त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)
Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary
महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वादशोऽध्यायः । १७१ नेतव्यस्तं सर्वथैव पितुर्वचनगौरवात् । तदत्र देहं विन्यस्य कोटरे तृणसंवृते ॥ ७३ ॥ मनोमात्रशरीरः सन् शैलं विश मया सह । इत्युक्तः प्राह नृपतिरशक्तो देहनिर्गमे ॥ ७४ ॥ कथं मुने देहमिममुत्सृजामि समीरय । उत्सृजामि यदि बलात्नाशमेष्यामि सर्वथा ॥ ७५ ॥ एवं वदन्तं नृपतिं प्रहस्याह मुनेः सुतः । अहो योगानभिज्ञोऽसि चाऽस्तु नेत्रे निमीलय ॥ ७६ ॥ इत्युक्त्वा मीलिताक्षं तं प्रविश्य निमिषार्द्धतः । आकृष्य तल्लिङ्गतनुं क्षिप्त्वा श्वभ्रे च तत्तनुम् ॥ ७७ ॥ योगसामर्थ्यतः शैले निविश्य नृपसंयुतः । सुषुप्तं देहवैकल्यात् स्वसङ्कल्पोत्थदेहके ॥ ७८ ॥ संयोज्य बोधयामास प्रबुद्धो नृपतिस्तदा । गृहीतं मुनिनाऽपश्यत् स्वं महागगने तदा ॥ ७९ ॥
तथापि पिताजीकी आज्ञाके कारण किसी भी प्रकार तुम्हें ले चलना ही होगा । अतः तुम घास-फूससे ढके हुये इस गढ़ेमें अपना शरीर रख दो और केवल मनोमय शरीरसे मेरे साथ शिलामें चले आओ” ॥ ७३-७४ पू० ॥ ऐसा कहे जानेपर राजा बोला, “मैं शरीरसे बाहर आनेमें असमर्थ हूँ । मुने ! बताओ तो, मैं किस प्रकार इस शरीरको छोड़ूँ । यदि इसे बलपूर्वक छोड़ भी दूँ तो मेरा तो सर्वथा नाश हो जायगा” ॥ ७४ उ०-७५ ॥ राजाके ऐसा कहनेपर मुनिकुमार हँसकर बोला, “अरे ठाक, तुम तो योग नहीं जानते । अच्छा, तुम आँखें मूंद लो” ॥ ७६ ॥ मुनिपुत्र ऐसा कहकर, राजाके आँख मूँद लेनेपर, आधे पलमें ही उसके भीतर घुस गया । उसने राजाके लिंग शरीरको बाहर खींचा और स्थूल शरीरको गढ़ेमें डाल दिया फिर अपने योगबलसे राजाके सहित शिलामें घुस गया । देहसे पृथक् हो जानेके कारण इस समय राजाका लिंग शरीर अचेत था । उसे अपने संकल्पसे बनाये हुए शरीरसे संयुक्त करके सावधान किया तो राजा सचेत हो गया ! तब