त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६४ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तं प्रसाद्य सुतानश्वं चाऽऽसाद्याऽऽयाहि सत्वरम् । न कालोऽतिव्रजेदेष वसन्तो यज्ञसम्मतः ॥ २५ ॥ अभिमानो न कर्तव्यस्तपस्विषु कदाचन । क्रुद्धास्तपस्विनो लोकान् भस्मीकुर्युः क्षणेन वै ॥ २६ ॥ अतः प्रसादनपरो भूत्वा स्वार्थं प्रसाधय । इत्यादिष्टो महासेनस्तं देशं शीघ्रम्यायौ ॥ २७ ॥ अपश्यत्तङ्गणं तत्र समाहितमतिं दृढम् । काष्ठकुड्यात्मतां प्राप्तं शान्तेन्द्रियमनोधियम् ॥ २८ ॥ निर्विकल्पदशाम्भोधिनिलीनस्वात्मभावनम् । प्रणम्य दण्डवद् भूयः कृताञ्जलिपुटस्तदा ॥ तुष्टाव विविधैः स्तोत्रैर्महासेनो मुनीश्वरम् । तथा तस्य संस्तुवतो ह्यत्यगाद्वै दिनत्रयम् ॥ ३० ॥ अथाऽऽजगाम तत्पुत्रः सन्तुष्टः पितृसंस्तवात् । प्रोवाच तं महासेनं राजंस्तुष्टोऽस्मि संस्तवात् ॥ ३१ ॥ तुम उन्हें प्रसन्न करना और घोड़े तथा राजकुमारोंको कर शीघ्र ही लौट आना । देखो, यज्ञके लिये अनुकूल यह वसन्त का समय व्यतीत न हो जाय ॥ २५ ॥ तपस्वियोंके आगे कभी अभिमान नहीं करना चाहिये । तपस्वियोंको क्रोध हो जाय तो वे एक क्षणमें सम्पूर्ण लोकोंमें भस्म कर सकते हैं ॥२६॥ इसलिये तुम उन्हें प्रसन्न करनेका प्रयत्न करके अपना काम बना लेना ।” राजाकी ऐसी आज्ञा पाकर महासेन तुरंत उस देशमें पहुँचा ॥२७॥ वहाँ उसने तङ्गण मुनिको दृढ समाधिमें स्थित देखा । उनका शरीर काष्ठ और भीतके समान स्थिर था तथा इन्द्रिय, मन एवं बुद्धि सर्वथा शान्त ॥ २८ ॥ उनका अहंकार निर्विकल्प दशारूप समुद्रमें डूबा हुआ था । तब महासेनने उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया और फिर हाथ जोड़कर अनेकों स्तोत्रोंसे उन मुनीश्वरकी स्तुति की । इस प्रकार स्तुति करते हुए उसे तीन दिन बीत गये ॥ २९-३० ॥ तब पिताकी स्तुतिसे प्रसन्न होकर पुत्र आया और महासेनसे बोला, "राजन् ! मैं तुम्हारी प्रार्थनासे प्रसन्न हूँ ॥ ३१ ॥