भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 182

१६८ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे भगवन् ज्ञातुमिच्छामि साश्वा मे भ्रातृनन्दनाः ॥ ५२ ॥ कथं गण्डशैलगर्भे संस्थितास्तत् समीरय । एवं राज्ञानुयुक्तोऽथ तङ्गणः प्राह भूपतिम् ॥ ५३ ॥ शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि पुराऽहं पृथिवीपतिः । समुद्रवलयां पृथ्वीमन्वशासं चिरं खलु ॥ ५४ ॥ महादेवप्रसादेन ज्ञात्वा चितिमधीश्वरीम् । त्रिपुरां लोकसंस्थानं नीरसं विमृशंस्तथा ॥ ५५ ॥ निर्विण्णो लोकयात्रायां न्यस्य राज्यं सुतेष्वथ । प्राविशं वनमेतं वै भार्या मामन्वगात् सती ॥ ५६ ॥ तस्याभितप्यतो मेऽद्य ययुरर्बुदवत्सराः । भार्यापि मत्सेवनेन परां सिद्धिमूपागता ॥ ५७ ॥ कदाचिदथ भाव्यर्थगौरवान्मे प्रिया सती । समाधावेव कामार्त्तमानसाभूत्ततस्तु सा ॥ ५८ ॥ मां दृष्ट्वा रतिमिच्छन्ती समाधिस्थं स्थिरान्तरम् । अत्यन्त विस्मित हो तंगण मुनिको प्रणाम किया और उन मुनिश्रेष्ठको प्रसन्न कर उनसे हाथ जोड़कर पूछा—॥ ५१-५२ पू० ॥ “भगवन् ! मैं यह जानना चाहता हूँ कि घोड़ेके सहित मेरे ये भतीजे इस शिलाके भीतर कैसे रहे—बतानेकी कृपा करें” ॥५२ उ०-५३ पू०॥ राजाके ऐसा प्रश्न करनेपर तंगणमुनिने उससे कहा, “राजन् ! सुनो, अपना मैं हाल बताता हूँ । पहले मैं भी राजा था और बहुत दिनों तक मैंने समुद्रपर्यन्त इस भूमण्डलका शासन किया है ॥५३ उ०-५४॥ भगवान् महेश्वरकी कृपासे मुझे सर्वलोकमहेश्वरी चित्स्वरूपा त्रिपुराका ज्ञान हो गया । इससे मैं दृश्य जगत्को नीरस समझकर लोकव्यवहारसे विरक्त हो अपना राज्य पुत्रोंको सौंपकर इस वनमें चला आया । मेरी सती धर्मपत्नी भी मेरे साथ चली आयी ॥ ५५-५६ ॥ यहाँ तपस्या करते-करते मुझे एक अरब वर्ष व्यतीत हो गये । मेरी सेवा करते रहनेसे मेरी पत्नीको भी परम पदकी प्राप्ति हो गयी ॥ ५७ ॥ पीछे किसी समय होनहारके प्रभावसे मेरी पतिपरायणा धर्मपत्नीका चित्त समाधि अवस्थामें ही कामाकुल हो गया ॥ ५८ ॥ उसे रतिकी इच्छा हुई । किन्तु उसने देखा कि मैं