भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 161, कुल 404 में से

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एकादशोऽध्यायः। १४७ असत्सतोरेकता हि विरुद्धा न कुतो भवेत् ॥ १६ ॥ न हिपीतमपीतं च प्रकाशं चाप्रकाशकम् । एकं भवेद्विरुद्धत्वात्साङ्कर्यादिप्रसक्तितः ॥ १७ ॥ ईश्वरेच्छादितो वापि कथमादिक्रियोद्भवः । गुणसाम्यप्रकृतिकं जगदित्यप्यसंभवि ॥ १८ ॥ वैषम्यहेतोर्मृग्यत्वात्साम्यहेतोश्च हीनतः । चेतनेनानधिष्ठानाद् दृष्टान्तानुपलम्भतः ॥ १९ ॥ अन्तमें यह भी असत् हो जाता है । परन्तु इस सिद्धान्तमें जो असत् और सत् की अभिन्नता बतायी गयी है वह विरुद्ध क्यों नहीं है ? ॥ १५ उ० १६ ॥ पीत और अपीत या प्रकाश और अप्रकाश एक कभी नहीं हो सकते, क्योंकि इनका परस्पर विरोध है और ऐसा माननेसे संकरादि¹ दोषोंका भी प्रसंग होगा ॥ १७ ॥ [यदि कहें कि ईश्वरकी इच्छासे परमाणुओं में गति उत्पन्न हो जाती है, तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि ] ईश्वरकी इच्छासे भी आरम्भमें जड परमाणुओंमें क्रिया की उत्पत्ति कैसे हो सकती है ? [ इस प्रकार परमाणुवादका निराकरण कर अब सांख्योक्त प्रकृतिकारण- वादका खण्डन करते हैं—] गुणोंकी साम्यावस्थारूप प्रकृते जगत्का भाव है—यह बात भी सम्भव नहीं है ॥ १८ ॥ इसके लिये सृष्टिके आरम्भमें जोप्रकृतिके गुणोंमें विषमता होती है उसका कारण ढूँढ़ना होगा और प्रलयमें जो उनकी पुनः समता होती है उसका भी कोई हेतु नहीं जान पड़ता । [ यदि कहो कि ईश्वरकी इच्छासे ऐसा होता है तो ] सांख्यवादी प्रकृतिको किसी चेतनसे अधिष्ठित मानते नहीं हैं । और ऐसा कोई दृष्टान्त नहीं मिलता कि चेतनाके बिना ही किसी जडमें क्रिया उत्पन्न हो जाय ॥ १९ ॥ १. एक ही वस्तुमें दो विरुद्ध धर्मोंका आरोप करना 'संकर' दोष है। इसके सिवा नैयायिक परमाणुओंको निरवयव मानते हैं और निरवयव वस्तुओंका संयोग होना सम्भव नहीं है। यह 'अव्याप्यवृत्तित्वभंग' रूप दोष 'आदि' पदसे ग्रहण करना चाहिये।

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