त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
एकादशोऽध्यायः। १४७ असत्सतोरेकता हि विरुद्धा न कुतो भवेत् ॥ १६ ॥ न हिपीतमपीतं च प्रकाशं चाप्रकाशकम् । एकं भवेद्विरुद्धत्वात्साङ्कर्यादिप्रसक्तितः ॥ १७ ॥ ईश्वरेच्छादितो वापि कथमादिक्रियोद्भवः । गुणसाम्यप्रकृतिकं जगदित्यप्यसंभवि ॥ १८ ॥ वैषम्यहेतोर्मृग्यत्वात्साम्यहेतोश्च हीनतः । चेतनेनानधिष्ठानाद् दृष्टान्तानुपलम्भतः ॥ १९ ॥ अन्तमें यह भी असत् हो जाता है । परन्तु इस सिद्धान्तमें जो असत् और सत् की अभिन्नता बतायी गयी है वह विरुद्ध क्यों नहीं है ? ॥ १५ उ० १६ ॥ पीत और अपीत या प्रकाश और अप्रकाश एक कभी नहीं हो सकते, क्योंकि इनका परस्पर विरोध है और ऐसा माननेसे संकरादि¹ दोषोंका भी प्रसंग होगा ॥ १७ ॥ [यदि कहें कि ईश्वरकी इच्छासे परमाणुओं में गति उत्पन्न हो जाती है, तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि ] ईश्वरकी इच्छासे भी आरम्भमें जड परमाणुओंमें क्रिया की उत्पत्ति कैसे हो सकती है ? [ इस प्रकार परमाणुवादका निराकरण कर अब सांख्योक्त प्रकृतिकारण- वादका खण्डन करते हैं—] गुणोंकी साम्यावस्थारूप प्रकृते जगत्का भाव है—यह बात भी सम्भव नहीं है ॥ १८ ॥ इसके लिये सृष्टिके आरम्भमें जोप्रकृतिके गुणोंमें विषमता होती है उसका कारण ढूँढ़ना होगा और प्रलयमें जो उनकी पुनः समता होती है उसका भी कोई हेतु नहीं जान पड़ता । [ यदि कहो कि ईश्वरकी इच्छासे ऐसा होता है तो ] सांख्यवादी प्रकृतिको किसी चेतनसे अधिष्ठित मानते नहीं हैं । और ऐसा कोई दृष्टान्त नहीं मिलता कि चेतनाके बिना ही किसी जडमें क्रिया उत्पन्न हो जाय ॥ १९ ॥ १. एक ही वस्तुमें दो विरुद्ध धर्मोंका आरोप करना 'संकर' दोष है। इसके सिवा नैयायिक परमाणुओंको निरवयव मानते हैं और निरवयव वस्तुओंका संयोग होना सम्भव नहीं है। यह 'अव्याप्यवृत्तित्वभंग' रूप दोष 'आदि' पदसे ग्रहण करना चाहिये।
१४८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तस्माज्जागतकार्यस्य कारणं नोपलभ्यते अदृष्टे तु श्रुतिर्मूलं नान्यमानसुसङ्गमः ॥ २० ॥ प्रमातॄणामपूर्णत्वात्प्रमाणस्यानवस्थितेः । कार्यकार्तृवियोगस्य भूयोऽदर्शनहेतुतः ॥ २१ ॥ सकर्तृकं जगदिदं सम्भवाच्चेतनो हि सः । कार्यस्याचिन्त्यरूपस्य कर्त्ता साधारणः कथम् ॥ २२ ॥ तस्मादचिन्त्यशक्तिः स आगमस्तद्विमर्शनम् । पूर्णस्य त्वप्रतिहतं प्रमाणं सर्वतोधिकम् ॥ २३ ॥ तत्रैकस्तु महेशानः पुरा सृष्टेरुदाहृतः । स्वतन्त्रो ह्यनुपादानः स्वातन्त्र्यभरवैभवात् ॥ २४ ॥ इस प्रकार जगत् रूप कार्यका कोई भी दृष्ट कारण तो मिलता नहीं है। और अदृष्ट कारणका निर्णय करनेमें श्रुति ही मूल प्रमाण है, उससे भिन्न कोई और प्रमाण माननीय नहीं हो सकता ॥ २० ॥ क्योंकि प्रमाता जीव तो अपूर्ण हैं तथा किसी प्रमाणकी उस ( परोक्ष कारण ) में गति नहीं है। और ऐसा कभी देखा नहीं जाता कि कर्ताके बिना ही कार्य हो गया हो। इसलिये यह जगत् किसी कर्ताकी ही रचना है। और सम्भव होनेके कारण वह कर्ता चेतन ही होना चाहिये। तथा यह जगत्-रूप कार्य बड़ा विलक्षण है, इसलिये इसका कर्ता भी साधारण कैसे हो सकता है ? ॥ २१-२२ ॥ अतएव वह अचिन्त्यशक्ति-सम्पन्न है और उसके तत्त्वको बत- लानेवाला उसीका व्यापार है आगम ( वेद )। अतः वही उस पूर्ण- तत्त्वको प्रकाशित करनेवाला सर्वथा अबाधित सबसे बड़ा प्रमाण है ॥ २३ ॥ उस आगममें कहा है कि सृष्टिसे पूर्व एकमात्र महेश्वर ही थे। उन परम स्वतन्त्र परमेश्वरमें बिना किसी अन्य सामग्रीके अपनी १. सृष्टिका कारण परोक्ष है, इसलिये उसमें किसी इन्द्रियकी गति न हो सकने के कारण वह प्रत्यक्ष प्रमाणका विषय नहीं हो सकता। और अनुमान प्रत्यक्ष- मूलक होता है, अतः प्रत्यक्षकी गति न होनेके कारण उसमें अनुमानकी भी गति नहीं है। इसी प्रकार किसी अन्य प्रमाण का भी वह विषय नहीं है।
एकादशोऽध्यायः। १४६ स्वात्मभित्तौ जगच्चित्रं विलासायावभासयत् । तथा स्वप्नमनोराज्ये कल्पितं स्वेन केवलम् ॥ २५ ॥ अहंत्वेनैव गृह्णाति देहं तद्वदयं जगत् । न ते रूपं यथा देहः स्वप्नव्यावृत्तिहेतुतः ॥ २६ ॥ तथास्य न जगद्देहो व्यावृत्तेः प्रलये ननु । देहादिव्यतिरिक्तस्त्वं यथा केवलचिन्मयः ॥ २७ ॥ एवं देवो जगच्छून्यचिदेकवपुरव्ययः । तेनेदं स्वात्मनि जगच्चित्रमुन्मीलितं ननु ॥ २८ ॥ कोन्मीलयेज्जगच्चित्रं स्वान्यस्य क्वाप्यसम्भवात् । ऋते चितिं कदाचिद्वा क्व किं भवितुमर्हति ॥ २९ ॥ यत्राभावश्चितेर्ब्रूयात्स देशो नैव सिध्यति । अभावश्च चितेः केन सिध्येदस्माच्चितिः परा ॥ ३० ॥ स्वतन्त्रताके उत्कर्ष की महिमासे ही केवल क्रीडाकौतुकके लिये अपने ही स्वरूपभूत पटपर इस जगत्-चित्रको भासित कर दिया ॥ २४-२५ पू० ॥ जिस प्रकार स्वप्नके मनोराज्यमें अपने ही द्वारा कल्पित देहको 'मैं' रूपसे ग्रहण कर लिया जाता है उसी प्रकार का यह जगत् है ॥ २५ उ०-२६ पू० ॥ किन्तु स्वप्नकी निवृत्ति होनेपर न रहनेके कारण जैसे यह देह वास्तवमें तुम्हारा स्वरूप नहीं है, उसी तरह प्रलयमें न रहनेके कारण यह जगत् भी परमेश्वरका शरीर नहीं है ॥ २६ उ०-२७ पू० ॥ जैसे तुम देहादिसे अतिरिक्त शुद्ध चिन्मात्र हो उसी प्रकार भगवान् भी जगत्से सर्वथा शून्य एकमात्र अविनाशी चित्स्वरूप ही हैं। उन्होंने अपने ही पर यह जगच्चित्र प्रकट कर लिया है ॥२७ उ०-२८॥ उनसे भिन्न और कोई कहीं है ही नहीं; अतः इस जगच्चित्रको और कहाँ प्रकट किया जाता ? उस चिन्मात्रके सिवा क्या कभी कोई कहीं हो सकता है ? ॥ २९ ॥ जहाँ चितिका अभाव बताया जायगा वह देश तो सिद्ध ही नहीं हो सकता, क्योंकि बिना चेतनके उस अभावकी सिद्धि किससे होगी। इसलिये चिति ही परतत्त्व है [ उसका निषेध नहीं हो सकता ] ॥३०॥
१५० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे महासत्ता जगद्ग्रासशीला पूर्णावभासते । समुद्रमन्तरा तोयं दिवानाथं विना प्रभाः ॥ ३१ ॥ यथा न सन्ति तद्वद् वै संविद्रूपं विना जगत् । तस्मादेष महादेवः शुद्धचैतन्यविग्रहः ॥ ३२ ॥ आसीत्सृष्टेः पुरा तस्मादुत्पन्नं तत्र संस्थितम् । तस्मिन्विलीयते चान्ते जगदेतच्चराचरम् ॥ ३३ ॥ इत्यागमप्रसिद्धोऽर्थस्तन्न विप्रतिपद्यते । अदृष्टार्थेषु संवादात्प्रमाणं ह्यागमो भवेत् ॥ ३४ ॥ दृश्यन्ते मणिमन्त्रादिसिद्धयः सर्वतो यतः । नाल्पप्रज्ञो विजानीयान्मणिमन्त्रमहाफलम् ॥ ३५ ॥ तस्मात्सर्वज्ञगदितो ह्यागमः सर्वदर्शनः । तत्रोक्तो देव एवादौ सृष्टेर्जगत आस्थितः ॥ ३६ ॥ इस प्रकार सम्पूर्ण जगत्को अपनेमें लीन कर लेनेवाली वह महा- सत्ता ही पूर्णरूपसे प्रकाशमान है । जिस प्रकार समुद्रके बिना तरंग और सूर्यके बिना प्रभाकी सत्ता नहीं है उसी प्रकार उस चिन्मात्र के { बिना संसार नहीं है ॥ ३१-३२ पू० ॥ अतः सृष्टिसे पहले यह शुद्धचैतन्यस्वरूप महेश्वर ही थे । यह चरा- चर जगत् उन्हींसे उत्पन्न हुआ है, उन्हींमें स्थित है और अन्तमें उन्हींमें लीन होता है ॥ ३२ उ०-३३ ॥ यही श्रुतिसम्मत सिद्धान्त है, इसमें किसी प्रकारका सन्देह नहीं हो सकता, क्योंकि जहाँ अदृष्ट पदार्थके विषयमें शंका होती है वहाँ श्रुति ही प्रमाण मानी जाती है ॥ ३४ ॥ [ देखो, शास्त्रद्वारा प्रतिपादित होनेके कारण ही ] सर्वत्र मणि और मन्त्रादिसे प्राप्त होने वाली सिद्धियाँ देखी जाती हैं। इन मणि-मन्त्रा- दिके महान् प्रभावको कोई अल्पबुद्धि जीव नहीं जान सकता ॥ ३५ ॥ इसलिये सर्वज्ञ परमेश्वरके द्वारा कहा हुआ वेद ही सबसे बड़ा प्रमाण है । उसमें कहा है कि जगत्की रचनासे पूर्व एक परमात्मा ही था ॥ ३६ ॥
एकादशोऽध्यायः । १५१ निरुपादान एत्रादौ सृष्टवानखिलं जगत् । यस्मान्महेश्वरः पूर्णस्वच्छस्वातन्त्र्यसंयुतः ॥ ३७ ॥ चिदात्मभित्तावखिलं चित्रमुन्मीलयज्जगत् । न तज्जगत्सम्भवति बहिः क्वचिदवस्थितम् ॥ ३८ ॥ पूर्णत्वाद्दीश्वरस्येह स्थानमन्यन्न विद्यते । अन्यस्थानस्थितं तच्च कथञ्चिन्नैव सिध्यति ॥ ३९ ॥ तथा च दर्पणाभोगे प्रतिबिम्बवदेव हि । जगदुन्मीलितं देवे चैवं सर्वं समञ्जसम् ॥ ४० ॥ जगदादेर्हि देवस्य योगीव जगतः क्रिया । सङ्कल्पनगरप्रख्या सृष्टिर्देवस्य सम्मता ॥ ४१ ॥ राम ते मानसी सृष्टिर्मनोमध्यैव केवला । अनेकमातृमेयादिप्रचुरा ह्यवभासते ॥ ४२ ॥ उसने बिना किसी अन्य सामग्रीके आरम्भमें जगत्की रचना की, क्योंकि वह महेश्वर पूर्ण, शुद्ध और स्वातन्त्र्यशक्तिसे सम्पन्न है ॥३७॥ उसने अपने ही चैतन्यस्वरूप भीतपर यह जगत्-रूप चित्र प्रकट किया। वह जगत् उससे बाहर कहीं अन्यत्र नहीं हो सकता ॥ ३८ ॥ क्योंकि परमात्मा पूर्ण है, उससे भिन्न और कोई स्थान ही नहीं है। [ यदि उसे अपूर्ण मानें तब भी चेतनसे भिन्न होनेके कारण अन्य स्थान अचेतन अर्थात् अप्रकाश रूप होगा, अतः ] उससे भिन्न स्थानमें स्थित होनेपर तो उस जगत्की किसी प्रकार सिद्धि ही नहीं हो सकती ॥ ३९ ॥ अतः जिस प्रकार दर्पणमें प्रतिबिम्बकी प्रतीति होती है उसी प्रकार भगवान्में जगत्का भास हुआ—इस प्रकार माननेसे सब संगति लग जाती है ॥ ४० ॥ जगत्के आदिकारण भी भगवान्की यह जगत्सम्बन्धिनी क्रिया योगीके समान है। उन परमात्मदेवकी यह जगद्रचना सङ्कल्पद्वारा रचे हुए नगरके समान है ॥ ४१ ॥ परशुराम ! तुम्हारी जो मनःकल्पित सृष्टि होती है वह केवल मनोमात्र ही तो होती है, किन्तु उसमें अनेकों प्रमाता ( जीव ) और उनके प्रमेय ( विषय ) आदि भी भासते ही हैं ॥ ४२ ॥
१५२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अनेकभेदभिन्नापि मनसोऽन्या न हि क्वचित् । उत्पन्ना मनसस्तत्र स्थिता तत्रैव लीयते ॥ ४३ ॥ सा केवलमनोरूपा यथा तद्वज्जगच्छिवात् । स शिवश्चितिमात्रैकरूपश्चितिरविग्रहा ॥ ४४ ॥ त्रिपुरानन्तशक्त्यैकरूपिणी सर्वसाक्षिणी । सा चितिः सर्वतः पूर्णा परिच्छेदविवर्जनात् ॥ ४५ ॥ कालो देशश्च लोकेऽस्मिन्परिच्छेदकरः स्मृतः । तत्राकारमयो देशः कालस्तु स्यात्क्रियामयः ॥ ४६ ॥ यां चितिं समुपाश्रित्य स्यादाकारः क्रियापि वा । तस्याः परिच्छेदकत्वमनयोः स्यात्कथं वद ॥ ४७ ॥ कस्मिन्देशे च काले च चितिर्नास्तीह तद् वद । यत्र न स्याच्चितिः सोऽपि कथं स्यादिति वै भवेत् ॥ ४८ ॥ इस प्रकार अनेको भेदोंसे विभिन्न-सी भासती हुई भी वह मनके सिवा और कुछ नहीं होती । वह मनसे उत्पन्न होती है, उसीमें स्थित रहती है और उसीमें लीन भी हो जाती है ॥ ४३ ॥ जैसे वह केवल मनःस्वरूपा ही होती है, उसी प्रकार शिवसे उत्पन्न हुआ यह जगत् चेतनमात्र है; क्योंकि शिव एकमात्र चिति- स्वरूप ही है और उस चितिका कोई शरीर नहीं है ॥ ४४ ॥ एकमात्र अनन्तशक्ति ही जिसका स्वरूप है वह सर्वसाक्षिणी त्रिपुरा ही चिति है और वह परिच्छेदसे शून्य तथा सब ओर परिपूर्ण है ॥ ४५ ॥ इस लोकमें काल और देश ही परिच्छेद करनेवाले माने गये हैं । इनमें देश आकारमय है और काल क्रियामय । फिर ये आकार और क्रिया जिस शुद्ध चितिके आश्रित हैं, बताओ, उसीका ये परिच्छेद करनेवाले कैसे हो सकते हैं ? ॥ ४६-४७ ॥ बताओ, यहाँ ऐसा कौन देश या काल है जिसमें चिति नहीं है । जहाँ चिति नहीं होगी वहाँ देश या काल भी कैसे रहेगा ।¹ अतः सत्तारूपसे चिति ही सब कुछ है ॥ ४८ ॥ १. 'चिति' ज्ञानमात्र है । ज्ञान ही में सम्पूर्ण दृश्य का भाव होता है । अतः जैसे दर्पणके बिना प्रतिबिम्ब और मृत्तिकाके बिना घट-शरावादि नहीं हो सकते उसी प्रकार चितिके बिना देश-कालादि कोई दृश्य पदार्थ भी नहीं हो सकता ।
एकादशोऽध्यायः। १५३ अस्तिता हि पदार्थानां प्रकाशो नापरः खलु। प्रकाशस्तु चितिः प्रोक्ता नाऽचितः स्यात्प्रकाशता॥ ४९॥ प्रकाशस्तु सुमुख्यः स्याद्यः स्वतन्त्रः प्रकाशते। जडा न स्वप्रकाशा हि चितियोगप्रकाशनात्॥ ५०॥ अन्यानपेक्षेणैव चितिः स्वस्मिन्प्रकाशते। जडाश्चितिं समाश्रित्य प्रकाशन्ते न चान्यथा॥ ५१॥ अप्रकाशेऽपि वस्तूनामस्तिता चेत्तदा शृणु। अस्ति नास्तीति लोकेऽस्मिन् व्यवस्था न हि सेत्स्यति ॥५२॥ तस्माद्वस्त्वस्तिता लोके चित्प्रकाशो न चापरः। यथा हि प्रतिबिम्बानां सत्त्वं दर्पण एव हि॥ ५३॥ तथा चितिर्जगत्सत्ता ततः सर्वं चितिर्भवेत्। अधिकं भासते यत्तु तन्नैर्मल्यमहत्त्वतः॥ ५४॥ पदार्थोंकी सत्ता तो उनका प्रकाशित होना ही है, और कुछ नहीं। और 'प्रकाश' चिति को ही कहा जाता है, क्योंकि अचित् (जडवर्ग) प्रकाशरूप नहीं हो सकता ४६॥ प्रकाश भी वही मुख्य है जो [किसी अन्यकी सहायताके बिना] स्वयं ही प्रकाशित हो। [अग्नि-सूर्य आदि] जडपदार्थ स्वयं प्रका- शित होनेवाले नहीं हैं, क्योंकि वे चेतनके द्वारा ही प्रकाशित होते हैं॥ ५०॥ केवल चिति ही किसी अन्यकी अपेक्षाके बिना स्वयं प्रकाशित होती है। जड पदार्थ तो चितिके अधीन ही प्रकाशित होते हैं, अन्य किसी प्रकार नहीं॥ ५१॥ यदि कहो कि प्रकाशित न होनेपर भी जड वस्तुओंकी सत्ता तो रह ही सकती है, तो सुनो—ऐसी अवस्थायें लोकमें 'है' और 'नहीं है' इसकी कोई व्यवस्था नहीं हो सकेगी॥ ५२॥ अतः लोकमें 'वस्तु की सत्ता' का अर्थ है चैतन्यका उस रूपमें प्रकाश, और कुछ नहीं। जिस प्रकार प्रतिबिम्बोंकी सत्ता दर्पण ही है उसी प्रकार चिति ही जगत् की सत्ता है। अतः सब कुछ चिति ही है। वह जो घट-पटादि विशिष्टरूपोंमें भासती है यह उसकी निर्म- लताकी महिमा है॥ ५३-५४॥
१५४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे काठिन्यनिर्मलत्वाभ्यां प्रतिबिम्बावभासनम् । तयोस्तु तारतम्येन प्रतिबिम्बः स्फुटोऽस्फुटः ॥ ५५ ॥ दर्पणे च जले चापि स्पष्टमेतद्धि लक्ष्यते । जडत्वाद्दर्पणादेस्तु स्वातन्त्र्यपरिवर्जनात् ॥ ५६ ॥ बिम्बापेक्षा चितेः स्वच्छस्वातन्त्र्यादनपेक्षता । निर्मलत्वं स्वतःसिद्धं चितेर्मांलिन्यवर्जनात् ॥ ५७ ॥ अनेकरसतैव स्यान्मालिन्यं तच्चितेर्न हि । ऐकात्म्यरूप्यान्चिच्छक्तेरखण्डत्वाच्च सर्वथा ॥ ५८ ॥ अरिक्तात्मभावहेतो नैर्मल्यं सर्वतोऽधिकम् । अस्वतो भासमानस्य भानमन्यानुषङ्गतः ॥ ५९ ॥ प्रतिबिम्बकी प्रतीति [ दर्पणादि आधारकी ] सघनता और निर्म- लताके कारण हुआ करती है। इनकी न्यूनाधिकताके अनुसार प्रतिबिम्ब भी अस्पष्ट या स्पष्ट होता है। यह अन्तर दर्पण और जलमें साफ-साफ देखा जा सकता है। [ दर्पण की अपेक्षा जलमें सघनता और निर्मलता कम होती है, इसलिये उसमें जो प्रतिबिम्ब पड़ता है वह दर्पणमें पड़नेवाले प्रतिबिम्बकी अपेक्षा अस्पष्ट होता है ] ॥ ५५-५६ पू० ॥ [ यदि कहो कि दर्पणादिमें तो बिम्बके अनुसार प्रतिबिम्ब पड़ता है, चितिमें बिना बिम्बके ही जगत्-रूप प्रतिबिम्ब कैसे प्रतीत होने लगता है, तो उसका उत्तर देते हैं— ] दर्पणादि तो जड हैं और उनमें स्वतन्त्रता भी नहीं है, इसलिये उन्हें बिम्ब की अपेक्षा होती है। किन्तु चिति स्वच्छ है और स्वतन्त्र है, इसलिये उसे उसकी अपेक्षा नहीं है। चितिमें मलिनता है ही नहीं, इसलिये उसकी स्वच्छता [ किसीकी की हुई नहीं ] स्वतः सिद्ध है ॥ ५६ उ०-५७ ॥ अनेकरसता अर्थात् अनेक पदार्थोंका मेल ही मलिनता है। चिति एकरूप और सर्वथा अखण्ड है, इसलिये उसके साथ किसीका मेल नहीं है। उसमें किसी अन्यके लिये स्थान ही नहीं है, अतः उसकी निर्मलता सबसे अधिक है ॥ ५८-५९ पू० ॥ जिसका स्वयं मान न हो, किसी अन्यके सम्पर्कसे ही जिसकी
एकादशोऽध्यायः। १५५ प्रतिबिम्बस्वरूपज्ञाः प्रतिबिम्बं प्रचक्षते । जगदेतादृशं सर्वं सर्वैः समभिलक्षितम् ॥ ६० ॥ स्वतो न भासते क्वापि भासते च चिदाश्रयात् । अतो जगत्स्यादादर्शप्रतिबिम्बसुसंमितम् ॥ ६१ ॥ चितिर्विचित्राऽन्यभावैरूपरक्तापि भासिनी । स्वरूपादप्रच्युतैवाऽऽदर्शवल्लेशतोऽपि हि ॥ ६२ ॥ दर्पणप्रतिबिम्बानां दर्पणानन्यता यथा । चिदात्मप्रतिबिम्बानां चिदात्मानन्यता तथा ॥ ६३ ॥ दर्पणे प्रतिबिम्बो हि बिम्बहेतुर्निरूपितः । चितेः स्वातन्त्र्यहेतुः स्यात्प्रतिबिम्बो हि जागतः ॥ ६४ ॥ स्वसङ्कल्पाद्राम पश्य स्वात्मनि प्रतिबिम्बितान् । भावान् बिम्बविनाभूतान्निर्निमित्तावभासनान् ॥ ६५ ॥ प्रतीति हो, उसीको प्रतिबिम्बका स्वरूप जाननेवाले 'प्रतिबिम्ब' कहते हैं। यह सम्पूर्ण जगत् सबको ऐसा ही जान पड़ा है ॥ ५६ उ०-६० ॥ यह स्वयं कभी नहीं भासता, चेतनके आश्रयसे ही भासता है। इसलिये यह जगत् दर्पणमें प्रतीत होनेवाले प्रतिबिम्बके समान है ॥ ६१ ॥ इसे प्रकाशित करनेवाली चिति बड़ी विचित्र है। वह अन्य भावोंसे उपरञ्जित (रँगी हुई) रहनेपर भी दर्पणके समान अपने स्वरूपसे लेशमात्र भी च्युत नहीं होती ॥ ६२ ॥ दर्पणके प्रतिबिम्बोंका जिस प्रकार दर्पणसे अभेद रहता है उसी प्रकार चिदात्मा में प्रतिबिम्बित पदार्थोंका भी चिदात्मासे अभेद है ॥ ६३ ॥ दर्पणमें जो प्रतिबिम्ब पड़ता है उसका हेतु बिम्ब कहा जाता है, किन्तु यह जगत्-रूप प्रतिबिम्ब चितिकी स्वतन्त्रताके कारण पड़ता है ॥ ६४ ॥ परशुराम ! तुम स्वयं अनुभव करके देखो; तुम्हारे संकल्पसे बिम्ब- के बिना ही तुम्हारे अन्तःकरणमें बिना निमित्तके ही अनेकों भाव प्रतिबिम्बित होते हैं ॥ ६५ ॥
१५६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे सङ्कल्प एव स्वातन्त्र्यं चितेरुच्छूनमीर्यते । असङ्कल्पदशायां सा चितिः स्वच्छैकरूपिणी ॥ ६६ ॥ एवं चितेर्विशुद्धैकरूपायाः सृष्टिः पुरा । बृहत्स्वातन्त्र्यमभवत्सङ्कल्पात्मकमेव तत् ॥ ६७ ॥ तत एतत्समाभातं प्रतिबिम्बात्मकं जगत् । बृहत्सङ्कल्पसुस्थैर्याच्चिरमेतद्विभासते ॥ ६८ ॥ साधारणं जगद्भाति पूर्णस्वातन्त्र्यहेतुतः । अन्येषां तदपूर्णत्वाद्भात्यसाधारणात्मना ॥ ६९ ॥ अभ्यासान्मणिमन्त्राद्यैः स्वातन्त्र्यं तु यथा यथा । त्यजेत्सङ्कोचमात्मस्थं तथा तत्र हि भासनम् ॥ ७० ॥ पश्यैन्द्रजालिकं राम निरुपादानयोगतः । भासयन्तं जगच्चित्रं सङ्कल्पादेव सर्वतः ॥ ७१ ॥ संकल्परूप स्वातन्त्र्य ही उस चितिका स्थूल रूप कहा जाता है। जब संकल्प नहीं होता उस अवस्था में तो वह शुद्ध चिन्मात्ररूपिणी ही है ॥ ६६ ॥ इस प्रकार सृष्टिसे पूर्व एकमात्र शुद्धस्वरूपिणी चितिमें जो परम स्वातन्त्र्य था वही सृष्टिके आरम्भमें संकल्परूप हो गया ॥ ६७ ॥ उसीसे यह प्रतिबिम्बरूप जगत् भासने लगा । वह महान् संकल्प बहुत स्थिर है, इसीसे यह चिरकालतक भासता रहता है ॥ ६८ ॥ चितिके पूर्ण स्वातन्त्र्यके कारण यह जगत् सबको समानरूपसे प्रतीत होता है । अन्य जीवोंका स्वातन्त्र्य तो पूर्ण नहीं है, इसलिये उनके संकल्पसे भासनेवाली वस्तुएँ असाधारणरूपसे केवल उन्हें ही प्रतीत होती हैं ॥ ६९ ॥ अभ्यास, मणि अथवा मन्त्र आदिके प्रभावसे जैसे-जैसे उनकी- स्वतन्त्रता बढती जाती है वैसे-वैसे ही उनके अन्तःकरणमें भासनेवाले पदार्थोंकी प्रतीतिमें भी संकोचकी कमी होने लगती है ॥ ७० ॥ परशुराम ! देखो, एक ऐन्द्रजालिक (मायावी) कोई सामग्री न रखते हुए भी केवल अपने संकल्पसे नया संसारचित्र दिखा देता है ॥ ७१ ॥
एकादशोऽध्यायः। १५७ साधारणं स्थिरं स्वार्थक्रियार्हं भूय एव तु । स्वात्मन्युपसंहरेच्च जगदेवं विभासते ॥ ७२ ॥ योगिनः पश्य सृष्टिं तां पूर्णस्थैर्यसमावृताम् । योगिनस्तु मितत्वेन सृष्टिर्बाह्या विभाविता ॥ ७३ ॥ अमितत्वात्सृष्टिरियं चिन्नाथस्यान्तरेव हि । अत एव चिदात्मत्वव्यतिरेकादसत्यता ॥ ७४ ॥ जगतः प्रतिबिम्बस्यादर्शात्मत्वं विना यथा । अत एव विचारेणासत्यतां याति नान्यथा ॥ ७५ ॥ सत्यं स्वभावं नो मुञ्चेदसत्यं तं परित्यजेत् । जगत्पश्य भार्गवैतत् स्वभावादतिचञ्चलम् ॥ ७६ ॥ सत्यासत्ये विभागेन भासेते सर्वतोऽखिलम् । प्रतिबिम्बादर्शभानमिव तत्प्रविचारय ॥ ७७ ॥ वह सबको दिखायी देता है, स्थिर जान पड़ता है, तथा सच्ची वस्तुओंके समान उससे व्यवहार भी हो सकता है । फिर अपने में ही उसे लीन भी कर लेता है । इसी प्रकार यह संसार भी भास रहा है ॥ ७२ ॥ योगियोंकी मनःकल्पित सृष्टिको देखो । वह तो पूर्ण स्थिरतासे युक्त होती है । किन्तु योगियोंका स्वरूप सीमित होता है, इसलिये उनकी सृष्टि उनसे बाहर भासती है ॥ ७३ ॥ परन्तु चिन्मात्र परमेश्वरका स्वरूप तो असीम है, इसलिये उनकी यह सृष्टि उनके भीतर ही है । अतः प्रतिबिम्ब जैसे दर्पणस्वरूप ही होता है वैसे ही चिदात्मासे भिन्न इस जगत्की कोई सत्ता नहीं है । इस प्रकार केवल विचारसे ही इसकी असत्यता सिद्ध होती है, और किसी प्रकार नहीं ॥ ७४-७५ ॥ परशुरामजी ! सत्य कभी अपने स्वभावको नहीं छोड़ता और असत्य उसे त्याग देता है । देखो, यह जगत् तो स्वभावसे बहुत ही चंचल है ॥ ७६ ॥ सब प्रकारके सत्य और असत्य दर्पण और प्रतिबिम्बके [ स्थिर और चंचल ] भानोंकी तरह अलग-अलग प्रतीत होते हैं । तुम उनका विचार करो ॥ ७७ ॥
३५८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे आदर्शो ह्यचलस्तत्र चलं हि प्रतिबिम्बकम्। तथा जगच्चलं संविदचलं सर्वभावितम् ॥ ७८ ॥ अत एव हि भावानां विचारासहरूपता। तथा हि सूर्यालोको हि वस्तूनामवभासकः ॥ ७९ ॥ उलूकादिदिवान्धानां विपरीतोऽन्धकारवत्। प्रकाशत्वान्धकारत्वे न विविक्तेऽनयोः स्फुटे ॥ ८० ॥ एवं विषं कस्यचित्स्यादविषं कस्यचिद्भवेत्। मनुष्यादेः प्रतीघातकरी भित्तिर्हि लक्ष्यते ॥ ८१ ॥ योगिनां गुह्यकादीनामप्रतीघातलक्षणा । कालो देशश्च दीर्घो यो मनुष्यादिप्रभावितः ॥ ८२ ॥ स एव विपरीतो वै देवानां योगिनामपि। दर्पणे भासमानस्य दूराद्देर्दूरता यथा ॥ ८३ ॥
इनमें दर्पण स्थिर होता है और प्रतिबिम्ब चंचल। इसी प्रकार जगत् चलायमान है और चेतन अचल है—यह बात सभी जानते हैं॥ ७८ ॥ इसीसे संसारके पदार्थ विचारके आगे ठहरनेवाले नहीं हैं। जैसे सूर्य सभी पदार्थोंको प्रकाशित करने वाला है, किन्तु जो दिनमें अन्धे रहते हैं उन उल्लू आदिके लिये वह अन्धकारके समान विपरीत स्वभाववाला जान पड़ता है। इससे प्रकाशत्व और अन्धकारत्वका स्पष्ट निर्णय नहीं हो सकता ॥ ७९-८० ॥ इसी प्रकार जो एकके लिये विष होता है वही दूसरेके लिये विष नहीं रहता। भीत मनुष्यादिके लिये तो रुकावट करनेवाली होती है, किन्तु योगी और गुह्यकादिके लिये रुकावट करनेवाली नहीं रहती ॥ ८१-८२ पू० ॥ जो देश और काल मनुष्यादिको बहुत लंबा जान पड़ता है, वही देवता और योगियोंको वैसा प्रतीत नहीं होता ॥ ८२ उ०-८३ पू० ॥ जैसे दर्पणमें भासनेवाली दूरी आदि में दूरता नहीं होती, उसी
एकादशोऽध्यायः । १५६ तथैवास्य स्वभावोऽपि विचारे न स्थिरीभवेत् । अत आश्रयरूपेण विना नास्ति हि किञ्चन ॥ ८४ ॥ यदस्तीति भाति तत्तु चितिरेव महेश्वरी । एवं जगच्चिदेकात्मरूपं ते सम्यगीरितम् ॥ ८५ ॥ इति श्री० ज्ञानखण्डे जगत्तत्त्वनिरूपणे एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ प्रकार विचार करने पर इस संसारका स्वभाव भी स्थिर नहीं जान पड़ता । अतः अपने आश्रय चेतनके सिवा यह और कुछ नहीं है ॥ ८३ उ०-८४ ॥ जो 'है' इस रूपसे भास रहा है वह तो केवल महेश्वरी चिति ही है। इस प्रकार जगत् और चेतनकी एकरूपताका यथावत् विवेचन हुआ ॥ ८५ ॥ एकादश अध्याय समाप्त ।
द्वादशोऽध्यायः एवं दत्तात्रेयमुखाज्जगतत्त्वं निशम्य तु। पप्रच्छ भार्गवो भूयः सन्देहकलिलान्तरः ॥ १ ॥ भगवन् संश्रुतं प्रोक्तं भवता जागतं ननु। यथा ब्रवीषि भगवंस्तत्तथैव न चान्यथा ॥ २ ॥ तथापि कुत एतद्धि भाति सत्यात्मकं सदा। कुतो वाऽन्यैर्बुद्धिमद्भिः सत्यत्वेन विनिश्चितम् ॥ ३ ॥ त्वत्तः श्रुतं चापि भूयो भाति मे सत्यवत् कुतः। ब्रूहेतत् कृपया नाथ यथा नश्येदयं भ्रमः ॥ ४ ॥ इत्यापृष्टो भार्गवेण दत्तात्रेयो महाशयः। जगत्सत्यभ्रान्तिमूलं प्रवक्तुमुपचक्रमे ॥ ५ ॥ द्वादश अध्याय ॥ १२ ॥ शिलालोकका दर्शन इस प्रकार श्रीदत्तात्रेयजीके मुखसे जगत्का तत्त्व श्रवण कर परशुरामजीका चित्त सन्देहसे भर गया और उन्होंने पूछा ॥ १ ॥ भगवन् ! मैंने आपका कहा जगत्सम्बन्धी विचार सुना । आप जैसा कहते हैं वह बात निश्चय वैसी ही है, अन्य प्रकारसे नहीं ॥ २ ॥ तो भी यह संसार सर्वदा सत्यरूप क्यों भासता है तथा अन्य कई बुद्धिमानों ने इसे सत्य ही क्यों निश्चय किया है ? ॥ ३ ॥ आप गुरुदेवके मुखसे मैंने असत्य सुना, फिर भी मुझे यह सत्य-सा क्यों प्रतीत हो रहा है ? नाथ ! कृपा करके इसका कारण बताइये, जिससे मेरा यह भ्रम नष्ट हो जाय ॥ ४ ॥ परशुरामके इस प्रकार प्रश्न करनेपर महामना दत्तात्रेयजीने जगत्में सत्यता की भ्रान्तिके मूलका वर्णन करना आरम्भ किया ॥ ५ ॥
द्वादशोऽध्यायः। १६१ शृणु राम जगद्-भ्रान्तेर्मूलमेतत् सनातनम्। वस्त्वविद्यापूर्वकं यद्दृढा भावनमेव तत् ॥ ६ ॥ पश्यात्मानमविज्ञाय स्वात्मबुद्धिं शरीरके। क्व मांसरुधिरास्थीनि क्व चिदात्माऽतिनिर्मलः ॥ ७ ॥ केवलं भावनादार्ढ्याच्चिदात्मा देहकोऽभवत्। ज्ञातेऽप्यात्मनि चिद्रूपे भूयो भ्रान्तिः शरीरके ॥ ८ ॥ एवमेव भावनया सत्यं भाति जगत् खलु। विपरीतं भावयन् वै दृढं भ्रान्ति निवर्त्तयेत् ॥ ९ ॥ यो यथा भावयेदेतज्जगतस्य तथा भवेत्। योगिनां धारणाध्यानैः पश्य तद्रूपसङ्गतिम् ॥ १० ॥ अत्र ते वर्त्तयिष्यामि पुनरावृत्तमद्भुतम्। अस्ति वङ्गे सुन्दराख्यं पुरं परमपावनम् ॥ ११ ॥ परशुराम ! सुनो, इस जगत्-भ्रान्तिका अनादि मूल कारण यह है कि जो वस्तु अज्ञानसे भास रही है उसे हृदयसे दृढतापूर्वक पकड़ रखा है ॥ ६ ॥ देखो, आत्माको न जाननेके कारण ही तो शरीरमें आत्मबुद्धि हुई है। अन्यथा कहाँ ये मांस, रक्त और हड्डियाँ तथा कहाँ अत्यन्त निर्मल चेतन आत्मा ! ॥ ७ ॥ केवल भावनाकी दृढताके कारण ही यह शरीर चिदात्मा बन बैठा है। यहाँतक कि चिद्रूप आत्माको जान लेनेपर भी पुनः शरीरमें ही आत्मत्वकी भ्रान्ति हो जाती है ॥ ८ ॥ ठीक इसी प्रकार भावनाकी दृढताके कारण ही संसार सत्य जान पड़ता है। अतः इसके विपरीत भावना करके इस दृढ भ्रान्तिको निवृत्त करना चाहिये ॥ ९ ॥ जो जैसी भावना करता है उसके लिये यह, जगत् वैसा ही हो जाता है। देखो, योगियोंको धारणा-ध्यानादिके द्वारा तद्रूप अनुभव होने लगता है ॥ १० ॥ इस विषयमें मैं एक अद्भुत प्राचीन प्रसंगकी तुमसे चर्चा करता हूँ। वंगदेशमें सुन्दरपुर नामक एक बड़ा ही पवित्र नगर है ॥ ११ ॥
१६२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तत्राऽऽसीन्नृपतिर्धीमान् सुषेण इति विश्रुतः। तस्य भ्राता महासेनो यवीयान् प्रियकृत् सदा ॥ १२ ॥ शशास राज्यं नृपतिर्धर्मतः सर्वसम्मतः। कदाचिदश्वमेधैः सोऽयजद्देवं महेश्वरम् ॥ १३ ॥ तत्र राजकुमारास्तु महाबलपराक्रमाः । महत्या सेनया यज्ञाश्वं सर्वेऽह्यनुसंययुः ॥ १४ ॥ अश्वस्य रोधकान् सर्वान् विजित्य बलिनो बलात्। ययुरैरावतीतीरमन्वश्वं नृपतेः सुताः ॥ १५ ॥ ददृशुस्तत्र राजर्षि तङ्गणाह्वयं तपोनिधिम् । बलोद्धता अवज्ञाय तमसङ्गम्य ते ययुः ॥ १६ ॥ तद्वीक्ष्य तङ्गणसुतः पित्रवज्ञां रुपान्वितः । जग्राहाश्वं यज्ञीयं तं राजपुत्रान् हि भर्त्सयन् ॥ १७ ॥ वहाँ सुषेण नामसे विख्यात एक बुद्धिमान् राजा था। उसका छोटा भाई महासेन था। वह सर्वदा उसका प्रिय करनेवाला था ॥१२॥ राजा धर्मपूर्वक राज्यका शासन करता था और सभीके द्वारा सम्मानित था। एक बार अश्वमेध यज्ञके द्वारा उसने भगवान् महेश्वरकी आराधना की ॥ १३ ॥ उस समय उसके सभी महान् बलवान् और पराक्रमी राजकुमार बड़ी भारी सेना लेकर यज्ञके लिये छोड़े हुए अश्वके साथ गये ॥१४॥ उन बलवान् राजकुमारोंने घोड़ेको रोकनेवाले सभी वीरोंको अपने पराक्रमसे परास्त कर दिया। इस प्रकार वे घोड़ेके पीछे इरावती नदीके तटपर पहुँचे ॥ १५ ॥ वहाँ उन्हें तंगण नामक तपोनिष्ठ राजर्षिके दर्शन हुए। किन्तु बलोन्मत्त होनेके कारण उन्होंने उनकी उपेक्षा कर दी और उनसे भेट किये बिना ही वे आगे चले गये ॥ १६ ॥ इस प्रकार पिताजीकी अवज्ञा होती देख तंगणके पुत्रको बड़ा क्रोध हुआ। उसने उस यज्ञीय अश्वको पकड़ लिया और उन राज- कुमारोंको ललकारा ॥ १७ ॥
द्वादशोऽध्यायः। १६३ अथ राजकुमारास्ते रुरुधुः सर्वतो हि तम् । तावत्तङ्गणपुत्रोऽपि गण्डशैलं पुरःस्थितम् ॥ १८ ॥ विवेशाश्वं समादाय पश्यत्सु राजसूनुषु । साश्वं शिलाविलीनं तं दृष्ट्वा राजकुमारकाः ॥ १९ ॥ विभिदुर्गण्डशैलं तं शस्त्रैरुच्चावचैः पृथक् । चूर्णिताद् गण्डशैलात् स महत्या सेनया वृतः ॥ २० ॥ निर्गत्य तङ्गणसुतो जिगाय युधि तान् क्षणात् । निहत्य सेनां सौषेणीं बध्वा राजकुमारकान् ॥ २१ ॥ प्रविवेश गण्डशैलं भूयस्तङ्गणसम्भवः । अथ सेनाभटाः शिष्टा गत्वा राज्ञे न्यवेदयन् ॥ २२ ॥ साश्वराजकुमाराणां हरणं गण्डशैलके । सुषेणो विस्मितोऽत्यन्तमुवाचाऽवरजं स्वकम् ॥ २३ ॥ वत्साऽऽशु गच्छ तं देशं यत्राऽऽस्ते तङ्गणो मुनिः । तपस्विनोऽचिन्त्यवीर्या अजेया देवमानुषैः ॥ २४ ॥ तब तो उन राजकुमारोंने उसे सब औरसे घेर लिया । बस, तंगणपुत्र उस घोड़ेको ले उन राजकुमारोंके देखते-देखते उनके सामनेवाली शिलामें घुस गया ॥ १८-१६ पू० ॥ राजकुमारोंने उसे घोड़ेके सहित शिलामें जाते देख छोटे-मोटे हथियारोंसे उस शिलाको फोड़ डाला ॥ १६ उ०-२० पू० ॥ उस फूटी हुई शिलासे तङ्गणपुत्र बड़ी भारी सेना लेकर निकला और क्षणभरमें ही उन्हें युद्धमें जीत लिया ॥ २० उ०-२१ पू० ॥ उसने सुषेणकी सेनाका संहार कर दिया और राजकुमारोंको बाँधकर फिर उसी शिलामें घुस गया ॥ २१ उ०-२२ पू० ॥ तब बचे-खुचे सैनिकोंने जाकर राजाको घोड़ेके सहित राजकुमारों के शिलामें हर ले जानेका समाचार सुनाया। इससे सुषेणको बड़ा विस्मय हुआ और उसने अपने छोटे भाईसे कहा ॥ २२ उ०-२३ ॥ "भाई ! तुम उस देशमें जाओ जहाँ तंगण मुनि विराजमान हैं। तपस्वियोंमें बड़ा अद्भुत सामर्थ्य होता है। वे देवता और मनुष्य सभीके लिये अजेय होते हैं ॥ २४ ॥
१६४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तं प्रसाद्य सुतानश्वं चाऽऽसाद्याऽऽयाहि सत्वरम् । न कालोऽतिव्रजेदेष वसन्तो यज्ञसम्मतः ॥ २५ ॥ अभिमानो न कर्तव्यस्तपस्विषु कदाचन । क्रुद्धास्तपस्विनो लोकान् भस्मीकुर्युः क्षणेन वै ॥ २६ ॥ अतः प्रसादनपरो भूत्वा स्वार्थं प्रसाधय । इत्यादिष्टो महासेनस्तं देशं शीघ्रम्यायौ ॥ २७ ॥ अपश्यत्तङ्गणं तत्र समाहितमतिं दृढम् । काष्ठकुड्यात्मतां प्राप्तं शान्तेन्द्रियमनोधियम् ॥ २८ ॥ निर्विकल्पदशाम्भोधिनिलीनस्वात्मभावनम् । प्रणम्य दण्डवद् भूयः कृताञ्जलिपुटस्तदा ॥ तुष्टाव विविधैः स्तोत्रैर्महासेनो मुनीश्वरम् । तथा तस्य संस्तुवतो ह्यत्यगाद्वै दिनत्रयम् ॥ ३० ॥ अथाऽऽजगाम तत्पुत्रः सन्तुष्टः पितृसंस्तवात् । प्रोवाच तं महासेनं राजंस्तुष्टोऽस्मि संस्तवात् ॥ ३१ ॥ तुम उन्हें प्रसन्न करना और घोड़े तथा राजकुमारोंको कर शीघ्र ही लौट आना । देखो, यज्ञके लिये अनुकूल यह वसन्त का समय व्यतीत न हो जाय ॥ २५ ॥ तपस्वियोंके आगे कभी अभिमान नहीं करना चाहिये । तपस्वियोंको क्रोध हो जाय तो वे एक क्षणमें सम्पूर्ण लोकोंमें भस्म कर सकते हैं ॥२६॥ इसलिये तुम उन्हें प्रसन्न करनेका प्रयत्न करके अपना काम बना लेना ।” राजाकी ऐसी आज्ञा पाकर महासेन तुरंत उस देशमें पहुँचा ॥२७॥ वहाँ उसने तङ्गण मुनिको दृढ समाधिमें स्थित देखा । उनका शरीर काष्ठ और भीतके समान स्थिर था तथा इन्द्रिय, मन एवं बुद्धि सर्वथा शान्त ॥ २८ ॥ उनका अहंकार निर्विकल्प दशारूप समुद्रमें डूबा हुआ था । तब महासेनने उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया और फिर हाथ जोड़कर अनेकों स्तोत्रोंसे उन मुनीश्वरकी स्तुति की । इस प्रकार स्तुति करते हुए उसे तीन दिन बीत गये ॥ २९-३० ॥ तब पिताकी स्तुतिसे प्रसन्न होकर पुत्र आया और महासेनसे बोला, "राजन् ! मैं तुम्हारी प्रार्थनासे प्रसन्न हूँ ॥ ३१ ॥
द्वादशोऽध्यायः। १६५ ब्रूहि किं तेऽभिलषितं साधयाम्यविलम्बितम् । अहं पुत्रोऽस्म्यस्य विभोस्तङ्गणस्य महामुनेः ॥ ३२ ॥ नैतस्य मे पितुः कालो भाषणे शृणु भूमिप ! । समाहितस्वान्त एष द्वादशाब्दादनन्तरम् ॥ ३३ ॥ समाधितः समुत्तिष्ठेत्तत्र पञ्चाब्दका गताः । सप्ताऽवशेषा एवं हि समयोऽस्य पुरातनः ॥ ३४ ॥ तत्तेऽभिवाञ्छितं ब्रूहि यत्तस्मात्तत् करोम्यहम् । न मां वालं विजानीहि पितृतुल्यं तपस्विनम् ॥ ३५ ॥ नाऽसाध्यं विद्यते लोके योगिनां हि तपस्विनाम् । श्रुत्वा मुनिकुमारोक्तं महासेनोऽतिबुद्धिमान् ॥ ३६ ॥ प्राह तं तङ्गणसुतं प्रणम्य च कृताञ्जलिः । मुनिपुत्र ! प्रियं मेऽद्य करोषि यदि सत्यतः ॥ ३७ ॥ तत् पितुस्तेऽद्य वाञ्छामि समाधेर्व्युत्थितस्य वै । सह सम्भाषणं किञ्चिदेतदत्यन्तवाञ्छितम् ॥ ३८ ॥ बताओ, तुम्हारी क्या इच्छा है, मैं तुरंत उसे पूर्ण करूँगा। मैं इन परम समर्थ तंगण मुनिका पुत्र हूँ ॥ ३२ ॥ राजन् ! सुनो, अभी मेरे पिताजीके बोलनेका समय नहीं है। इनका अन्तःकरण समाधिमें लीन है। इस समाधिसे ये बारह वर्षोंमें उठेंगे अभी पाँच वर्ष बीते हैं, सात बाकी हैं। इस प्रकार पहलेसे ही इनका संकेत है ॥ ३३-३४ ॥ अतः इनसे तुम जो चाहते हो मुझे बताओ, मैं पूरा करूँगा। मुझे बच्चा मत समझो, मैं भी पिताके समान तपस्वी हूँ। तपस्वी योगियोंके लिये संसारमें कोई बात असाध्य नहीं होती” ॥३५-३६ पू०॥ मुनिकुमार की बातें सुनकर परम बुद्धिमान् महासेनने उसे प्रणाम किया और हाथ जोड़कर बोला-॥ ३६ उ०-३७ पू० ॥ “मुनिकुमार यदि आप इस समय सचमुच मेरा कोई प्रिय करना चाहते हैं तो मैं समाधिसे उठे हुए आपके पिताजीसे कुछ बात करना चाहता हूँ—यही मेरी बड़ी अभिलाषा है ॥ ३७ उ०-३८ ॥
१६६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अनुकम्प्यो यद्यहं ते द्रुतमेतत् प्रसाधय । श्रुत्वैतद्वचनं राज्ञः प्राऽऽह तापसजः पुनः ॥ ३९ ॥ राजन् न साध्यं ह्येतत्ते वाञ्छितं सर्वथा भवेत् । तथाऽपि ते करोमीति प्रतिश्रुत्याऽन्यथा कथम् ॥ ४० ॥ ब्रवीमि भूयस्तत् किञ्चित् प्रतीक्षस्वाऽभियाचितः । मुहूर्तमात्रं मे पश्य सामर्थ्यं योगसम्भवम् ॥ ४१ ॥ एष मेऽद्य गुरुः शान्तपदे परमपावने । संस्थितस्तं बाह्ययत्नैरपि को वै प्रबोधयेत् ॥ ४२ ॥ पश्याऽहं बोधयाम्येनं योगयुक्त्यैव सूक्ष्मया । इत्युक्त्वाऽथ समाविश्य समाहृत्येन्द्रियाण्यलम् ॥ ४३ ॥ प्राणेऽपानं सुसंयोज्य मुख्यप्राणेन निर्गतः । देहं पितुः प्रविश्याऽऽशु प्रलीनं तस्य मानसम् ॥ ४४ ॥ बोधयामास चाऽऽकृष्य प्रबोध्याऽऽशु विनिर्गतः । देहं स्वमाविशद् यावत्तावत् स बुबुधे मुनिः ॥ ४५ ॥ यदि आप मुझे कृपाका पात्र समझते हैं तो शीघ्र ही इसे पूर्ण कर दीजिये ।” राजाकी यह बात सुनकर मुनिपुत्रने पुनः कहा-॥ ३६ ॥ “राजन् ! तुम्हारी इस इच्छाका पूर्ण होना तो किसी प्रकार सम्भव नहीं है, तथापि मैं तुमसे 'तुम्हारा प्रिय करूँगा” ऐसा कहकर अब दूसरी बात कैसे कह सकता हूँ। तुम कुछ देर ठहरो और मेरा योग- सम्बन्धी सामर्थ्य देखो ॥ ४०-४१ ॥ इस समय ये मेरे गुरुदेव परमपवित्र शान्तिपदमें प्रतिष्ठित हैं, इन्हें बाह्य प्रयत्नोंसे तो भला, कौन जगा सकता है ? देखो, मैं इन्हें योगकी अत्यन्त सूक्ष्म युक्तिसे जगाता हूँ” ॥ ४२-४३ पू० ॥ ऐसा कहकर वह बैठ गया और सम्पूर्ण इन्द्रियोंका पूर्णतया निरोध- कर उसने अपानको प्राणके साथ मिलाया। फिर मुख्य प्राणके द्वारा बाहर आकर तुरन्त ही अपने पिताके शरीरमें प्रविष्ट हो गया और उनके सुप्त मनको आकर्षित करके सजग कर दिया। इस प्रकार उन्हें सावधान कर तुरन्त ही वहाँसे निकल कर जैसे ही अपने शरीरमें प्रविष्ट हुआ उसी समय वे मुनिवर भी जागृत हो गये ॥ ४३ उ०-४५ ॥