त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७० त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे इत्येतत्ते समाख्यातं गण्डशैलेऽवरोधनम् । इति श्रुत्वा मुनिवचो भूयः पप्रच्छ भूपतिः ॥ ६६ ॥ श्रुतं त्वदुक्तमेतद्वै महाश्चर्यकरं परम् । तं लोकं द्रष्टुमिच्छामि कृपया मे प्रदर्शय ॥ ६७ ॥ इति सम्प्रार्थितो राज्ञा मुनिः पुत्रं समादिशत् । वत्सास्मै दर्शय स्वीयं लोकं सर्वं यथेप्सितम् ॥ ६८ ॥ इत्युक्त्वा तङ्गणो भूयः प्रांवेवेश समाहितिम् । अथ तं तङ्गणसुतः समासाद्य नृपं ययौ ॥ ६९ ॥ गण्डशैलं प्रति ततः प्राविशन्मुनिदारकः । प्रवेष्टुं नाशकद् भूप आह्वयतं मुनेः सुतम् ॥ ७० ॥ सोऽपि गण्डशिलान्तस्थो राजानं समुपाव्हयत् । अथ भूयो विनिष्क्रम्य प्राह भूपं मुनेः सुतः ॥ ७१ ॥ नृपैष लोकस्तेऽसाध्यः प्रवेष्टुं खल्वयोगिनः । अयोगाद् गण्डशैलोऽयं घनः सप्रतिघोऽभवत् ॥ ७२ ॥ इस प्रकार मैंने तुम्हें शिलाके भीतर कैद करनेकी कथा सुना दी।” मुनिवरका यह वक्तव्य सुनकर राजाने पुनः पूछा—॥ ६६ ॥ “आपके मुखसे मैंने यह बड़ा ही आश्चर्यजनक वृत्तान्त सुना। अब मैं उस लोककी देखना चाहता हूँ। दिखानेकी कृपा करें” ॥ ६७ ॥ राजाके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर मुनिवरने अपने पुत्रको आज्ञा दी, “बेटा ! तुम इसे इच्छानुसार अपना सारा संसार दिखा दो” ॥ ६८ ॥ ऐसा कहकर तंगणमुनि पुनः समाधिमें प्रविष्ट हो गये। तब उनका पुत्र राजाको लेकर उस शिलाके समीप गया वहाँ पहुँचकर वह मुनिपुत्र तो शिलामें घुस गया किन्तु राजा प्रवेश नहीं कर सका। तब उसने मुनिकुमारको पुकारा ॥ ६९-७० ॥ उधर शिलाके भीतरसे उसने भी राजाको पुकारा। फिर बाहर आकर उसने राजासे कहा—॥ ७१ ॥ राजन् ! तुम योगी नहीं हो, इसलिये तुम्हारे लिये तो इस शिलामें घुसना सम्भव नहीं है। योगहीन होनेके कारण ही तुम्हें यह शिला सघन और रुकावट डालनेवाली जान पड़ी ॥ ७२ ॥