भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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परतत्त्वपरैर्वाक्यैर्व्याहरन्तः परस्परम् । नटा नाट्यं वितन्वन्ति पात्रैस्तत्त्वप्रसङ्गजैः ॥ ५५ ॥ विवेकवार्तापरमं वचो गायन्ति गायकाः । विदूषका दूषयन्ति लोकव्यवहृतिं सदा ॥ ५६ ॥ शास्त्राणि पाठयन्ति स्म विद्वांसः पाठकान् जनान् । परतत्त्वविचारार्हेरुदाहरणमण्डलैः ॥ ५७ ॥ एवं तत्र नरा नार्यो दासा दास्यो नटा विटाः । भृत्या भटा मन्त्रिणश्च शिल्पिनो वारयोषितः ॥ ५८ ॥ सर्वे वेदितवेद्यास्ते विशालनगरेऽभवन् । प्राक्तसंस्कारबलेनैव व्यवहारपरायणताः ॥ ५९ ॥ न संस्मरति संवृत्तं शुभं वाप्यशुभं तथा । भविष्यं नानुसन्धत्ते हर्षशोकादिसाधनम् ॥ ६० ॥ वर्तमाने स्मयन्हृष्यन्खिद्यन् क्रुध्यन्निवान्वहम् ।

करते हुए ही अपने स्वामीकी सेवा करते थे। तथा नट लोग तत्त्व- प्रसंगसम्बन्धी [ विवेक-मोह आदि ] पात्रोंके द्वारा ही नाटक खेलते थे ॥ ५४-५५ ॥ गानेवाले विवेककी चर्चासे भरी वाणियोंका ही गान करते थे तथा विदूषक लोग सर्वदा लौकिक व्यवहारका उपहास करते थे ॥ ५६ ॥ विद्वान् लोग विद्यार्थियोंको परमतत्त्वके विचारका पोषण करने- वाले उदाहरणोंसे पूर्ण शास्त्रोंका अध्ययन कराते थे ॥ ५७ ॥ इस प्रकार उस विशाल नगरमें नर, नारी, दास, दासी, नट, विदूषक, सेवक, सिपाही, मन्त्री, कारीगर, और वेश्याएँ सभी जानने योग्य परमतत्त्वको जान गये ॥ ५८-५९ पू० ॥ अपने पूर्वसंस्कारोंके अनुसार व्यवहार करते हुए भी उन्हें अपनी क्रियाओंमें शुभ या अशुभ का अनुसन्धान नहीं होता था। [ उनकी सब चेष्टाएँ बच्चोंके समान स्वभावसे ही होती थीं ] ॥ ५९ उ०-६० पू० ॥ जिसके कारण हर्ष या शोकादिकी कल्पनाएँ होती हैं उस भविष्य- का वे कभी चिन्तन नहीं करते थे। वर्तमानमें प्रसंगवश मुसकराते,