भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

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पृष्ठ 176

१६२ त्रिपुरारहस्ये ज्ञानखण्डे तत्राऽऽसीन्नृपतिर्धीमान् सुषेण इति विश्रुतः। तस्य भ्राता महासेनो यवीयान् प्रियकृत् सदा ॥ १२ ॥ शशास राज्यं नृपतिर्धर्मतः सर्वसम्मतः। कदाचिदश्वमेधैः सोऽयजद्देवं महेश्वरम् ॥ १३ ॥ तत्र राजकुमारास्तु महाबलपराक्रमाः । महत्या सेनया यज्ञाश्वं सर्वेऽह्यनुसंययुः ॥ १४ ॥ अश्वस्य रोधकान् सर्वान् विजित्य बलिनो बलात्। ययुरैरावतीतीरमन्वश्वं नृपतेः सुताः ॥ १५ ॥ ददृशुस्तत्र राजर्षि तङ्गणाह्वयं तपोनिधिम् । बलोद्धता अवज्ञाय तमसङ्गम्य ते ययुः ॥ १६ ॥ तद्वीक्ष्य तङ्गणसुतः पित्रवज्ञां रुपान्वितः । जग्राहाश्वं यज्ञीयं तं राजपुत्रान् हि भर्त्सयन् ॥ १७ ॥ वहाँ सुषेण नामसे विख्यात एक बुद्धिमान् राजा था। उसका छोटा भाई महासेन था। वह सर्वदा उसका प्रिय करनेवाला था ॥१२॥ राजा धर्मपूर्वक राज्यका शासन करता था और सभीके द्वारा सम्मानित था। एक बार अश्वमेध यज्ञके द्वारा उसने भगवान् महेश्वरकी आराधना की ॥ १३ ॥ उस समय उसके सभी महान् बलवान् और पराक्रमी राजकुमार बड़ी भारी सेना लेकर यज्ञके लिये छोड़े हुए अश्वके साथ गये ॥१४॥ उन बलवान् राजकुमारोंने घोड़ेको रोकनेवाले सभी वीरोंको अपने पराक्रमसे परास्त कर दिया। इस प्रकार वे घोड़ेके पीछे इरावती नदीके तटपर पहुँचे ॥ १५ ॥ वहाँ उन्हें तंगण नामक तपोनिष्ठ राजर्षिके दर्शन हुए। किन्तु बलोन्मत्त होनेके कारण उन्होंने उनकी उपेक्षा कर दी और उनसे भेट किये बिना ही वे आगे चले गये ॥ १६ ॥ इस प्रकार पिताजीकी अवज्ञा होती देख तंगणके पुत्रको बड़ा क्रोध हुआ। उसने उस यज्ञीय अश्वको पकड़ लिया और उन राज- कुमारोंको ललकारा ॥ १७ ॥