त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अन्वयव्यतिरेकाभ्यां कार्यकारणनिश्चयात् । संवादतः प्रवृत्तीनां कथमाकस्मिकं भवेत् ॥ ११ ॥ क्वचित्तु कारणेऽदृष्टेऽप्यदृष्टं कल्प्यमेव तत् । बहूनामनुरोधो हि न्याय्यः सर्वैरुदाहृतः ॥ १२ ॥ भूयो दृष्टं सपूर्वं हि कार्यं क्वचिददर्शने । दृष्टवत्परिकल्प्यं स्यादन्यथा सार्वलौकिकी ॥ १३ ॥ सम्प्रवृत्तिर्विरुध्येत तस्मात्सर्वं सकारणम् । अत एव कार्यहेतोः किंचित्कारणतत्परः ॥ १४ ॥ सर्वत्र दृश्यते लोकस्तस्मादेतन्न किंचन । केचिदाहुरसत्कल्पैरणुभिः कार्यमुद्यतम् ॥ १५ ॥ तेभ्योऽत्यन्तं विभिन्नं चाप्यसदत्यन्ततो भवेत् । [ कार्यमें कारणकी सत्ता रहती है, कारणके बिना कार्य होता ही नहीं ] इस अन्वय-व्यतिरेकके द्वारा भी कार्य-कारण भावका निश्चय होता ही है। इस नियममें कभी कोई अन्तर भी नहीं पड़ता। ऐसी स्थितिमें यह आकस्मिक ( अनियत ) कैसे हो सकता है ॥ ११ ॥ कहीं-कहीं कारण देखनेमें नहीं आता, वहाँ अदृष्ट कारणका अनुमान कर लेना चाहिये, क्योंकि जो बहुमत होता है उसे स्वीकार करना सभीने न्यायानुुकूल माना है ॥ १२ ॥ अधिकांश वस्तुएँ तो कारणपूर्वक ही देखी जाती हैं। इसलिये यदि कहीं कारण दिखायी न दे तो अन्यत्र देखे हुए कारणोंकी तरह वहाँ भी कारणकी कल्पना कर लेनी चाहिये। नहीं तो जो प्रवृत्ति सर्वत्र देखी जाती है उससे विरोध होगा। इसलिये सब पदार्थ कारणपूर्वक ही हैं ॥ १३-१४ पू० ॥ इसीलिये जब कोई कार्य करना होता है तो सभी जगह लोग उसकी साधनसामग्री जुटानेमें तत्पर देखे जाते हैं। अतः यह स्वभाव- वाद [ कि संसार बिना कारणके स्वयं उत्पन्न हो गया ] कुछ भी नहीं है ॥ १४ उ०-१५ पू० ॥ कोई ( परमाणुवादी नैयायिक ) कहते हैं कि यह कार्यरूप जगत् असत्तुल्य ( अव्यक्त एवं जड ) परमाणुओंसे बना है। किन्तु यह [ व्यक्त और सद्रूप होनेके कारण ] उनसे अत्यन्त भिन्न है। तथापि