भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 179

द्वादशोऽध्यायः। १६५ ब्रूहि किं तेऽभिलषितं साधयाम्यविलम्बितम् । अहं पुत्रोऽस्म्यस्य विभोस्तङ्गणस्य महामुनेः ॥ ३२ ॥ नैतस्य मे पितुः कालो भाषणे शृणु भूमिप ! । समाहितस्वान्त एष द्वादशाब्दादनन्तरम् ॥ ३३ ॥ समाधितः समुत्तिष्ठेत्तत्र पञ्चाब्दका गताः । सप्ताऽवशेषा एवं हि समयोऽस्य पुरातनः ॥ ३४ ॥ तत्तेऽभिवाञ्छितं ब्रूहि यत्तस्मात्तत् करोम्यहम् । न मां वालं विजानीहि पितृतुल्यं तपस्विनम् ॥ ३५ ॥ नाऽसाध्यं विद्यते लोके योगिनां हि तपस्विनाम् । श्रुत्वा मुनिकुमारोक्तं महासेनोऽतिबुद्धिमान् ॥ ३६ ॥ प्राह तं तङ्गणसुतं प्रणम्य च कृताञ्जलिः । मुनिपुत्र ! प्रियं मेऽद्य करोषि यदि सत्यतः ॥ ३७ ॥ तत् पितुस्तेऽद्य वाञ्छामि समाधेर्व्युत्थितस्य वै । सह सम्भाषणं किञ्चिदेतदत्यन्तवाञ्छितम् ॥ ३८ ॥ बताओ, तुम्हारी क्या इच्छा है, मैं तुरंत उसे पूर्ण करूँगा। मैं इन परम समर्थ तंगण मुनिका पुत्र हूँ ॥ ३२ ॥ राजन् ! सुनो, अभी मेरे पिताजीके बोलनेका समय नहीं है। इनका अन्तःकरण समाधिमें लीन है। इस समाधिसे ये बारह वर्षोंमें उठेंगे अभी पाँच वर्ष बीते हैं, सात बाकी हैं। इस प्रकार पहलेसे ही इनका संकेत है ॥ ३३-३४ ॥ अतः इनसे तुम जो चाहते हो मुझे बताओ, मैं पूरा करूँगा। मुझे बच्चा मत समझो, मैं भी पिताके समान तपस्वी हूँ। तपस्वी योगियोंके लिये संसारमें कोई बात असाध्य नहीं होती” ॥३५-३६ पू०॥ मुनिकुमार की बातें सुनकर परम बुद्धिमान् महासेनने उसे प्रणाम किया और हाथ जोड़कर बोला-॥ ३६ उ०-३७ पू० ॥ “मुनिकुमार यदि आप इस समय सचमुच मेरा कोई प्रिय करना चाहते हैं तो मैं समाधिसे उठे हुए आपके पिताजीसे कुछ बात करना चाहता हूँ—यही मेरी बड़ी अभिलाषा है ॥ ३७ उ०-३८ ॥