भारतकोश
त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

त्रिपुरारहस्य (ज्ञान खण्ड - महर्षि दत्तात्रेय-परशुराम संवाद सान्वय सटीक)

Tripura Rahasya Jnana Khanda with Hindi Commentary

महर्षि दत्तात्रेय / भगवान् परशुराम द्वारा

DevanagariHindipublished404 पृष्ठ

पृष्ठ 175, कुल 404 में से

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द्वादशोऽध्यायः। १६१ शृणु राम जगद्-भ्रान्तेर्मूलमेतत् सनातनम्। वस्त्वविद्यापूर्वकं यद्दृढा भावनमेव तत् ॥ ६ ॥ पश्यात्मानमविज्ञाय स्वात्मबुद्धिं शरीरके। क्व मांसरुधिरास्थीनि क्व चिदात्माऽतिनिर्मलः ॥ ७ ॥ केवलं भावनादार्ढ्याच्चिदात्मा देहकोऽभवत्। ज्ञातेऽप्यात्मनि चिद्रूपे भूयो भ्रान्तिः शरीरके ॥ ८ ॥ एवमेव भावनया सत्यं भाति जगत् खलु। विपरीतं भावयन् वै दृढं भ्रान्ति निवर्त्तयेत् ॥ ९ ॥ यो यथा भावयेदेतज्जगतस्य तथा भवेत्। योगिनां धारणाध्यानैः पश्य तद्रूपसङ्गतिम् ॥ १० ॥ अत्र ते वर्त्तयिष्यामि पुनरावृत्तमद्भुतम्। अस्ति वङ्गे सुन्दराख्यं पुरं परमपावनम् ॥ ११ ॥ परशुराम ! सुनो, इस जगत्-भ्रान्तिका अनादि मूल कारण यह है कि जो वस्तु अज्ञानसे भास रही है उसे हृदयसे दृढतापूर्वक पकड़ रखा है ॥ ६ ॥ देखो, आत्माको न जाननेके कारण ही तो शरीरमें आत्मबुद्धि हुई है। अन्यथा कहाँ ये मांस, रक्त और हड्डियाँ तथा कहाँ अत्यन्त निर्मल चेतन आत्मा ! ॥ ७ ॥ केवल भावनाकी दृढताके कारण ही यह शरीर चिदात्मा बन बैठा है। यहाँतक कि चिद्रूप आत्माको जान लेनेपर भी पुनः शरीरमें ही आत्मत्वकी भ्रान्ति हो जाती है ॥ ८ ॥ ठीक इसी प्रकार भावनाकी दृढताके कारण ही संसार सत्य जान पड़ता है। अतः इसके विपरीत भावना करके इस दृढ भ्रान्तिको निवृत्त करना चाहिये ॥ ९ ॥ जो जैसी भावना करता है उसके लिये यह, जगत् वैसा ही हो जाता है। देखो, योगियोंको धारणा-ध्यानादिके द्वारा तद्रूप अनुभव होने लगता है ॥ १० ॥ इस विषयमें मैं एक अद्भुत प्राचीन प्रसंगकी तुमसे चर्चा करता हूँ। वंगदेशमें सुन्दरपुर नामक एक बड़ा ही पवित्र नगर है ॥ ११ ॥

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