त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादशोऽध्यायः। १६७ अपश्यदग्रगं भूपं स्तुवन्तं प्रणतं तदा। किमेतदिति सञ्चिन्त्य सर्वं योगदृशाऽविदत् ॥ ४६ ॥ प्रसन्नचित्त आमन्त्र्य पुत्रं प्राह सुशान्तधीः। वत्स ! नैवं पुनः कार्यं क्रोधस्तु तपसो रिपुः ॥ ४७ ॥ राज्ञा हि रक्षिते लोके तपो निर्विघ्नमेधते । यज्ञविघ्नक्रिया दैत्यस्वभावो न मुनेः क्वचित् ॥ ४८ ॥ प्रयच्छाऽश्वं राजपुत्रानप्यस्मै सुमना द्रुतम् । शीघ्रं यात्वेष यज्ञस्य न कालातिक्रमो भवेत् ॥ ४९ ॥ इत्युक्तो गण्डशैलं स प्रविश्य क्षणमात्रतः । साश्वान् राजसुतांस्तस्मै ददौ प्रीत्या गतक्रुधः ॥ ५० ॥ ततः साश्वान् भ्रातृपुत्रान् संप्रेष्य नगरं प्रति । महासेनस्तद्गणं तं प्रणम्यात्यन्तविस्मितः ॥ ५१ ॥ अपृच्छत् प्राञ्जलिर्भूत्वा प्रसाद्य मुनिपुङ्गवम् । उस समय उन्होंने अपने सामने राजाको अत्यन्त विनीत होकर स्तुति करते देखा। फिर यह सोचकर कि यह सब क्या मामला है उन्होंने योगदृष्टिसे सब बात जान ली ॥ ४६ ॥ तब उन्होंने प्रसन्न चित्तसे अत्यन्त शान्तिपूर्वक पुत्रको सम्बोधन करके कहा, "बेटा ! ऐसा काम फिर कभी मत करना। यह क्रोध तो तपस्याका शत्रु है ॥ ४७ ॥ राजाके द्वारा लोककी रक्षा ( सुव्यवस्था ) होनेपर ही निर्विघ्नता- पूर्वक तपकी वृद्धि होती है। यज्ञमें विघ्न करना-यह तो दैत्योंका स्वभाव है, मुनियोंका कभी नहीं ॥ ४८ ॥ इसलिये तुम प्रसन्नचित्त होकर तुरन्त ही इन्हें घोड़ा और सब राजकुमार दे दो। इन्हें जल्दी ही जाना चाहिये, जिससे यज्ञका समय निकल न जाय ॥ ४९ ॥ पिताकी ऐसी आज्ञा होनेपर मुनिपुत्रका क्रोध शान्त हो गया। वह उस शिला में घुसा और एक क्षणमें ही घोड़ेके सहित राजपुत्रोंको लाकर प्रीतिपूर्वक महासेनको सौंप दिया ॥ ५० ॥ तब घोड़ेके सहित राजकुमारोंको नगर की ओर भेजकर महासेनने