें बिना बिम्बके ही जगत्-रूप प्रतिबिम्ब कैसे प्रतीत होने लगता है, तो उसका उत्तर देते हैं— ] दर्पणादि तो जड हैं और उनमें स्वतन्त्रता भी नहीं है, इसलिये उन्हें बिम्ब की अपेक्षा होती है। किन्तु चिति स्वच्छ है और स्वतन्त्र है, इसलिये उसे उसकी अपेक्षा नहीं है। चितिमें मलिनता है ही नहीं, इसलिये उसकी स्वच्छता [ किसीकी की हुई नहीं ] स्वतः सिद्ध है ॥ ५६ उ०-५७ ॥ अनेकरसता अर्थात् अनेक पदार्थोंका मेल ही मलिनता है। चिति एकरूप और सर्वथा अखण्ड है, इसलिये उसके साथ किसीका मेल नहीं है। उसमें किसी अन्यके लिये स्थान ही नहीं है, अतः उसकी निर्मलता सबसे अधिक है ॥ ५८-५९ पू० ॥ जिसका स्वयं मान न हो, किसी अन्यके सम्पर्कसे ही जिसकी

एकादशोऽध्यायः। १५५ प्रतिबिम्बस्वरूपज्ञाः प्रतिबिम्बं प्रचक्षते । जगदेतादृशं सर्वं सर्वैः समभिलक्षितम् ॥ ६० ॥ स्वतो न भासते क्वापि भासते च चिदाश्रयात् । अतो जगत्स्यादादर्शप्रतिबिम्बसुसंमितम् ॥ ६१ ॥ चितिर्विचित्राऽन्यभावैरूपरक्तापि भासिनी । स्वरूपादप्रच्युतैवाऽऽदर्शवल्लेशतोऽपि हि ॥ ६२ ॥ दर्पणप्रतिबिम्बानां दर्पणानन्यता यथा । चिदात्मप्रतिबिम्बानां चिदात्मानन्यता तथा ॥ ६३ ॥ दर्पणे प्रतिबिम्बो हि बिम्बहेतुर्निरूपितः । चितेः स्वातन्त्र्यहेतुः स्यात्प्रतिबिम्बो हि जागतः ॥ ६४ ॥ स्वसङ्कल्पाद्राम पश्य स्वात्मनि प्रतिबिम्बितान् । भावान् बिम्बविनाभूतान्निर्निमित्तावभासनान् ॥ ६५ ॥ प्रतीति हो, उसीको प्रतिबिम्बका स्वरूप जाननेवाले 'प्रतिबिम्ब' कहते हैं। यह सम्पूर्ण जगत् सबको ऐसा ही जान पड़ा है ॥ ५६ उ०-६० ॥ यह स्वयं कभी नहीं भासता, चेतनके आश्रयसे ही भासता है। इसलिये यह जगत् दर्पणमें प्रतीत होनेवाले प्रतिबिम्बके समान है ॥ ६१ ॥ इसे प्रकाशित करनेवाली चिति बड़ी विचित्र है। वह अन्य भावोंसे उपरञ्जित (रँगी हुई) रहनेपर भी दर्पणके समान अपने स्वरूपसे लेशमात्र भी च्युत नहीं होती ॥ ६२ ॥ दर्पणके प्रतिबिम्बोंका जिस प्रकार दर्पणसे अभेद रहता है उसी प्रकार चिदात्मा में प्रतिबिम्बित पदार्थोंका भी चिदात्मासे अभेद है ॥ ६३ ॥ दर्पणमें जो प्रतिबिम्ब पड़ता है उसका हेतु बिम्ब कहा जाता है, किन्तु यह जगत्-रूप प्रतिबिम्ब चितिकी स्वतन्त्रताके कारण पड़ता है ॥ ६४ ॥ परशुराम ! तुम स्वयं अनुभव करके देखो; तुम्हारे संकल्पसे बिम्ब- के बिना ही तुम्हारे अन्तःकरणमें बिना निमित्तके ही अनेकों भाव प्रतिबिम्बित होते हैं ॥ ६५ ॥

१५६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे सङ्कल्प एव स्वातन्त्र्यं चितेरुच्छूनमीर्यते । असङ्कल्पदशायां सा चितिः स्वच्छैकरूपिणी ॥ ६६ ॥ एवं चितेर्विशुद्धैकरूपायाः सृष्टिः पुरा । बृहत्स्वातन्त्र्यमभवत्सङ्कल्पात्मकमेव तत् ॥ ६७ ॥ तत एतत्समाभातं प्रतिबिम्बात्मकं जगत् । बृहत्सङ्कल्पसुस्थैर्याच्चिरमेतद्विभासते ॥ ६८ ॥ साधारणं जगद्भाति पूर्णस्वातन्त्र्यहेतुतः । अन्येषां तदपूर्णत्वाद्भात्यसाधारणात्मना ॥ ६९ ॥ अभ्यासान्मणिमन्त्राद्यैः स्वातन्त्र्यं तु यथा यथा । त्यजेत्सङ्कोचमात्मस्थं तथा तत्र हि भासनम् ॥ ७० ॥ पश्यैन्द्रजालिकं राम निरुपादानयोगतः । भासयन्तं जगच्चित्रं सङ्कल्पादेव सर्वतः ॥ ७१ ॥ संकल्परूप स्वातन्त्र्य ही उस चितिका स्थूल रूप कहा जाता है। जब संकल्प नहीं होता उस अवस्था में तो वह शुद्ध चिन्मात्ररूपिणी ही है ॥ ६६ ॥ इस प्रकार सृष्टिसे पूर्व एकमात्र शुद्धस्वरूपिणी चितिमें जो परम स्वातन्त्र्य था वही सृष्टिके आरम्भमें संकल्परूप हो गया ॥ ६७ ॥ उसीसे यह प्रतिबिम्बरूप जगत् भासने लगा । वह महान् संकल्प बहुत स्थिर है, इसीसे यह चिरकालतक भासता रहता है ॥ ६८ ॥ चितिके पूर्ण स्वातन्त्र्यके कारण यह जगत् सबको समानरूपसे प्रतीत होता है । अन्य जीवोंका स्वातन्त्र्य तो पूर्ण नहीं है, इसलिये उनके संकल्पसे भासनेवाली वस्तुएँ असाधारणरूपसे केवल उन्हें ही प्रतीत होती हैं ॥ ६९ ॥ अभ्यास, मणि अथवा मन्त्र आदिके प्रभावसे जैसे-जैसे उनकी- स्वतन्त्रता बढती जाती है वैसे-वैसे ही उनके अन्तःकरणमें भासनेवाले पदार्थोंकी प्रतीतिमें भी संकोचकी कमी होने लगती है ॥ ७० ॥ परशुराम ! देखो, एक ऐन्द्रजालिक (मायावी) कोई सामग्री न रखते हुए भी केवल अपने संकल्पसे नया संसारचित्र दिखा देता है ॥ ७१ ॥