त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादशोऽध्यायः । १६६ असहन्ती कामवेगं भावयामास मद्रतिम् ॥ ५९ ॥ गाढभावनया प्राप्य सम्भोगं तु मया सह । दधार गर्भं सुषुवे पुत्रमेतं पुरः स्थितम् ॥ ६० ॥ पुत्रं न्यस्य मदुत्सङ्गे मां समाधेः प्रबोध्य च । देहं भूतेषु सात्कृत्य परव्योमाऽऽत्मतां ययौ ॥ ६१ ॥ अथ दृष्ट्वोत्सङ्ग एनं ज्ञात्वा तस्या गतिं पराम् । दयाक्रान्तमना जातस्तेनायं वर्द्धितो मया ॥ ६२ ॥ श्रुत्वा कदाचिन्मत्तोऽयं राज्यशास्तिं पुरा कृताम् । राज्यशासनकामोऽभूत् प्रार्थयामास मामनु ॥ ६३ ॥ ततो मदुपदेशेन प्राप्य योगर्द्धिमुत्तमाम् । निर्माय भावनायोगात् लोकमस्मिन् महाऽश्मनि ॥ ६४ ॥ समुद्रवलयां पृथ्वीं शास्ति नित्यं सुतस्त्वयम् । तल्लोकेऽश्वः सुता राज्ञो निरुद्धास्ते हि मोचिताः ॥ ६५ ॥ स्थित और अत्यन्त अन्तर्मुख हूँ । तब कामवेगको सहन न कर सकनेके कारण उसने मेरे साथ सम्भोग की भावना की ॥ ५६ ॥ गाढ़ भावनाके कारण उसे मेरे साथ सम्भोगकी प्राप्ति हो गयी और उसने गर्भ धारण किया । तब उसने यह सामने विद्यमान पुत्र उत्पन्न किया ॥ ६० ॥ उसने पुत्र मेरी गोदमें रख दिया और मुझे समाधिसे जगा दिया । फिर शरीर को पञ्चभूतोंमें लीनकर वह स्वयं परब्रह्मसे अभिन्न हो गयी ॥ ६१ ॥ इसे अपनी गोदमें देखकर और उसे परमपदमें लीन जानकर मेरा चित्त दयासे भर गया । इसीसे मैंने इसका पालन-पोषण किया ॥ ६२ ॥ एक बार इसने मुझसे मेरी पूर्वकालिक राज्यशासनकी बात सुनी तो इसे भी राज्य करनेकी इच्छा हो गयी और इसने मुझसे प्रार्थना की॥६३॥ तब मेरे उपदेशसे इसने उत्तम योगसम्पत्ति प्राप्त की और अपने संकल्पसे ही इस विशाल शिलामें एक विश्वकी रचनाकर यह मेरा पुत्र सर्वदा आसमुद्र भूमण्डलका शासन करता है । उसी लोकमें इसने तुम्हारे घोड़े और राजपुत्रोंको कैद कर लिया था, जिन्हें अब छोड़ दिया है ॥ ६४-६५ ॥