त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे ततः स्वस्थितिमाचख्यौ हेमचूडस्तयोः क्रमात् । तावुभौ भ्रातृपितरौ हेमचूडेन बोधितौ ॥ ४८ ॥ आसादितपरतत्त्वौ जीवन्मुक्तौ बभूवतुः । अथ मन्त्रिगणोप्येवं राज्ञः श्रुत्वा जगद्गतिम् ॥ ४९ ॥ विचार्य स्वात्मनो भावं ज्ञातज्ञेयोऽभवत्तदा । एवं विशालनगरे क्रमेणैव परस्परम् ॥ ५० ॥ उपदेशाद्विदुः सर्वे तत्त्वमाबालगोपकाः । नरा नार्यो बालवृद्धा दासा दासीगणा अपि ॥ ५१ ॥ ज्ञातज्ञेयास्त्यक्तदेहाहम्भावा अभवन्खलु । न तत्र कस्यचित्कामः क्रोधो वा लोभ एव वा ॥ ५२ ॥ अनाहृतोऽस्ति बालस्य स्थविरस्यापि वा क्वचित् । आहृतक्रोधकामाद्यैर्व्यवहारपरायणाः ॥ ५३ ॥ बालं माता खेलयति परतत्त्वस्य वार्तया । दासा दास्यः स्वामिनं स्वं सदा परिचरन्ति वै ॥ ५४ ॥ तब हेमचूडने क्रमशः उन्हें अपनी सब स्थिति सुनायी और उसके बोध करानेसे वे पिता और चाचा दोनों ही परमतत्त्वकी उपलब्धि कर जीवन्मुक्त हो गये ॥ ४८-४९ पू० ॥ इसी प्रकार फिर मन्त्रियोंने भी राजासे जगत्का रहस्य सुनकर आत्माके स्वरूपका विचार किया और उन्होंने भी जो जानने योग्य था उसे जान लिया ॥ ४९ उ०-५० पू० ॥ इस प्रकार उस विशाल नगरमें बालक और ग्वाले तक सभी क्रमशः एक-दूसरेसे उपदेश लेकर परमतत्त्वको जान गये ॥५० उ०-५१ पू० ॥ नर-नारी, बालक-वृद्ध और दास-दासी भी ज्ञात-ज्ञेय होकर देहमें अहंबुद्धिसे रहित हो गये। वहाँ बालक या वृद्ध किसीके भी काम, क्रोध या लोभ निवृत्त हुए बिना नहीं रहे। सब लोग काम-क्रोधादिको संयत रखकर ही व्यवहारमें तत्पर रहते थे ॥ ५१ उ०-५३ ॥ माताएँ परमतत्त्वकी चर्चा करके ही बच्चोंको खिलाती थीं। दास और दासियाँ सर्वदा आपसमें परमतत्त्व-विषयक वाक्योंका व्यवहार