भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 180

१६६ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे अनुकम्प्यो यद्यहं ते द्रुतमेतत् प्रसाधय । श्रुत्वैतद्वचनं राज्ञः प्राऽऽह तापसजः पुनः ॥ ३९ ॥ राजन् न साध्यं ह्येतत्ते वाञ्छितं सर्वथा भवेत् । तथाऽपि ते करोमीति प्रतिश्रुत्याऽन्यथा कथम् ॥ ४० ॥ ब्रवीमि भूयस्तत् किञ्चित् प्रतीक्षस्वाऽभियाचितः । मुहूर्तमात्रं मे पश्य सामर्थ्यं योगसम्भवम् ॥ ४१ ॥ एष मेऽद्य गुरुः शान्तपदे परमपावने । संस्थितस्तं बाह्ययत्नैरपि को वै प्रबोधयेत् ॥ ४२ ॥ पश्याऽहं बोधयाम्येनं योगयुक्त्यैव सूक्ष्मया । इत्युक्त्वाऽथ समाविश्य समाहृत्येन्द्रियाण्यलम् ॥ ४३ ॥ प्राणेऽपानं सुसंयोज्य मुख्यप्राणेन निर्गतः । देहं पितुः प्रविश्याऽऽशु प्रलीनं तस्य मानसम् ॥ ४४ ॥ बोधयामास चाऽऽकृष्य प्रबोध्याऽऽशु विनिर्गतः । देहं स्वमाविशद् यावत्तावत् स बुबुधे मुनिः ॥ ४५ ॥ यदि आप मुझे कृपाका पात्र समझते हैं तो शीघ्र ही इसे पूर्ण कर दीजिये ।” राजाकी यह बात सुनकर मुनिपुत्रने पुनः कहा-॥ ३६ ॥ “राजन् ! तुम्हारी इस इच्छाका पूर्ण होना तो किसी प्रकार सम्भव नहीं है, तथापि मैं तुमसे 'तुम्हारा प्रिय करूँगा” ऐसा कहकर अब दूसरी बात कैसे कह सकता हूँ। तुम कुछ देर ठहरो और मेरा योग- सम्बन्धी सामर्थ्य देखो ॥ ४०-४१ ॥ इस समय ये मेरे गुरुदेव परमपवित्र शान्तिपदमें प्रतिष्ठित हैं, इन्हें बाह्य प्रयत्नोंसे तो भला, कौन जगा सकता है ? देखो, मैं इन्हें योगकी अत्यन्त सूक्ष्म युक्तिसे जगाता हूँ” ॥ ४२-४३ पू० ॥ ऐसा कहकर वह बैठ गया और सम्पूर्ण इन्द्रियोंका पूर्णतया निरोध- कर उसने अपानको प्राणके साथ मिलाया। फिर मुख्य प्राणके द्वारा बाहर आकर तुरन्त ही अपने पिताके शरीरमें प्रविष्ट हो गया और उनके सुप्त मनको आकर्षित करके सजग कर दिया। इस प्रकार उन्हें सावधान कर तुरन्त ही वहाँसे निकल कर जैसे ही अपने शरीरमें प्रविष्ट हुआ उसी समय वे मुनिवर भी जागृत हो गये ॥ ४३ उ०-४५ ॥